मॉस्को से लेकर यूरोपीय राजधानियों तक कूटनीतिक पारा इन दिनों सातवें आसमान पर है। रूस के विदेश मंत्री सर्गेई लावरोव का ताज़ा बयान और अमेरिकी 'पैट्रियट' मिसाइल प्रणालियों को लेकर दी गई उनकी खुली चेतावनी ने पश्चिमी देशों की नींद उड़ा दी है। द फ्रीलान्स की विशेष ग्राउंड पड़ताल और अंतरराष्ट्रीय कूटनीतिक गलियारों से मिल रहे इनपुट बताते हैं कि यूक्रेन संघर्ष अब एक ऐसे निर्णायक मोड़ पर पहुंच गया है, जहां परमाणु महाशक्ति और नाटो देशों के बीच तनाव किसी भी समय अनियंत्रित हो सकता है। ऐसे में भारत की बढ़ती कूटनीतिक सक्रियता इस पूरे घटनाक्रम में एक नया समीकरण गढ़ती नजर आ रही है।
मॉस्को की दो टूक: 'रूसी मिलिट्री डॉक्ट्रिन को ध्यान से पढ़ें यूरोपीय देश'
रूसी विदेश मंत्री सर्गेई लावरोव ने एक बार फिर राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के उस कड़े रुख को दोहराया है, जिसमें उन्होंने पश्चिमी देशों को रूस की सीमाओं के पास आक्रामक हथियार प्रणालियों की तैनाती को लेकर आगाह किया था। लावरोव ने विशेष रूप से अमेरिकी 'पैट्रियट' एयर डिफेंस सिस्टम का जिक्र करते हुए कहा कि यूरोप को यह समझ लेना चाहिए कि रूस की रक्षा नीति यानी मिलिट्री डॉक्ट्रिन में स्पष्ट प्रावधान हैं कि यदि उसकी संप्रभुता या सुरक्षा के समक्ष सीधा खतरा पैदा होता है, तो रूस किस हद तक कड़े कदम उठा सकता है। लावरोव की यह चेतावनी महज कूटनीतिक बयानबाजी नहीं है, बल्कि यह इस बात का स्पष्ट संकेत है कि मास्को पश्चिमी देशों द्वारा यूक्रेन को दी जा रही उच्च-स्तरीय मारक क्षमता वाली सैन्य सहायता को रेड लाइन पार करना मानता है।
संबंधित खबरें
यूक्रेन युद्ध और बदलता ग्लोबल मिलिट्री आर्किटेक्चर
जमीनी हकीकत यह है कि पैट्रियट जैसी मिसाइल प्रणालियों के यूक्रेन पहुंचने के बाद से युद्ध के समीकरण तेजी से बदले हैं। रूस इन हथियारों को अपनी सुरक्षा के लिए सीधा खतरा मानता है। लावरोव के इस ताजा बयान के पीछे पश्चिमी देशों को यह संदेश देना है कि यदि संघर्ष का दायरा और बढ़ा, तो इसके परिणाम केवल क्षेत्रीय नहीं होंगे, बल्कि इसका सीधा असर पूरे यूरोपीय महाद्वीप की सुरक्षा पर पड़ेगा। हमारे विश्लेषकों का मानना है कि रूस अपनी सैन्य रणनीति में किसी भी तरह के पश्चिमी हस्तक्षेप को बर्दाश्त करने के मूड में नहीं है।
रूस-यूक्रेन युद्ध में मध्यस्थता की सुगबुगाहट और भारत की भूमिका
एक तरफ जहां रूस और पश्चिम के बीच तनातनी चरम पर है, वहीं दूसरी तरफ कूटनीतिक मोर्चे पर भारत की भूमिका को लेकर अटकलें तेज हो गई हैं। हाल ही में भारतीय राजदूत की रूसी उप विदेश मंत्री के साथ हुई उच्चस्तरीय बैठक ने अंतरराष्ट्रीय कूटनीति के जानकारों का ध्यान खींचा है। हालांकि आधिकारिक तौर पर इसे द्विपक्षीय वार्ताओं का हिस्सा बताया गया है, लेकिन वैश्विक रणनीतिकार यह कयास लगा रहे हैं कि क्या भारत इस खूनी संघर्ष को थमाने के लिए किसी संभावित मध्यस्थता की जमीन तैयार कर रहा है? भारत की स्वतंत्र विदेश नीति और रूस तथा पश्चिमी देशों—दोनों के साथ उसके संतुलित संबंधों के कारण नई दिल्ली को एक विश्वसनीय शांति मध्यस्थ के रूप में देखा जा रहा है।
भविष्य का असर: क्या कूटनीति बचा पाएगी यूरोप को?
द फ्रीलान्स की इस खोजी रिपोर्ट का निष्कर्ष यह है कि रूस अपने सुरक्षा हितों पर किसी भी तरह का समझौता करने को तैयार नहीं है। सर्गेई लावरोव के बयान ने साफ कर दिया है कि यूरोपीय देशों को अपनी सुरक्षा नीतियों पर पुनर्विचार करना होगा। साथ ही, भारत जैसे देशों पर यह दबाव और उम्मीद दोनों बढ़ गए हैं कि वे इस वैश्विक संकट को टालने के लिए कूटनीतिक स्तर पर कोई ठोस पहल करें। आने वाले सप्ताह इस बात तय करेंगे कि यूरोप जंग के रास्ते पर आगे बढ़ता है या कूटनीति की मेज पर कोई रास्ता निकलता है।







