देशभर में इस साल मानसून के जाने का तय समय सितंबर महीने का आखिरी हफ्ता था। कैलेंडर के हिसाब से बारिश का मौसम जा चुका है और लोग हल्की सर्दी की उम्मीद कर रहे थे। लेकिन हकीकत इसके बिल्कुल उलट है। आज भी देश के कई बड़े राज्यों में अचानक काले बादल छा जाते हैं और झमाझम बारिश शुरू हो जाती है। यह सवाल हर आम आदमी के मन में है कि आखिर मानसून की विदाई के बाद भी ये बादल क्यों बरस रहे हैं। खेत में खड़ी फसलें बर्बाद हो रही हैं और लोगों को समझ नहीं आ रहा कि मौसम का यह कौन सा नया रूप सामने आ गया है।
इस अजीब मौसम के पीछे मुख्य वजह ग्लोबल वार्मिंग और प्रशांत महासागर में चल रही मौसमी हलचल है। मौसम विभाग के जानकारों का कहना है कि इस बार सुपर अल नीनो ने पूरी दुनिया के मौसम का चक्र बिगाड़ दिया है। अल नीनो वह स्थिति है जब समुद्र का पानी सामान्य से ज्यादा गर्म हो जाता है। इससे हवाओं का दबाव और रुख दोनों बदल जाते हैं। भारत के आसपास नमी वाली हवाएं लगातार पहुंच रही हैं। जब ये गर्म और नमी वाली हवाएं आपस में टकराती हैं, तो आसमान में अचानक भारी बादल बन जाते हैं। यही वजह है कि मानसून जाने के बाद भी अचानक तेज बारिश या गरज के साथ छींटे पड़ रहे हैं।
सुपर अल नीनो और ला-नीना का खतरनाक खेल
मौसम वैज्ञानिकों ने आने वाले महीनों के लिए एक और बड़ी चेतावनी जारी कर दी है। इस बार अल नीनो के बाद ला-नीना का प्रभाव भी देखने को मिल सकता है। इसका मतलब है कि इस बार सर्दी का मौसम बहुत लंबा खिंच सकता है। फरवरी और मार्च के महीने में भी कड़ाके की ठंड बनी रह सकती है और बसंत का मौसम काफी लेट हो सकता है। दुनिया भर के मौसम मॉडल यही इशारा कर रहे हैं कि धरती का तापमान लगातार बढ़ रहा है। तापमान बढ़ने से बादलों के बनने और बरसने का पूरा प्राकृतिक नियम उलट-पलट गया है। यही कारण है कि बेमौसम बारिश और लंबे समय तक रहने वाली सर्दी आम जनजीवन को बुरी तरह प्रभावित कर रही है।
मौसम के इस उतार-चढ़ाव का सीधा असर हमारे बाजारों और रसोई पर पड़ रहा है। बेमौसम बारिश की वजह से खेतों में तैयार हो रही धान, सोयाबीन और कपास की फसलें खराब हो गई हैं। इसके अलावा सब्जियों और चीनी के उत्पादन पर भी इसका बुरा असर पड़ा है। गन्ने की फसल समय पर नहीं पकने और बारिश से खराब होने के कारण चीनी की मिठास कड़वी होने लगी है। बाजार में चीनी और रोजमर्रा की सब्जियों के दाम तेजी से बढ़ने लगे हैं। आम आदमी की जेब पर इसका सीधा बोझ पड़ रहा है क्योंकि मौसम की मार से खाने-पीने की हर चीज महंगी होती जा रही है।
खेती-किसानी और आम आदमी की बढ़ती मुश्किलें
किसानों के लिए यह दौर बहुत चिंताजनक बना हुआ है। जो किसान अपनी फसल काटने की तैयारी कर रहे थे, उनके खेत पानी से भर गए हैं। सरकार और कृषि विभाग के अधिकारी नुकसान का आकलन करने में जुटे हैं, लेकिन किसानों का कहना है कि भरपाई होना बहुत मुश्किल है। दूसरी तरफ आम शहरों में रहने वाले लोग भी इस बदले हुए मौसम से परेशान हैं। कभी अचानक उमस भरी गर्मी तो कभी अचानक झमाझम बारिश लोगों को बीमार कर रही है। अस्पतालों में सर्दी, जुकाम और वायरल बुखार के मरीजों की संख्या तेजी से बढ़ रही है। मौसम का यह बदलाव सिर्फ प्रकृति का नियम नहीं, बल्कि पर्यावरण के साथ हुए खिलवाड़ का परिणाम है।
द फ्रीलान्स की जमीनी पड़ताल यह बताती है कि आने वाले दिनों में हमें मौसम के ऐसे ही और भी चौंकाने वाले रूप देखने को मिल सकते हैं। पारंपरिक मौसम चक्र अब कमजोर पड़ रहा है और ग्लोबल वेदर पैटर्न ज्यादा आक्रामक हो चुके हैं। पर्यावरणविदों का मानना है कि जब तक हम प्रकृति के संतुलन को बचाने के लिए कड़े कदम नहीं उठाएंगे, तब तक किसानों और आम जनता को ऐसे ही संकटों का सामना करना पड़ेगा। फिलहाल देश के लोगों को बदलते मौसम के हिसाब से अपनी तैयारी रखनी होगी और कृषि बाजारों में बढ़ती महंगाई के लिए भी तैयार रहना होगा।



