राजस्थान निकाय चुनाव में मिली मामूली जीत पर बसपा सुप्रीमो मायावती की खुशी
देश के सबसे बड़े सूबे उत्तर प्रदेश की चार बार मुख्यमंत्री रहीं मायावती की अगुवाई वाली बहुजन समाज पार्टी (बसपा) का राजनीतिक ग्राफ इन दिनों लगातार ढलान पर है. देश के कई राज्यों में पार्टी का सूपड़ा साफ हो चुका है और उत्तर प्रदेश जैसे गढ़ में भी पार्टी का पारंपरिक वजूद अब सिमटता नजर आ रहा है. राष्ट्रीय पार्टी का दर्जा बचाने के लिए संघर्ष कर रही बसपा के लिए हर छोटी जीत अब एक बड़ी राहत की तरह बन चुकी है. ऐसा ही एक नजारा हाल ही में राजस्थान के नगर निकाय चुनावों के दौरान देखने को मिला.
राजस्थान में हाल ही में संपन्न हुए 309 नगर निकायों के चुनाव में कुल 10,244 वार्डों के लिए वोट डाले गए थे. इन चुनावों में भारतीय जनता पार्टी सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी, जिसने 4,179 सीटों पर जीत हासिल की. वहीं, कांग्रेस पार्टी को 3,613 सीटों पर सफलता मिली, जबकि 2,273 सीटों पर निर्दलीय उम्मीदवारों ने बाजी मारी. इस लंबी चौड़ी चुनावी जंग में बहुजन समाज पार्टी सिर्फ 19 वार्डों में अपने पार्षद जिताने में कामयाब हो पाई. हैरानी की बात यह है कि देश भर में सिमटती जा रही मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी (माकपा) ने भी इस चुनाव में 38 सीटों पर जीत दर्ज की, जो बसपा से ठीक दोगुनी है.
इसके बावजूद बसपा सुप्रीमो मायावती ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म 'एक्स' पर पोस्ट कर इस मामूली सफलता पर खुशी जाहिर की और पार्टी कार्यकर्ताओं को बधाई दी. राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि पार्टी के बिखरते जनाधार और निराश हो रहे समर्थकों के बीच हौसलाफजाई बनाए रखने के लिए मायावती का यह प्रयास था, ताकि कैडर पूरी तरह से नाउम्मीद न हो जाए.
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राष्ट्रीय पार्टी का दर्जा बचाने की कड़ी चुनौती और घटता वोट बैंक
बहुजन समाज पार्टी के लिए यह स्थिति बेहद चिंताजनक है कि वह अपने अस्तित्व को बचाने के लिए जूझ रही है. वर्ष 1984 में कांशीराम द्वारा स्थापित और 1996 में चुनाव आयोग द्वारा राष्ट्रीय दल का दर्जा पाने वाली बसपा का राजनीतिक सफर उतार-चढ़ाव से भरा रहा है. एक दौर ऐसा भी था जब साल 2007 में उत्तर प्रदेश में पूर्ण बहुमत की सरकार बनाने के बाद 2010 से 2012 के बीच राज्यसभा में बसपा के 18 सांसद हुआ करते थे. लेकिन आज उत्तर प्रदेश विधानसभा में पार्टी का एक भी विधायक नहीं बचा है.
चुनाव चाहे लोकसभा का हो या विधानसभा का, बसपा की सीटें और मत प्रतिशत लगातार कम होता जा रहा है. वर्ष 2007 से 2012 के दौरान 22 से 25 प्रतिशत तक वोट शेयर हासिल करने वाली पार्टी अब यूपी में सिमटकर मात्र 9 से 10 प्रतिशत वोट शेयर पर अटक गई है. साल 2024 के आम चुनाव में तो स्थिति और भी दयनीय हो गई, जब देश भर में बसपा को केवल दो प्रतिशत के आसपास ही वोट मिल पाए. राजनीतिक जानकारों का कहना है कि निर्वाचन आयोग द्वारा राष्ट्रीय पार्टियों के नियमों की समीक्षा किए जाने की स्थिति में बसपा के सामने अपना राष्ट्रीय दर्जा बचाए रखना भी एक बड़ी चुनौती बन गया है.
