पटना: बिहार की सियासत में एक बार फिर जेडीयू के भीतरखाने सुलग रही चिंगारी सतह पर आ गई है। मोकामा के बाहुबली और पूर्व विधायक अनंत सिंह तथा पार्टी के मुख्य प्रवक्ता सह विधान पार्षद नीरज कुमार के बीच तनातनी थमने का नाम नहीं ले रही है। इस बीच, पार्टी के वरिष्ठ नेता और केंद्रीय मंत्री राजीव रंजन सिंह उर्फ ललन सिंह ने इस पूरे मामले में मध्यस्थता करने से साफ इनकार कर दिया है। पटना के राजनीतिक गलियारों में इस बात की चर्चा जोरों पर थी कि पार्टी आलाकमान ने 'अनंत कथा' के इस अध्याय को समेटने की जिम्मेदारी ललन सिंह को सौंपी है, लेकिन ललन सिंह के कड़े रुख ने तमाम अटकलों पर विराम लगा दिया है।
'मैं झगड़े में नहीं पड़ता': ललन सिंह का स्पष्ट संदेश
जब मीडियाकर्मियों ने केंद्रीय मंत्री ललन सिंह से अनंत सिंह और नीरज कुमार के बीच चल रहे इस शीत युद्ध और सुलह की संभावनाओं के बारे में सवाल किया, तो उनका जवाब बेहद सपाट और दो टूक था। ललन सिंह ने दो शब्दों में अपनी स्थिति स्पष्ट करते हुए कहा, "मैं इन झगड़ों में नहीं पड़ता।" उनके इस बयान ने राजनीतिक हलकों में यह संदेश दे दिया है कि पार्टी के शीर्ष स्तर पर इस आंतरिक कलह को फिलहाल स्थानीय या व्यक्तिगत स्तर पर ही सुलझाने की अपेक्षा की जा रही है, या फिर जेडीयू नेतृत्व इस विवाद में सीधे तौर पर हाथ डालकर किसी एक पक्ष को असहज नहीं करना चाहता।
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'एक घाट पर बाघ-बकरी': सुलह की उठी थीं सुगबुगाहटें
पिछले कुछ दिनों से राजनीतिक गलियारों में यह चर्चा गर्म थी कि पार्टी के भीतर असहजता पैदा कर रहे इस विवाद को खत्म करने के लिए कोई बड़ा फॉर्मूला तैयार किया जा रहा है। सियासी विश्लेषक इसे 'एक घाट पर बाघ और बकरी को एक साथ पानी पिलाने' जैसी कूटनीतिक कवायਦ मान रहे थे। सूत्र बता रहे थे कि जेडीयू के भीतर अनुशासन और समन्वय बनाए रखने के लिए दोनों नेताओं के बीच पैचअप कराने की पुरजोर कोशिशें हो सकती हैं। हालांकि, ललन सिंह के मैदान से हटने के बाद अब यह सवाल फिर से खड़ा हो गया है कि इस 'अनंत कथा' का अंत आखिर कैसे होगा।
मोकामा विधायक की बगावत और पार्टी की दुविधा
अनंत सिंह की राजनीतिक वापसी के बाद से ही जेडीयू के भीतर समीकरण बदलने लगे थे। मोकामा क्षेत्र में उनकी पकड़ और नीरज कुमार द्वारा अक्सर मुखर होकर उठाए जाने वाले मुद्दों के बीच वैचारिक और शैलीगत टकराव जगजाहिर है। पार्टी के भीतर दो ध्रुवों के आमने-सामने आने से कार्यकर्ताओं में भी असमंजस की स्थिति बन रही है। एक तरफ जहां पार्टी आगामी बजट और विकास के एजेंडे—जैसे छोटे उद्योगों को बढ़ावा देने संबंधी नीतियों—पर ध्यान केंद्रित करना चाहती है, वहीं इस तरह के आंतरिक विवाद सरकार और संगठन का ध्यान भटकाने का काम कर रहे हैं।
आगे क्या होगा? जेडीयू के सामने बड़ी चुनौती
- अनंत सिंह और नीरज कुमार के बीच बढ़ती दूरी को पाटने के लिए अब पार्टी कौन सा वैकल्पिक मार्ग अपनाएगी?
- क्या मुख्यमंत्री नीतीश कुमार खुद इस मामले में सीधा हस्तक्षेप करेंगे या इसे समय के साथ शांत होने दिया जाएगा?
- आगामी चुनावों और सांगठनिक एकजुटता के लिहाज से इस आंतरिक कलह का पार्टी पर कितना असर पड़ेगा?
हमारी ऑन-ग्राउंड इन्वेस्टिगेशन यह बताती है कि यह सिर्फ दो नेताओं की व्यक्तिगत तनातनी नहीं है, बल्कि यह जेडीयू के भीतर बदलते पावर डायनेमिक्स का परिणाम है। जब तक शीर्ष नेतृत्व इस पर कोई ठोस अनुशासनात्मक या वैचारिक रुख नहीं अपनाता, तब तक इस तरह के बयानबाजी के दौर थमने वाले नहीं हैं। 'द फ्रीलान्स' इस पूरी खबर पर पैनी नजर बनाए रखेगा।








