देश की राजधानी दिल्ली से लेकर राज्यों के कई जिलों तक इस समय सियासी पारा सातवें आसमान पर है। चुनाव और प्रशासनिक फैसलों को लेकर मुख्य विपक्षी दलों ने तीखा विरोध शुरू कर दिया है। ज्ञानेश कुमार के खिलाफ नाराजगी जताने के लिए सड़क पर उतरे विपक्षी दलों के तेवर इन दिनों काफी तीखे बने हुए हैं। आम आदमी पार्टी और कांग्रेस के कार्यकर्ता जब एक साथ सड़कों पर उतरे, तो शुरुआती जोश धीरे-धीरे आपसी तनातनी में बदल गया। दोनों दलों के नेताओं के बीच मंच साझा करने और अपनी बात ऊपर रखने की होड़ साफ देखी जा सकती है।
बिहार के अररिया जिले के फारबिसगंज में इंडिया गठबंधन की तरफ से एक बड़ा प्रदर्शन आयोजित किया गया था। इस प्रदर्शन के दौरान मुख्य नेताओं के पुतले फूंके गए और जमकर नारेबाजी की गई। लेकिन जमीनी स्तर पर कार्यकर्ताओं का यह गुस्सा सिर्फ विरोध तक सीमित नहीं रहा। स्थानीय नेताओं के बीच वर्चस्व की लड़ाई और श्रेय लेने की होड़ ने आपसी रिश्तों में खटास पैदा कर दी है। कांग्रेस और आम आदमी पार्टी के स्थानीय कार्यकर्ता मंच पर ही एक-दूसरे को नीचा दिखाने का प्रयास करते नजर आए, जिससे गठबंधन के भीतर की कलह खुलकर सामने आ गई है।
सड़क पर प्रदर्शन के दौरान दिखा आपसी टकराव
राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली में भी हालात कुछ अलग नहीं हैं। बीते दिनों हुए विरोध प्रदर्शन के दौरान राहुल गांधी और प्रियंका गांधी समेत कई बड़े नेताओं को पुलिस ने हिरासत में ले लिया था। इस कार्रवाई के बाद कांग्रेस पार्टी ने सरकार के खिलाफ सख्त चेतावनी जारी की है। हालांकि, इस पूरे घटनाक्रम के बीच जब विपक्षी दलों की साझा रणनीति बनाने की बात आई, तो आम आदमी पार्टी और कांग्रेस के सुर अलग-अलग सुनाई दिए। दोनों दल भले ही एक मंच पर ज्ञानेश कुमार के खिलाफ खड़े होने का दावा कर रहे हैं, लेकिन अंदरखाने सीटों और नेतृत्व को लेकर खींचतान जारी है।
दूसरी तरफ, सत्ताधारी भारतीय जनता पार्टी ने इस पूरे घटनाक्रम पर बेहद आक्रामक रुख अपना रखा है। पिछले बारह घंटों के भीतर पार्टी की ओर से चार प्रेस कॉन्फ्रेंस की गईं और दो बड़े मंत्रियों ने खुलकर विपक्ष के सवालों के जवाब दिए। भाजपा का यह रणनीतिक पलटवार सीधे तौर पर राहुल गांधी और उनके बयानों को घेरने के लिए था। भाजपा नेताओं का साफ कहना है कि विपक्ष के पास कोई ठोस मुद्दा नहीं बचा है और वे केवल जनता को गुमराह करने के लिए इस तरह के प्रदर्शन का सहारा ले रहे हैं।
बीजेपी का पलटवार और कांग्रेस की नई चाल
राजनीतिक गलियारों में चर्चा इस बात की भी तेज हो गई है कि कांग्रेस पार्टी अब एक नया दांव खेलने की तैयारी में है। पार्टी सूत्रों के अनुसार, कांग्रेस कुछ पुरानी फाइलों और पुराने फैसलों को दोबारा से खंगालने की रणनीति बना रही है। इससे आने वाले दिनों में ज्ञानेश कुमार की मुश्किलें बढ़ सकती हैं। कांग्रेस का मानना है कि यदि दो दशक पुराने मामलों को फिर से उठाया जाए, तो सरकार और प्रशासन की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े किए जा सकते हैं। इस रणनीति के जरिए कांग्रेस एक बार फिर से विपक्ष की धुरी बनने की कोशिश में जुटी है।
आम आदमी पार्टी और कांग्रेस के बीच चल रहा यह शीतयुद्ध आने वाले चुनावों के मद्देनजर काफी अहम माना जा रहा है। एक तरफ जहां दोनों दल मिलकर सरकार को घेरने की कोशिश कर रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ क्षेत्रीय स्तर पर अपनी राजनीतिक जमीन बचाने की मजबूरी उन्हें एक-दूसरे के आमने-सामने ला खड़ा करती है। जनता के बीच भी इस बात की चर्चा आम हो गई है कि जो दल मिलकर सरकार का मुकाबला करने निकले थे, वे आपस में ही उलझ पड़े हैं।
विपक्ष की रणनीति पर उठ रहे गंभीर सवाल
द फ्रीलान्स की ग्राउंड पड़ताल से यह साफ होता है कि जब तक शीर्ष नेतृत्व के स्तर पर आपसी तालमेल बेहतर नहीं होगा, तब तक इस तरह के प्रदर्शनों का जमीन पर कोई खास असर नहीं दिखेगा। कार्यकर्ता भ्रमित हैं और जनता के बीच गलत संदेश जा रहा है। आने वाले दिनों में यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या कांग्रेस और आम आदमी पार्टी अपने आपसी गिले-शिकवे भुलाकर साथ चल पाती हैं, या फिर यह टकराव उनके गठबंधन को पूरी तरह से कमजोर कर देगा।





