नई दिल्ली के जंतर-मंतर पर प्रदर्शन के लिए जाने की कोशिश कर रहे 'सिटीजन फॉर जस्टिस एंड पीस' यानी सीजेपी के नेताओं की मुश्किलें कम होने का नाम नहीं ले रही हैं। ताजा घटनाक्रम में सीजेपी के प्रमुख नेता सौरव दास और आशुतोष रांका को अदालत ने पांच दिन की न्यायिक हिरासत में तिहाड़ जेल भेज दिया है। इस मामले में पुलिस की कार्रवाई को लेकर कई तरह के सवाल खड़े हो रहे हैं क्योंकि इन नेताओं की गिरफ्तारी रात के ठीक तीन बजे की गई थी। जंतर-मंतर जाने के रास्ते में ही पुलिस ने इन्हें रोक लिया और इसके बाद कानूनी कार्रवाई शुरू कर दी गई।
इस पूरी कार्रवाई को लेकर राष्ट्रीय स्तर पर राजनीतिक सरगर्मी काफी तेज हो गई है। कांग्रेस नेता राहुल गांधी समेत कई विपक्षी नेताओं ने इस गिरफ्तारी की कड़ी निंदा की है और इसे युवाओं की आवाज दबाने वाला कदम बताया है। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, सौरव दास और आशुतोष रांका के अलावा अजिंक्य शिंदे और अभिजीत दिपके जैसे अन्य कार्यकर्ताओं की गिरफ्तारी को लेकर भी अलग-अलग दावे सामने आ रहे हैं। पुलिस और प्रशासनिक अधिकारियों का कहना है कि यह कदम कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए उठाया गया था, जबकि संगठन से जुड़े लोगों का आरोप है कि उन्हें बिना किसी ठोस कारण के बेवजह परेशान किया जा रहा है।
रात तीन बजे की गई कार्रवाई पर उठे सवाल
गिरफ्तारी के समय और तौर-तरीकों को लेकर आम जनता और कानूनी जानकारों के बीच भी चर्चा का बाजार गर्म है। रात के सन्नाटे में तड़के तीन बजे घर से उठाकर कार्रवाई करने पर मानवाधिकार संगठनों ने भी आपत्ति जताई है। अदालत में पेशी के दौरान वकीलों ने पुलिस की इस कार्यशैली पर सवाल उठाए, लेकिन मजिस्ट्रेट कोर्ट ने दोनों पक्षों को सुनने के बाद सौरव दास और आशुतोष रांका को पांच दिन के लिए तिहाड़ जेल भेजने का आदेश दे दिया। अब इन नेताओं के वकीलों की ओर से जमानत याचिका दाखिल करने की तैयारी की जा रही है, जिस पर आने वाले दिनों में सुनवाई हो सकती है।
जंतर-मंतर पर विरोध प्रदर्शन करने जा रहे इन नेताओं का मुख्य मुद्दा क्या था, इसको लेकर भी ग्राउंड पर अलग-अलग बातें सामने आ रही हैं। सीजेपी के कार्यकर्ता देश के अलग-अलग मुद्दों पर लगातार आवाज उठाते रहे हैं और हालिया प्रदर्शन भी उसी का एक हिस्सा था। प्रशासन का तर्क है कि बिना अनुमति के भीड़ जुटाने की कोशिश की जा रही थी, जिससे शहर की शांति भंग हो सकती थी। वहीं दूसरी ओर, संगठन से जुड़े लोगों का साफ कहना है कि शांतिपूर्ण तरीके से अपनी बात रखना हर नागरिक का लोकतांत्रिक अधिकार है, जिसे सरकार पुलिस के बल पर कुचलना चाहती है।
तिहाड़ जेल भेजे जाने के बाद आगे की कानूनी राह
तिहाड़ जेल की सलाखों के पीछे भेजे जाने के बाद सौरव दास और आशुतोष रांका की मुश्किलें फिलहाल बढ़ती हुई नजर आ रही हैं। पांच दिन की यह न्यायिक हिरासत पूरी होने के बाद इन्हें दोबारा अदालत के सामने पेश किया जाएगा, जहां पुलिस इनकी कस्टडी बढ़ाने की मांग कर सकती है या फिर बचाव पक्ष जमानत के लिए जोर डालेगा। इस पूरे घटनाक्रम ने राजधानी की सियासत को एक बार फिर गरमा दिया है और आने वाले दिनों में इस मुद्दे पर बड़े राजनीतिक विरोध प्रदर्शन देखने को मिल सकते हैं।
जमीनी स्तर पर पुलिस और सुरक्षा बल पूरी तरह मुस्तैद नजर आ रहे हैं ताकि किसी भी अप्रिय स्थिति से निपटा जा सके। जंतर-मंतर और उसके आसपास के इलाकों में सुरक्षा बढ़ा दी गई है ताकि सीजेपी या अन्य संगठनों के समर्थक दोबारा इकट्ठा न हो सकें। द फ्रीलान्स की टीम इस मामले से जुड़े हर एक पहलू पर पैनी नजर बनाए हुए है और आगे की कानूनी तथा राजनीतिक अपडेट्स लगातार पाठकों तक पहुंचाई जाती रहेंगी।
विपक्ष का हमला और सरकार का मौन रुख
इस पूरे मामले में सत्ता पक्ष की ओर से अभी तक कोई बड़ा आधिकारिक बयान सामने नहीं आया है, लेकिन विपक्षी दल लगातार सरकार पर हमलावर हैं। राहुल गांधी और अन्य नेताओं का कहना है कि देश में असहमति की आवाज को कुचलने का यह एक नया तरीका बन गया है। सोशल मीडिया से लेकर सड़क तक इस मुद्दे पर बहस छिड़ गई है कि क्या लोकतांत्रिक देश में अपनी बात रखने के लिए जंतर-मंतर जाना भी अब अपराध बन गया है।






