इजराइल की राजनीति इस वक्त एक बेहद अहम मोड़ से गुजर रही है। देश में ठीक बीस दिन बाद नए चुनाव होने जा रहे हैं। प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू के सामने इस बार अपनी सत्ता बचाने की सबसे बड़ी चुनौती खड़ी है। हमास के साथ हुए भीषण युद्ध और सुरक्षा हालात ने इजराइल के अंदरूनी राजनीतिक समीकरणों को पूरी तरह से उलट दिया है। आम जनता का मूड अब बदलता हुआ साफ नजर आ रहा है।
हमास के हमलों के बाद देश की सुरक्षा नीति पर गंभीर सवाल उठे हैं। नेतन्याहू सरकार की नीतियों को लेकर जनता के एक बड़े वर्ग में भारी नाराजगी है। विश्लेषकों का मानना है कि इस बार के चुनावी नतीजे पिछले कई दशकों का इतिहास बदल सकते हैं। नेतन्याहू के कट्टरपंथी सहयोगियों और विरोधी दलों के बीच कड़ा मुकाबला देखने को मिल रहा है। हर गुजरते दिन के साथ चुनावी माहौल बेहद गरमाता जा रहा है।
इजराइल की राजनीति में वामपंथी दलों का कमजोर होना
इस चुनाव की सबसे बड़ी खास बात यह है कि पारंपरिक वामपंथी दल काफी कमजोर हो चुके हैं। जो दल कभी इजराइल की राजनीति की मुख्य धुरी हुआ करते थे, वे आज वजूद की लड़ाई लड़ रहे हैं। देश का मतदाता अब सुरक्षा के मुद्दों पर ज्यादा आक्रामक और दक्षिणपंथी रुख अपना रहा है। इसके बावजूद नेतन्याहू के खिलाफ गुस्सा इतना ज्यादा है कि दक्षिणपंथी वोट भी अब कई हिस्सों में बंटता हुआ दिखाई दे रहा है।
वामपंथ के कमजोर होने से राजनीतिक दलों के समीकरण पूरी तरह बिखर गए हैं। अब मुकाबला सिर्फ विचारधारा का नहीं बल्कि नेतृत्व की विश्वसनीयता का बन गया है। विपक्षी दल इसी बात का फायदा उठाने की पूरी कोशिश कर रहे हैं। वे जनता के बीच जाकर नेतन्याहू सरकार की विफलताओं को जोर-शोर से उठा रहे हैं। आम लोग भी महंगाई और सुरक्षा के मोर्चे पर बदलाव चाहते हैं।
अरब मतदाताओं की भूमिका और राजनीतिक दलों की रणनीति
इस पूरे चुनावी खेल में अरब मतदाताओं की भूमिका बहुत ही निर्णायक साबित होने वाली है। इजराइल के अरब नागरिक इस बार मतदान में बढ़-चढ़कर हिस्सा लेने की तैयारी कर रहे हैं। राजनीतिक दलों ने भी अरब बहुल इलाकों में अपना चुनाव प्रचार तेज कर दिया है। यदि अरब मतदाता एकजुट होकर मतदान करते हैं, तो वे किसी भी दल की सरकार बनाने या गिराने की ताकत रखते हैं।
नेतन्याहू विरोधी गठबंधन इस बात को अच्छी तरह समझ रहा है। वे अरब नेतृत्व को अपने साथ जोड़ने की हरसंभव कोशिश कर रहे हैं। दूसरी ओर नेतन्याहू अपने पारंपरिक समर्थकों को एकजुट करने में लगे हैं। चुनाव के ये बचे हुए बीस दिन इजराइल के भविष्य की दिशा तय करेंगे। ग्राउंड जीरो से मिल रही रिपोर्ट बताती है कि इस बार नतीजा कुछ भी चौकाने वाला आ सकता है।
बेंजामिन नेतन्याहू के राजनीतिक करियर का सबसे कठिन इम्तिहान
बेंजामिन नेतन्याहू इजराइल के सबसे लंबे समय तक प्रधानमंत्री रहने वाले नेता हैं। उन्होंने कई राजनीतिक संकटों का सामना किया है और हर बार जीत हासिल की है। लेकिन इस बार हालात बिल्कुल अलग और बेहद चुनौतीपूर्ण हैं। युद्ध के बाद उपजे असंतोष और अंतरराष्ट्रीय दबाव ने उनकी स्थिति को कमजोर किया है। यदि वे इस चुनाव में हार जाते हैं, तो यह इजराइल की राजनीति का एक बड़ा अध्याय समाप्त होने जैसा होगा।
देश के तमाम ओपिनियन पोल में कांटे की टक्कर दिखाई जा रही है। कोई भी पार्टी अभी से अपनी जीत का दावा करने की स्थिति में नहीं है। मतदाता अंतिम समय तक अपना मन बदल सकते हैं। 'द फ्रीलान्स' की इस जमीनी पड़ताल से साफ है कि इजराइल का यह चुनाव सिर्फ एक सरकार का चुनाव नहीं है। यह देश की सुरक्षा, समाज और भविष्य की पूरी दिशा तय करने वाला ऐतिहासिक राजनीतिक मोड़ है।