घर के भीतर बढ़ता कलह और परिवार के सदस्यों का मोहभंग
बसपा के इस पतन के पीछे केवल बाहरी राजनीतिक परिस्थितियां ही नहीं, बल्कि पार्टी के भीतर चल रही गृह कलह भी एक बड़ा कारण है. मायावती के फैसलों और उनकी कार्यशैली को लेकर पार्टी के भीतर अक्सर असंतोष की खबरें सामने आती रही हैं. पहले उन्होंने अपने समधी अशोक सिद्धार्थ को पार्टी से निकाला, फिर वापस लाकर बड़े पदों से नवाजा और अंततः पार्टी से बाहर का रास्ता दिखा दिया. इसके बाद उन्होंने राजनीति से संन्यास तक की शर्त रख दी, जिससे पार्टी का एक बड़ा तबका असहज हो गया.
युवाओं को पार्टी से जोड़ने के लिए मायावती ने अपने भतीजे आकाश आनंद को आगे किया और उन्हें अपना उत्तराधिकारी घोषित किया. लेकिन बिना किसी स्पष्ट गलती के उन्हें अचानक सभी पदों से हटा दिया गया और फिर वापस लाने का सिलसिला चला. बाद में उत्तराधिकारी पद से हटाने के इस फैसले ने पार्टी के भीतर गहरी दरार पैदा कर दी. इसके बाद आकाश आनंद के छोटे भाई ईशान आनंद को मुख्य सेक्टर प्रभारी बनाया गया, लेकिन महज एक हफ्ते के भीतर ही उस पद को ही समाप्त कर दिया गया. इन अंदरूनी विवादों और फैसलों के चलते पार्टी के भीतर असंतोष की आग सुलगती रही है.
भरोसेमंद नेताओं का पलायन और कैडर का बिखरना
मायावती की कार्यशैली पर सवाल उठाते हुए राजनीतिक विश्लेषक मानते हैं कि पार्टी में जरा सी भी शिकायत मिलने पर बिना उचित संवाद के नेताओं को सीधे बाहर का रास्ता दिखा दिया जाता है. इस वजह से बसपा के कई कद्दावर और वफादार नेता पार्टी छोड़कर अन्य दलों में शामिल हो गए. जिन नेताओं के भरोसे बसपा का दलित और बहुजन कैडर खड़ा था, वे आज समाजवादी पार्टी, भारतीय जनता पार्टी और अन्य दलों में बड़े पदों पर आसीन हैं.
"कांशीराम जी की विचारधारा बहुत ऊंची थी और उसे मानने वाले करोड़ों लोग आज भी देश में मौजूद हैं, लेकिन वर्तमान नेतृत्व की कार्यशैली और लगातार लिए जा रहे फैसलों ने पार्टी को इस कगार पर लाकर खड़ा कर दिया है जहां से वापसी बेहद कठिन नजर आती है।" — अनिल जय हिंद, राष्ट्रीय अध्यक्ष, कांग्रेस पिछड़ा वर्ग विभाग
नेताओं के पार्टी छोड़ने के साथ ही उनका समर्थक वर्ग भी उनके साथ दूसरी पार्टियों में शिफ्ट हो गया है. इसका सीधा नुकसान बहुजन समाज पार्टी को उठाना पड़ रहा है.
निष्कर्ष: क्या बसपा अपनी खोई हुई जमीन वापस पा सकेगी?
आगामी विधानसभा चुनावों से पहले बहुजन समाज पार्टी के सामने अपने वजूद को बचाने की सबसे बड़ी अग्निपरीक्षा है. एक तरफ जहां पार्टी का पारंपरिक दलित वोट बैंक तेजी से छिटककर अन्य दलों की ओर जा रहा है, वहीं दूसरी तरफ सांगठनिक कमजोरी और घर के भीतर का कलेह पार्टी को अंदर से खोखला कर रहा है. राजस्थान निकाय चुनाव में 19 सीटें जीतने पर भले ही मायावती ने संतोष जताया हो, लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि देश के सबसे बड़े दलित राजनीतिक आंदोलन को अपनी प्रासंगिकता बचाए रखने के लिए अब बहुत बड़े और कड़े बदलावों की जरूरत है.





