मैं इस समय झारखंड की राजधानी रांची के एक स्थानीय जन वितरण प्रणाली (PDS) की दुकान के बाहर खड़ा हूँ। सुबह से ही यहाँ लोगों की लंबी कतारें लगी हैं, लेकिन आज इन चेहरों पर अनाज मिलने की खुशी से ज्यादा अपनी पात्रता को बचाने की जद्दोजहद साफ झलक रही है। पिछले कुछ दिनों से राज्य में और उत्तर प्रदेश के कई हिस्सों में प्रशासन ने राशन कार्डधारकों की पात्रता को लेकर एक सख्त अभियान छेड़ रखा है। द फ्रीलान्स की ग्राउंड इन्वेस्टिगेशन टीम ने जब इस पूरे मामले की तह तक जाने की कोशिश की, तो कई चौंकाने वाले आंकड़े सामने आए।
झारखंड से सीतापुर तक: डिजिटल सफाई का नया दौर
सार्वजनिक वितरण प्रणाली (PDS) को पारदर्शी बनाने के नाम पर सरकारों ने अब 'साइलेंट' और 'डुप्लीकेट' कार्डधारकों पर सीधी कार्रवाई शुरू कर दी है। झारखंड सरकार के खाद्य, सार्वजनिक वितरण एवं उपभोक्ता मामलों के विभाग द्वारा शुरू किए गए विशेष अभियान के तहत अकेले राज्य में 2.87 लाख ऐसे कार्डों की पहचान की गई है, जो या तो लंबे समय से निष्क्रिय हैं या फिर सिस्टम में दोहरी प्रविष्टियां (डबल बेनिफिशियरी) रखते हैं। कुछ इसी तरह की तस्वीरें उत्तर प्रदेश के सीतापुर जिले से भी सामने आ रही हैं, जहाँ जिला प्रशासन ने 7 हजार से अधिक राशन कार्डों को तत्काल प्रभाव से निरस्त करने का आदेश जारी कर दिया है।
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'साइलेंट' कार्डधारकों पर लटकी तलवार: 6 महीने का नियम
नियमों के मुताबिक, यदि कोई कार्डधारक लगातार छह महीने तक सरकारी कोटे का खाद्यान्न नहीं उठाता है, तो उसका राशन कार्ड स्वतः या प्रशासनिक जांच के बाद निष्क्रिय (Deactivate) कर दिया जाएगा। अधिकारियों का तर्क है कि ऐसे कार्ड 'साइलेंट' श्रेणी में आते हैं जिनका उपयोग या तो मृत व्यक्तियों के नाम पर हो रहा है, या फिर प्रवासी मजदूर जो दूसरे राज्यों में जा चुके हैं और यहाँ मुफ्त का अनाज ले रहे हैं। लेकिन सवाल यह उठता है कि क्या हर वह नागरिक जो छह महीने तक राशन नहीं ले पाया, वह अपात्र है? ग्राउंड जीरो पर हमारी बातचीत में कई परिवारों ने बताया कि कोरोना या आजीविका के सिलसिले में बाहर रहने के कारण वे समय पर राशन नहीं ले सके, और अब उन्हें अपना कार्ड बचाने के लिए दफ्तरों के चक्कर काटने पड़ रहे हैं।
दोहरे लाभार्थियों पर कड़ा प्रहार
इस सफाई अभियान का दूसरा बड़ा निशाना वे लोग हैं जो एक से अधिक जगहों पर या अवैध तरीके से सरकारी राशन का लाभ उठा रहे थे। डिजिटल आधार सीडिंग और ई-केवाईसी (e-KYC) प्रक्रिया के जरिए ऐसे दोहरे लाभार्थियों की पहचान की जा रही है। खाद्य सुरक्षा पोर्टल पर जैसे ही सिस्टम ने मिलान किया, वैसे ही इन संदिग्ध कार्डों को ब्लॉक करने की प्रक्रिया शुरू हो गई। प्रशासन का मानना है कि इससे सरकारी खजाने पर पड़ने वाला अतिरिक्त बोझ कम होगा और वास्तव में जो गरीब और जरूरतमंद हैं, उन तक खाद्यान्न की आपूर्ति सुचारू रूप से हो सकेगी।
राशन कार्ड बचाने के लिए क्या कर रहे हैं लोग?
आसपास की राशन दुकानों और ब्लॉक कार्यालयों में इन दिनों भारी भीड़ देखी जा सकती है। लोग अपना ई-केवाईसी कराने, आधार कार्ड लिंक करवाने और यह सुनिश्चित करने के लिए दौड़-भाग कर रहे हैं कि कहीं उनका नाम भी इस 'हटाए जाने वाले' डेटाबेस में शामिल तो नहीं है। कई सामाजिक कार्यकर्ताओं ने इस बात की आशंका जताई है कि इस जल्दबाजी में कई गरीब और हाशिये पर मौजूद लोग अपने बुनियादी खाद्य सुरक्षा अधिकार से वंचित न हो जाएं।
निष्कर्ष और भविष्य का असर
डिजिटलीकरण और पारदर्शिता के नाम पर यह अभियान भले ही प्रशासनिक नजरिए से सही प्रतीत होता हो, लेकिन इसके सामाजिक निहितार्थ गहरे हैं। द फ्रीलान्स की यह पड़ताल बताती है कि तकनीक और मानवीय संवेदनाओं के बीच संतुलन बनाना बेहद जरूरी है। यदि बिना किसी पुख्ता जमीनी सत्यापन के केवल डेटा के आधार पर कार्ड रद्द किए जाते हैं, तो भुखमरी और खाद्य असुरक्षा के आंकड़े फिर से विकराल रूप ले सकते हैं। सरकार को यह सुनिश्चित करना होगा कि असली हकदार इस डिजिटल आंधी में पीछे न छूट जाएं।







