मुंबई/ग्राउंड ब्यूरो — महाराष्ट्र के युवाओं और छात्रों के लिए पिछले दस दिनों से तनाव का माहौल बना हुआ था। राज्य लोक सेवा आयोग यानी एमपीएससी की परीक्षाओं और कार्यप्रणाली को लेकर छात्र सड़क पर उतर आए थे। उनका साफ कहना था कि परीक्षा के नतीजों और चयन प्रक्रिया में भारी देरी हो रही है। इस बीच, सरकार ने आंदोलन कर रहे छात्रों के दबाव के आगे झुकते हुए एक बड़ा और सख्त फैसला लिया है। प्रशासन ने व्यवस्था में सुधार लाने के लिए एक विशेष समिति का गठन किया है और इसके सचिव पद की जिम्मेदारी अपने तेज-तर्रार और कड़क अफसर के रूप में पहचाने जाने वाले तुकाराम मुंढे को सौंप दी है।
इस पूरे घटनाक्रम की शुरुआत करीब पांच महीने पहले हुई थी जब छात्र लगातार लंबित परीक्षाओं और नतीजों को लेकर आवाज उठा रहे थे। स्थिति तब और बिगड़ गई जब छात्रों का सब्र टूट गया और वे मुंबई सहित कई शहरों में धरने पर बैठ गए। आंदोलन पूरे दस दिनों तक बिना रुके चलता रहा। छात्र नेताओं का कहना था कि आयोग के काम करने का तरीका बेहद सुस्त है और इससे लाखों युवाओं का भविष्य अधर में लटक रहा है। इस बीच आयोग के अध्यक्ष विवेक भीमनवार को छुट्टी पर भेजना पड़ा ताकि हालात को कुछ हद तक ठंडा किया जा सके और बातचीत का रास्ता निकाला जा सके।
तुकाराम मुंढे की एंट्री से जगी नई उम्मीद
जैसे ही सरकार ने तुकाराम मुंढे को एमपीएससी समिति का सचिव बनाने का आदेश जारी किया, वैसे ही राजनीतिक गलियारों और छात्र समूहों में चर्चाएं तेज हो गईं। तुकाराम मुंढे अपनी सख्त छवि और नियमों का कड़ाई से पालन कराने के लिए जाने जाते हैं। जनता और छात्र वर्ग में यह माना जा रहा है कि यदि कोई अधिकारी इस बिगड़ी हुई व्यवस्था को सुधार सकता है, तो वह तुकाराम मुंढे ही हैं। पिछले कई महीनों से आयोग के दफ्तरों में फाइलें अटकी पड़ी थीं और परीक्षाएं समय पर नहीं हो पा रही थीं। अब नए सचिव के आने से दफ्तर के कामकाज में तेजी आने की पूरी उम्मीद जताई जा रही है।
छात्रों के प्रतिनिधिमंडल ने सरकार के इस फैसले के बाद अपना आंदोलन फिलहाल वापस ले लिया है। उनका कहना है कि वे सरकार के इस कदम का स्वागत करते हैं, लेकिन उनकी नजरें इस बात पर टिकी हैं कि समिति जमीन पर कितना असर दिखाती है। पिछले पांच महीनों से प्रशासनिक सुस्ती के कारण छात्रों को जो मानसिक परेशानी झेलनी पड़ी थी, उसका गुस्सा उनके चेहरों पर साफ झलक रहा था। आंदोलन खत्म होने के बाद अब सड़कों पर शांति है, लेकिन दफ्तरों के भीतर बैठकों का दौर शुरू हो चुका है ताकि जल्द से जल्द नया परीक्षा कैलेंडर जारी किया जा सके।
सुधार समिति के सामने होंगी बड़ी चुनौतियां
नया जिम्मा संभालने के बाद तुकाराम मुंढे और उनकी समिति के सामने काम करना बिल्कुल भी आसान नहीं होगा। सबसे बड़ी चुनौती यह है कि पिछले कई महीनों से रुकी हुई परीक्षाओं की तारीखों का ऐलान किया जाए। इसके अलावा, कॉपियों की जांच में देरी और परिणामों के प्रकाशन में होने वाली गड़बड़ियों को जड़ से खत्म करना होगा। छात्रों ने चेतावनी दी है कि यदि इस बार भी वादे पूरे नहीं हुए, तो वे फिर से सड़कों पर उतरने से पीछे नहीं हटेंगे। ऐसे में सरकार और नए सचिव दोनों पर ही काम को समय पर पूरा करने का भारी दबाव बना हुआ है।
जमीनी स्तर पर देखा जाए तो महाराष्ट्र का यह पूरा घटनाक्रम प्रशासनिक पारदर्शिता की बड़ी मांग को सामने लाता है। देश के अन्य राज्यों के युवाओं की तरह यहां के छात्र भी चाहते हैं कि सरकारी नौकरियों के इम्तिहान बिना किसी विवाद के समय पर पूरे हों। द फ्रीलान्स की टीम ने जब मौके पर जाकर छात्रों से बातचीत की, तो उन्होंने साफ कहा कि उन्हें सिर्फ आश्वासनों से काम नहीं चलेगा, बल्कि धरातल पर बदलाव चाहिए। अब सबकी निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि तुकाराम मुंढे अपनी इस नई भूमिका में परीक्षा प्रणाली को कितना पारदर्शी और तेज बना पाते हैं।
प्रशासनिक फेरबदल और आगे की रणनीति
इस पूरे विवाद के बीच राज्य सरकार ने यह दिखाने की कोशिश की है कि वह युवाओं की समस्याओं को लेकर गंभीर है। आयोग के अध्यक्ष का छुट्टी पर जाना और एक सख्त अफसर को सचिव पद पर बिठाना सरकार का एक रणनीतिक कदम माना जा रहा है। आने वाले हफ्तों में यह समिति अपनी रिपोर्ट सौंपेगी और सुधारों के नए नियम लागू किए जाएंगे। द फ्रीलान्स इस मामले पर लगातार नजर बनाए रखेगा और देखता रहेगा कि क्या छात्रों को उनका हक समय पर मिलता है या यह सिर्फ कागजी बदलाव बनकर रह जाता है।






