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राजनीतिपढ़ने में समय: 4 मिनट

बंगाल उपचुनाव से पहले बड़ा सियासी उलटफेर: ममता की कैंडिडेट संचिता ने वापस लिया नाम, नंदीग्राम में अब कांग्रेस को समर्थन

पश्चिम बंगाल की दो विधानसभा सीटों पर होने वाले उपचुनाव से ठीक पहले ममता बनर्जी को बड़ा झटका लगा है। नंदीग्राम से ममता गुट की उम्मीदवार संचिता प्रधान डे ने अपना नामांकन वापस ले लिया है, जिसके बाद टीएमसी सुप्रीमो ने कांग्रेस उम्मीदवार का समर्थन करने का ऐलान किया है।
The Freelance ब्यूरो
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18 सितंबर 2026 • अपडेटेड
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बंगाल उपचुनाव से पहले बड़ा सियासी उलटफेर: ममता की कैंडिडेट संचिता ने वापस लिया नाम, नंदीग्राम में अब कांग्रेस को समर्थन
📷 बंगाल उपचुनाव से पहले बड़ा सियासी उलटफेर: ममता की कैंडिडेट संचिता ने वापस लिया नाम, नंदीग्राम में अब कांग्रेस को समर्थन — मुख्य घटनाक्रमफोटो साभार: रॉयटर्स / एजेंसीज़ / सोशल मीडिया

खबर की बड़ी बातें (Key Highlights)

  • नंदीग्राम सीट पर उपचुनाव से 18 दिन पहले ममता गुट की प्रत्याशी संचिता प्रधान डे ने पीछे हटते हुए अपना नाम वापस ले लिया।
  • नामांकन वापसी के बाद ममता बनर्जी ने ऐलान किया है कि उनकी पार्टी अब नंदीग्राम सीट पर कांग्रेस उम्मीदवार का समर्थन करेगी।
  • चुनाव आयोग ने टीएमसी के दोनों गुटों को अलग-अलग नाम और चुनाव चिह्न आवंटित कर दिए हैं, जिससे मुकाबला दिलचस्प हो गया है।
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पश्चिम बंगाल की राजनीति में बड़ा सियासी ड्रामा

पश्चिम बंगाल की सियासत में इन दिनों भूचाल आया हुआ है। राज्य में दो विधानसभा सीटों पर होने वाले उपचुनाव से ठीक 18 दिन पहले एक बड़ा सियासी उलटफेर देखने को मिला है। ममता बनर्जी के गुट की तरफ से नंदीग्राम सीट पर उतारी गई उम्मीदवार संचिता प्रधान डे ने अपना नामांकन वापस ले लिया है। इस फैसले के बाद राज्य की राजनीति गर्मा गई है और सभी दलों की नजरें इस हाई-प्रोफाइल सीट पर टिक गई हैं।

उम्मीदवार के मैदान से हटने के तुरंत बाद ममता बनर्जी ने एक प्रेस कॉन्फ्रेंस बुलाई। इसमें उन्होंने साफ कर दिया कि उनकी पार्टी अब नंदीग्राम उपचुनाव में कांग्रेस उम्मीदवार का समर्थन करेगी। संचिता ने अपना नाम वापस लेने से पहले मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी से भी मुलाकात की थी, जिसके बाद से राजनीतिक गलियारों में चर्चाओं का बाजार गर्म हो गया है।

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नंदीग्राम सीट का इतिहास और सियासी समीकरण

नंदीग्राम सीट लंबे समय से टीएमसी और बीजेपी के बीच सियासी जंग का मुख्य अखाड़ा रही है। साल 2007 का भूमि अधिग्रहण आंदोलन यहीं से शुरू हुआ था, जिसने ममता बनर्जी और टीएमसी को साल 2011 में सत्ता की कुर्सी तक पहुंचाने में अहम भूमिका निभाई थी। पिछले विधानसभा चुनाव में खुद ममता बनर्जी ने यहां से किस्मत आजमाई थी, लेकिन उन्हें हार का सामना करना पड़ा था।

मौजूदा समय में यह सीट काफी अहम मानी जा रही है क्योंकि 2021 के विधानसभा चुनाव के बाद से यहां का राजनीतिक समीकरण पूरी तरह बदल चुका है। शुभेंदु अधिकारी के बीजेपी में शामिल होने के बाद से यह क्षेत्र दोनों दलों के लिए प्रतिष्ठा की लड़ाई बन गया है। अब देखना यह है कि कांग्रेस और ममता के इस नए समीकरण से चुनावी नतीजों पर कितना असर पड़ता है।

चुनाव आयोग ने टीएमसी के दोनों गुटों को दिए नए नाम और सिंबल

सिर्फ उम्मीदवारों का घटना-बढ़ना ही नहीं, बल्कि पार्टी के नाम और चुनाव चिन्ह को लेकर भी बड़ा बदलाव हुआ है। चुनाव आयोग ने टीएमसी के दोनों बागी और मूल गुटों को अलग-अलग नाम और चुनाव चिह्न आवंटित कर दिए हैं। ममता बनर्जी के गुट को अब 'ममता ऑल इंडिया तृणमूल कांग्रेस' नाम मिला है और उनका नया चुनाव चिह्न 'फुटबॉल खिलाड़ी' तय किया गया है।

वहीं, दूसरे गुट को 'डेमोक्रेटिक तृणमूल कांग्रेस' नाम दिया गया है और उनका सिंबल 'लिफाफा' रखा गया है। आयोग के इस फैसले से पहले ही दोनों गुटों को 'ऑल इंडिया तृणमूल कांग्रेस' नाम और 'फूल-घास' वाले मूल चुनाव चिह्न के इस्तेमाल पर रोक लगा दी गई थी। अब दोनों ही गुट इन नए नामों और प्रतीकों के साथ चुनावी मैदान में उतरने के लिए पूरी तरह तैयार हैं।

क्या कहते हैं चुनावी जानकारों के आंकड़े

राजनीतिक जानकारों का मानना है कि ममता बनर्जी और कांग्रेस के एक साथ आने के बावजूद चुनावी गणित को साधना आसान नहीं होगा। पिछले चुनाव परिणामों पर नजर डालें तो बीजेपी को नंदीग्राम में भारी समर्थन मिला था और पार्टी का वोट शेयर काफी मजबूत स्थिति में था। इसके मुकाबले कांग्रेस का जनाधार इस सीट पर बेहद सीमित रहा है।

"जनता की सेवा ही हमारा सबसे बड़ा धर्म है और बंगाल की जनता अब पूरी सच्चाई जान चुकी है। हम हर मोर्चे पर विकास की राजनीति के साथ आगे बढ़ रहे हैं।" — शुभेंदु अधिकारी, मुख्यमंत्री, पश्चिम बंगाल

बहरहाल, नाम वापसी की समय-सीमा खत्म होने के बाद अब रिटर्निंग ऑफिसर अंतिम उम्मीदवारों की सूची जारी करेंगे। यह साफ है कि एक बार वैध तरीके से नाम वापस लेने के बाद कोई भी उम्मीदवार अपना फैसला नहीं बदल सकता। अब देखना यह होगा कि 6 अक्टूबर को होने वाले मतदान में जनता किसके सिर पर जीत का सेहरा बांधती है और 9 अक्टूबर को आने वाले नतीजे किसके पक्ष में जाते हैं।

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