उत्तराखंड ने खोया अपना एक और जांबाज आंदोलनकारी
उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलन के दौरान अपनी मुखर आवाज और सक्रिय भागीदारी से पहचान बनाने वाले वरिष्ठ कांग्रेस नेता कमला प्रसाद भट्ट अब हमारे बीच नहीं रहे। रविवार को उनके निधन की खबर जैसे ही फैली, पूरे राज्य में शोक की लहर दौड़ गई। कमला प्रसाद भट्ट उन चुनिंदा लोगों में शामिल थे जिन्होंने उत्तराखंड को एक अलग राज्य का दर्जा दिलाने के लिए सड़क से लेकर मंच तक लंबी और कठिन लड़ाई लड़ी थी। उनके जाने से राज्य ने एक ऐसा साहसी नेता खो दिया है, जो हमेशा जनहित के मुद्दों पर सबसे आगे खड़े रहते थे।
उनके परिवार और करीबी सूत्रों के अनुसार, पिछले कुछ समय से उनका स्वास्थ्य ठीक नहीं चल रहा था। रविवार को उन्होंने अंतिम सांस ली। उनके निधन की सूचना मिलते ही उनके पैतृक आवास और राजनीतिक कार्यालय पर शुभचिंतकों, समर्थकों और पार्टी कार्यकर्ताओं का तांता लगना शुरू हो गया। हर कोई अपने इस प्रिय नेता के अंतिम दर्शन करने के लिए पहुंच रहा है और नम आंखों से उन्हें याद कर रहा है।
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कांग्रेस पार्टी और राजनीतिक जगत में गहरा शोक
कमला प्रसाद भट्ट के निधन पर कांग्रेस पार्टी के शीर्ष नेतृत्व से लेकर स्थानीय स्तर के कार्यकर्ताओं तक ने गहरा दुख व्यक्त किया है। पार्टी के कई वरिष्ठ नेताओं ने उनके आवास पर पहुंचकर शोक संतप्त परिवार को ढांढस बंधाया। नेताओं ने कहा कि कमला प्रसाद भट्ट का पूरा जीवन जनसेवा और उत्तराखंड की बेहतरी के लिए समर्पित था। उन्होंने कांग्रेस पार्टी को मजबूत करने के साथ-साथ आम जनता की समस्याओं को हमेशा सरकार के सामने मजबूती से रखा।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि भट्ट का जाना केवल कांग्रेस पार्टी के लिए ही नहीं, बल्कि संपूर्ण उत्तराखंड के राजनीतिक परिदृश्य के लिए एक अपूरणीय क्षति है। वह धरातल से जुड़े हुए ऐसे नेता थे जो बिना किसी दिखावे के जनता के बीच रहकर काम करते थे। आज के दौर में जब राजनीति में विचारधारा से ज्यादा निजी स्वार्थ हावी होता जा रहा है, कमला प्रसाद भट्ट जैसी शख्सियतें मूल्यों की राजनीति का एक बेहतरीन उदाहरण थीं।
"कमلا प्रसाद भट्ट जी का निधन उत्तराखंड आंदोलन और कांग्रेस परिवार के लिए एक बहुत बड़ा आघात है। राज्य के निर्माण में उनका योगदान कभी भुलाया नहीं जा सकता। ईश्वर उनकी आत्मा को शांति दे और परिवार को यह दुख सहने की शक्ति प्रदान करे।" — स्थानीय कांग्रेस नेतृत्व
राज्य आंदोलन के दिनों को किया जा रहा है याद
नब्बे के दशक में जब उत्तराखंड को अलग राज्य बनाने की मांग को लेकर पूरा पहाड़ उबल रहा था, तब कमला प्रसाद भट्ट अग्रिम पंक्ति के आंदोलनकारियों में गिने जाते थे। उन्होंने राजधानी देहरादून से लेकर दूर-दराज के पहाड़ी इलाकों तक युवाओं को एकजुट करने का काम किया। पुलिस की लाठियों और दमनकारी नीतियों के बावजूद उनके हौसले कभी पस्त नहीं हुए। यही वजह है कि आज जब वे इस दुनिया में नहीं हैं, तो राज्य आंदोलन से जुड़ा हर पुराना साथी उन्हें नम आंखों से याद कर रहा है।
बुजुर्ग आंदोलनकारी बताते हैं कि किस तरह कमला प्रसाद भट्ट ने हर मोर्चे पर अपनी नेतृत्व क्षमता का परिचय दिया था। वे न केवल एक अच्छे वक्ता थे बल्कि कुशल संगठनकर्ता भी थे। अलग राज्य बनने के बाद भी वे चैन से नहीं बैठे, बल्कि राज्य के विकास, पलायन की समस्या और मूल निवास जैसे तमाम मुद्दों पर लगातार संघर्ष करते रहे। उनका पूरा जीवन इस बात का गवाह है कि कैसे एक आम इंसान अपनी प्रतिबद्धता से इतिहास रच सकता है।
सामाजिक और गैर-राजनीतिक संगठनों ने भी अर्पित की श्रद्धांजलि
सिर्फ राजनीतिक दलों के नेता ही नहीं, बल्कि उत्तराखंड के विभिन्न सामाजिक संगठनों, महिला मंगल दलों, छात्र संघों और व्यापारी संगठनों ने भी कमला प्रसाद भट्ट के निधन पर गहरा शोक व्यक्त किया है। जगह-जगह शोक सभाओं का आयोजन किया गया, जहां दो मिनट का मौन रखकर दिवंगत आत्मा की शांति के लिए प्रार्थना की गई। वक्ताओं ने कहा कि भट्ट जी ने कभी अपने सिद्धांतों से समझौता नहीं किया और हमेशा आम आदमी की लड़ाई लड़ी।
स्थानीय नागरिकों का कहना है कि आने वाली पीढ़ियों को कमला प्रसाद भट्ट के जीवन संघर्ष से प्रेरणा लेनी चाहिए। उन्होंने जिस निष्ठा के साथ उत्तराखंड के निर्माण और उसकी संवारने में अपना योगदान दिया, वह हम सबके लिए एक मिसाल है। उनके निधन से राज्य की उस पुरानी पीढ़ी का एक और मजबूत स्तंभ ढह गया है, जिसने बिना किसी स्वार्थ के केवल और केवल राज्य हित को सर्वोपरि रखा था।
अंतिम विदाई और आगे की औपचारिकताएं
प्राप्त जानकारी के अनुसार, कमला प्रसाद भट्ट का अंतिम संस्कार पूरे राजकीय और सामाजिक सम्मान के साथ उनकी गृह जनपद या निर्धारित स्थल पर किया जाएगा। अंतिम यात्रा में शामिल होने के लिए प्रदेशभर से आंदोलनकारी और पार्टी कार्यकर्ता पहुंच रहे हैं। प्रशासन ने भी भीड़ को नियंत्रित करने और यातायात व्यवस्था सुचारू बनाए रखने के लिए उचित इंतजाम किए हैं।
निष्कर्ष के तौर पर कहा जा सकता है कि कमला प्रसाद भट्ट भौतिक रूप से भले ही हमारे बीच नहीं रहे हैं, लेकिन उनके विचार, उनका संघर्ष और उत्तराखंड के प्रति उनका समर्पण हमेशा अमर रहेगा। राज्य की जनता उन्हें हमेशा एक सच्चे सिपाही और जननेता के रूप में याद रखेगी। उनकी कमी को भरना आसान नहीं होगा, लेकिन उनके दिखाए मार्ग पर चलकर ही उत्तराखंड के सपनों को साकार किया जा सकता है।



