नई दिल्ली: 'द फ्रीलान्स' के लिए विशेष रिपोर्ट। कूटनीतिक गलियारों में अक्सर देशों के दोस्त बदलते रहते हैं, लेकिन भारत और रूस की दोस्ती (Indo-Russia Ties) ने कई दशकों के भू-राजनीतिक तूफानों को झेला है। एक बार फिर विदेश मंत्री एस. जयशंकर (S. Jaishankar) ने मॉस्को और नई दिल्ली के बीच के ऐतिहासिक संबंधों की गहराई को दुनिया के सामने रखा है। उनका यह बयान ऐसे समय में आया है जब वैश्विक राजनीति में समीकरण तेजी से बदल रहे हैं।
शीत युद्ध के दौर की कूटनीति और रूस की भूमिका
दशकों पुराने इतिहास को खंगालें तो शीत युद्ध (Cold War) के दौर से ही भारत और सोवियत संघ (अब रूस) के बीच एक अटूट विश्वास की नींव पड़ी थी। एस. जयशंकर ने अपने हालिया बयानों में इस बात पर विशेष जोर दिया कि जब पश्चिमी देशों समेत दुनिया का एक बड़ा हिस्सा पाकिस्तान के पीछे खड़ा था और भारत को कूटनीतिक रूप से अलग-थलग करने की कोशिशें हो रही थीं, तब केवल रूस (तत्कालीन सोवियत संघ) ही था जो चट्टान की तरह भारत के साथ खड़ा रहा।
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कश्मीर और अन्य अहम मसलों पर वीटो पावर का इस्तेमाल
अंतरराष्ट्रीय मंचों पर कश्मीर सहित कई संवेदनशील और रणनीतिक मसलों पर जब भारत के खिलाफ प्रस्ताव लाने की कोशिशें हुईं, तब सोवियत संघ ने संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UNSC) में अपने 'वीटो' (Veto Power) अधिकारों का इस्तेमाल कर भारत के हितों की रक्षा की। विदेश मंत्री का यह स्मरण कराना महज एक इतिहास की बात नहीं है, बल्कि आज के बदलते वैश्विक परिदृश्य में यह एक स्पष्ट संदेश है कि पुरानी साझेदारियां कितनी अहमियत रखती हैं।
बदलते वैश्विक समीकरण और भारत-रूस संबंध
आज के दौर में जब पश्चिमी देश रूस पर तमाम तरह के प्रतिबंध लगा रहे हैं और भारत पर दबाव बना रहे हैं, तब एस. जयशंकर का यह बयान भारत की रणनीतिक स्वायत्तता (Strategic Autonomy) को स्पष्ट रूप से दर्शाता है। भारत ने हमेशा यह साबित किया है कि वह अपने पुराने और भरोसेमंद दोस्तों को नहीं भूलता। ऊर्जा सुरक्षा (Energy Security) से लेकर रक्षा क्षेत्र (Defense Cooperation) तक, रूस आज भी भारत का एक अनिवार्य रणनीतिक साझीदार बना हुआ है।
भविष्य के भू-राजनीतिक निहितार्थ
विश्लेषकों का मानना है कि जयशंकर का यह बयान कूटनीतिक रूप से बहुत नपा-तुला है। यह न केवल मॉस्को के प्रति भारत की निष्ठा और पुरानी यादों का सम्मान है, बल्कि यह पश्चिमी देशों को भी यह संदेश देता है कि भारत अपनी विदेश नीति के मामलों में किसी के दबाव में काम नहीं करेगा। आने वाले समय में, जब एशिया और यूरोप के बीच नए समीकरण बन रहे हैं, भारत और रूस की यह सदाबहार दोस्ती वैश्विक स्थिरता के लिए एक अहम कड़ी बनी रहेगी।








