कहते हैं सत्ता की मलाई जितनी मुलायम होती है, तासीर उससे ज्यादा भी फायर होती है। पर रिश्ते तो रिश्ते हैं। मोह से बचा कौन है। आकाश और उनकी माया बुआ की कहानी में भी कुछ ऐसा ही है। एक तरफ भतीजे का फ्यूचर है तो दूसरी तरफ कुर्सी, संगठन और जिम्मेदारियां। इन सबके बीच इमेज की बड़ी सी बिल्डिंग भी है।
बुआ-भतीजे का रिश्ता और सियासत का अनुशासन
बुआ जब मायके में होती है तो सबसे ज्यादा आनंद भतीजे को आता है, क्योंकि बुआ भतीजे को आकाश-भर दुलार करती है। बुआ, फूफाओं की तरह लॉन्गटर्म गुस्सा नहीं रहती। वह मायके की वह इकलौती सख्त-जुबान होती है जिसका कहा ब्रह्मा की लकीर होता है। भतीजे की ससुराल तक बुआ का सिक्का चलता है। भतीजे की सास हो या ससुर, बुआ चिढ़ जाए तो जुबान की कैंची चलाने में कतराती नहीं, क्योंकि यह उसका जन्मसिद्ध अधिकार होता है।
बुआ-भतीजे के रिश्ते में अपनापन, अधिकार के साथ ही तमाशा बन जाने वाली नोकझोंक भी लाजमी है। एकबारगी बुआ भतीजे से यह कह दे कि हमसे ज्यादा समझदार हो गए हो क्या? तो इसमें कोई हैरानी थोड़े है। अब यूपी की सियासत ही देख लो। आकाश की माया बुआ भी लंबे अर्से से प्यार, दुलार, दुत्कार और फिर प्यार करती दिख रही हैं।
राजनीति में बुआ और भतीजे का रिश्ता...
उत्तराधिकार और पार्टी की मर्यादा
मायावती कभी भतीजे को उत्तराधिकारी घोषित करती हैं तो कभी कांशीराम और बाबा साहेब भीमराव आंबेडकर के आदर्शों की दुहाई देकर पार्टी से बाहर कर देती हैं। बुआ का मानना है कि आकाश ससुराल के कहने पर चलते हैं। खासकर ससुर के कहने पर। सामान्य तौर पर भतीजा बुआ को जवाब दे सकता है पर सियासत वाली बुआ काफी सख्त है। बात जब मायावती की हो तो आकाश जैसा भतीजा यह कहने की भी हिम्मत नहीं जुटा सकता कि बुआ, अब जमाना बदल गया है।
मायावती सरकार में रहें या ना रहें, फिल्मी 'नारायण शंकर' की तरह उनके राजनीतिक गुरुकुल में भी परंपरा, प्रतिष्ठा, अनुशासन... तीन स्तंभ हैं। बुआ का अनुशासन बोलता है। उनके कोप का कई अधिकारी और नेता भाजन हुए हैं। उनकी अपनी अलग एक सत्ता है। पार्टी लाइन से अलग होने का मतलब गेट आउट... यह उनकी शैली है। कई बार आकाश का अंदाज इस लाइन से टकराता दिखाई दिया।
पारिवारिक संतुलन और राजनीतिक कसौटी
इन सबसे बड़ा सवाल है उत्तराधिकार का। आकाश को उत्तराधिकारी बनाने का मतलब पार्टी की अगली पीढ़ी तैयार करना था लेकिन मायावती के मामले में ऐसा नहीं है। गद्दी पर बुआ ही बैठेंगी। नियम भी बुआ का ही चलेगा। मायावती सियासत की मंझी हुई खिलाड़ी हैं। उनको पता है कि दिमाग और दम चाहिए, सिर्फ गुस्सा नहीं। उनकी पाठशाला में अनुशासन सबसे ऊपर है।
बुआ बार-बार आकाश को सियासी कसौटी में कस रही हैं। वह यह भी बता रही हैं कि मायके में चलेगी तो सिर्फ बुआ की। बुआ के होते हुए ससुराल की दाल लखनऊ में तो कतई नहीं गलेगी। दाल भी मायके की होगी, नमक भी मायके का और इसे पकाया भी मायके में ही जाएगा। खैर अब आगे देखना है कि इस दाल में आकाश को आनंद आता है या नहीं।
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