तेल अवीव से द फ्रीलान्स की ग्राउंड रिपोर्ट के अनुसार, इजराइल की राजनीति में पिछले कुछ महीनों में बहुत बड़े बदलाव देखने को मिले हैं। सात अक्टूबर को हमास के भीषण हमले ने पूरे देश को हिलाकर रख दिया था। इस एक बड़ी घटना ने इजराइल के सुरक्षा तंत्र और राजनीतिक भविष्य पर अनगिनत सवाल खड़े कर दिए। देश की जनता अब अपनी सुरक्षा को लेकर पहले से कहीं अधिक सतर्क और चिंतित हो गई है। आम नागरिकों का मानना है कि इस हमले को रोकने में मौजूदा सरकार पूरी तरह से नाकाम साबित हुई थी।
इस दर्दनाक हादसे के बाद इजराइल की राजनीति में दक्षिणपंथी रुख और ज्यादा मजबूत और आक्रामक हो गया है। देश के आम नागरिक अब अपनी रक्षा के लिए बहुत कड़े कदम चाहते हैं। इसके बावजूद प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू की कुर्सी पर लगातार खतरा बना हुआ है। हमास के हमले से पहले ही न्यायिक सुधारों को लेकर देश में भारी विरोध प्रदर्शन चल रहे थे। युद्ध के इस दौर में नेतन्याहू की लोकप्रियता सबसे निचले स्तर पर पहुंच गई है और जनता का भरोसा उनकी सरकार से उठ चुका है।
नेतन्याहू को पूर्व सेना प्रमुखों से मिल रही है कड़ी चुनौती
राजनीतिक जानकारों का मानना है कि आने वाले चुनावों में बेंजामिन नेतन्याहू के लिए सत्ता बचाना किसी लोहे के चने चबाने से कम नहीं होगा। इजराइल की विपक्षी पार्टियां अब पूरी तरह एकजुट होकर सरकार पर दबाव बना रही हैं। सबसे बड़ी बात यह है कि देश के कई पूर्व सेना प्रमुख और बड़े सैन्य अधिकारी अब सीधे राजनीति में उतर आए हैं। ये सभी नेता नेतन्याहू की नीतियों की कड़ी आलोचना कर रहे हैं। जनता के बीच इन सैन्य अधिकारियों की साफ-सुथरी छवि होने के कारण लोग उनकी बातों पर बहुत भरोसा कर रहे हैं।
युद्ध के इस संकटकाल में देश की जनता को एक मजबूत और भरोसेमंद नेतृत्व की सख्त जरूरत है। नेतन्याहू पर लगातार यह आरोप लग रहा है कि वे केवल अपनी राजनीतिक कुर्सी बचाने के लिए युद्ध को लंबा खींच रहे हैं। देश के भीतर से ही नहीं बल्कि उनकी अपनी पार्टी के भीतर से भी अब दबी जुबान में बगावत के सुर उठने लगे हैं। इजराइली समाज का एक बड़ा वर्ग अब बदलाव चाहता है और एक नई सरकार के गठन की मांग कर रहा है ताकि देश को फिर से स्थिरता मिल सके।
कमजोर होता वामपंथ और बदलता सामाजिक ताना-बाना
हमास के इस घातक हमले का एक और बड़ा असर इजराइल की वैचारिक राजनीति पर साफ तौर पर दिखाई दे रहा है। दशकों तक देश की राजनीति में मजबूत पकड़ रखने वाला वामपंथ और मध्यमार्गी दल आज बहुत कमजोर हो चुके हैं। शांति वार्ताओं और कूटनीति पर भरोसा करने वाली वामपंथी विचारधारा को जनता ने लगभग नकार दिया है। अब देश में केवल दक्षिणपंथी और अति-दक्षिणपंथी सोच का ही पूरी तरह बोलबाला है, जो सुरक्षा के मुद्दे पर कोई भी समझौता करने को तैयार नहीं है।
आम इजराइली नागरिकों से जब हमने बात की तो उनका दर्द साफ झलकता था। उनका कहना है कि देश की सुरक्षा हमारे लिए सबसे पहले आती है और जो नेता देश को सुरक्षित नहीं रख सकता, उसे सत्ता में रहने का कोई हक नहीं है। इजराइल के इतिहास में यह दौर सबसे संवेदनशील माना जा रहा है। आने वाले दिनों में होने वाले राजनीतिक बदलाव न केवल इजराइल की दिशा तय करेंगे, बल्कि पूरे मध्य पूर्व के भूगोल और समीकरणों को भी गहराई से प्रभावित करेंगे।




