नई दिल्ली के साउथ ब्लॉक से लेकर मॉस्को के क्रेमलिन तक, कूटनीतिक गलियारों में एक सुगबुगाहट तेज हो गई है। वैश्विक राजनीति के मौजूदा परिदृश्य में, जहां यूक्रेन युद्ध के बाद रूस पूरी तरह से पश्चिमी प्रतिबंधों से घिर चुका है, मॉस्को अपने व्यापारिक और रणनीतिक रास्तों को विस्तार देने के लिए हरसंभव विकल्प तलाश रहा है। इसी कड़ी में अब एक ऐसी खबर सामने आई है जिसने भारतीय सामरिक विशेषज्ञों को भी गहरी चिंता में डाल दिया है—रूस से नजदीकी बढ़ाने को बेताब पाकिस्तान अब इंटरनेशनल नॉर्थ-दक्षिण ट्रांसपोर्ट कॉरिडोर (INSTC) का हिस्सा बनने की फिराक में है।
भू-राजनीतिक बदलाव और मॉस्को की नई मजबूरी
एक वरिष्ठ फील्ड रिपोर्टर के तौर पर जब मैंने अंतरराष्ट्रीय व्यापार गलियारों और यूरेशियन कूटनीति का अध्ययन किया, तो यह साफ हुआ कि रूस के लिए INSTC (इंटरनेशनल नॉर्थ-दक्षिण ट्रांसपोर्ट कॉरिडोर) भारत और ईरान के रास्ते यूरोप तक माल भेजने का सबसे बेहतरीन जरिया रहा है। लेकिन पश्चिमी प्रतिबंधों के बाद रूस की अर्थव्यवस्था को नए समुद्री और जमीनी रास्तों की सख्त जरूरत है। पाकिस्तान लंबे समय से इस सामरिक नेटवर्क में घुसपैठ की कोशिश कर रहा था, और अब मास्को की तरफ से मिल रहे ठंडे-गर्म संकेतों ने इस्लामाबाद को नई उम्मीद दे दी है। क्या रूस अपनी आर्थिक उत्तरजीविता के लिए पारंपरिक दोस्तों से समझौता कर रहा है?
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भारत के लिए क्या हैं इसके सामरिक और आर्थिक मायने?
भारत के लिए INSTC प्रोजेक्ट हमेशा से मध्य एशिया और रूस तक बिना पाकिस्तान के रास्ते के सीधी पहुंच बनाने का एक मास्टरस्ट्रोक रहा है। चाबहार बंदरगाह के विकास के पीछे भी यही मुख्य उद्देश्य था कि भारत, ईरान और रूस मिलकर पश्चिमी एशिया का एक मजबूत व्यापारिक ब्लॉक तैयार करें। यदि पाकिस्तान इस कॉरिडोर में शामिल होता है, तो न केवल इस प्रोजेक्ट की सुरक्षा और नियंत्रण समीकरण बदलेंगे, बल्कि पाकिस्तान को मध्य एशिया और रूस के बाजारों तक सीधी और आसान पहुंच मिल जाएगी। नई दिल्ली के रणनीतिकारों के लिए यह स्थिति असहज करने वाली है, क्योंकि पाकिस्तान इसका इस्तेमाल भारत के खिलाफ कूटनीतिक और आर्थिक दबाव बनाने के लिए कर सकता है।
पुतिन की कूटनीति: पुरानी दोस्ती बनाम नई आर्थिक जरूरतें
क्रेमलिन की विदेश नीति हमेशा से यथार्थवाद (Realpolitik) पर आधारित रही है। रूस और भारत के संबंध दशकों पुराने और 'विशेष व privileged strategic partnership' वाले रहे हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के बीच के समीकरण भी जगजाहिर हैं। हालांकि, वैश्विक प्रतिबंधों के दौर में रूस के लिए चीनी प्रभाव और पाकिस्तानी रास्तों को नजरअंदाज करना कठिन होता जा रहा है। पुतिन की यह चाल एक तरफ जहां व्यापारिक विविधीकरण (Diversification) की मजबूरी है, वहीं दूसरी तरफ यह भारत जैसे पारंपरिक साझेदार के साथ भरोसे की डोर को कसौटी पर भी कस रही है।
क्या भारत को सचमुच मिलेगा धोखा?
हमारी फील्ड जांच और कूटनीतिक जानकारों के विश्लेषण के मुताबिक, रूस आज भी भारत को अपनी विदेश नीति का एक अहम स्तंभ मानता है। रक्षा क्षेत्र से लेकर ऊर्जा आपूर्ति (सस्ता कच्चा तेल) तक, मॉस्को और नई दिल्ली के बीच गहरे आर्थिक हित जुड़े हैं। पाकिस्तान का INSTC में शामिल होना इतना आसान भी नहीं है, क्योंकि इसमें ईरान की भी अहम भूमिका है और तेहरान के साथ पाकिस्तान के संबंध हमेशा से जटिल रहे हैं। इसके बावजूद, रूस-पाकिस्तान की बढ़ती धुरी पर भारत को पैनी नजर रखनी होगी। यह सिर्फ एक व्यापारिक गलियारे का मामला नहीं है, बल्कि यूरेशिया में शक्ति संतुलन का एक बड़ा खेल है।
- रूस पर पश्चिमी प्रतिबंधों के कारण वैकल्पिक व्यापार मार्गों की तलाश तेज।
- INSTC कॉरिडोर में पाकिस्तान की प्रविष्टि से भारत की रणनीतिक बढ़त को मिल सकती है चुनौती।
- नई दिल्ली और मॉस्को के बीच कूटनीतिक स्तर पर उच्च-स्तरीय संवाद की आवश्यकता।
- ईरान की प्रतिक्रिया और उसकी क्षेत्रीय प्राथमिकताओं पर टिकी होगी इस पूरे घटनाक्रम की सफलता।
अंततः, अंतरराष्ट्रीय राजनीति में कोई भी स्थाई मित्र या शत्रु नहीं होता—केवल हित होते हैं। भारत को अपनी सामरिक स्वायत्तता और राष्ट्रीय हितों की रक्षा के लिए अपनी कूटनीतिक चालों को और अधिक धारदार बनाना होगा, ताकि बदलती दुनिया में नई दिल्ली का प्रभाव कमजोर न पड़े।







