सौरभ राजपूत हत्याकांड में अदालत के फैसले के बाद गरमाई चर्चा
उत्तर प्रदेश के मेरठ जिले में सामने आए एक बेहद सनसनीखेज और झकझोर देने वाले हत्याकांड ने पूरे देश की अंतरात्मा को झकझोर कर रख दिया था। पति सौरभ राजपूत की बेरहमी से हत्या कर उसके शव के टुकड़े-टुकड़े कर नीले ड्रम में छिपाने के मामले में अदालत ने बड़ा और कड़ा फैसला सुनाया है। इस मामले में मुख्य आरोपी मुस्कान रस्तोगी और उसके प्रेमी साहिल शुक्ला को अदालत ने दोषी करार देते हुए मृत्युदंड की सजा सुनाई है। इस फैसले के सामने आने के बाद से ही न्यायिक गलियारों और आम जनता के बीच इस बात की चर्चा तेज हो गई है कि यदि इस सजा पर ऊपरी अदालतों में भी मुहर लगती है, तो आखिरकार इन दोनों दोषियों को फांसी कहां दी जाएगी।
विशेष तौर पर मुस्कान रस्तोगी को लेकर लोगों के मन में यह सवाल उठ रहा है कि क्या उसे मेरठ जेल में ही फंदे पर लटकाया जाएगा या फिर उसे किसी अन्य सुरक्षित और विशेष जेल में शिफ्ट किया जाएगा। कानून के जानकारों और जेल प्रशासन से जुड़े सूत्रों के मुताबिक, महिलाओं को मृत्युदंड दिए जाने के मामलों में कानूनी प्रावधान और जेलों की आंतरिक व्यवस्थाएं काफी अलग और संवेदनशील होती हैं। इसी प्रक्रिया के तहत उत्तर प्रदेश की एक विशेष जेल का नाम सबसे आगे चल रहा है, जिसके पास महिलाओं को फांसी देने का एकमात्र आधिकारिक ढांचा मौजूद है।
मथुरा जिला कारागार का महिला फांसीघर क्यों है चर्चा के केंद्र में
जब भी उत्तर प्रदेश में किसी महिला कैदी को मौत की सजा दिए जाने की संभावना पर चर्चा होती है, तो मथुरा जिला कारागार का नाम स्वतः ही सबसे ऊपर आ जाता है। इसकी मुख्य वजह यह है कि पूरे उत्तर प्रदेश राज्य में केवल मथुरा जेल में ही महिलाओं को फांसी के फंदे पर लटकाने के लिए विशेष रूप से निर्मित फांसीघर मौजूद है। मेरठ जेल या प्रदेश की अन्य जेलों में इस तरह की विशेष व्यवस्था न होने के कारण, यदि मुस्कान की सजा बरकरार रहती है तो उसे मथुरा जेल में स्थानांतरित किए जाने की पूरी संभावना है। हालांकि, कानूनी जानकारों का स्पष्ट कहना है कि अभी यह शुरुआती चरण है और इस पर अंतिम निर्णय पूरी तरह से उच्च न्यायालय की पुष्टि और प्रशासनिक आदेशों पर निर्भर करेगा।
मथुरा जेल का यह महिला फांसीघर आम बैरकों से काफी दूर, एक एकांत और सुरक्षित कोने में स्थित है। इसके चारों तरफ बेहद ऊंची सुरक्षा दीवारें बनाई गई हैं, और इसके आसपास की खाली जमीन पर कृषि कार्य किया जाता है ताकि वहां बाहरी हस्तक्षेप या आवाजाही पूरी तरह प्रतिबंधित रखी जा सके। इस विशेष अवसंरचना के कारण ही इस जेल को राज्य के सबसे संवेदनशील और हाई-सिक्योरिटी वाले दंडात्मक केंद्रों में गिना जाता है।
ब्रिटिश काल में हुआ था इस ऐतिहासिक फांसीघर का निर्माण
मथुरा जिला कारागार में बने इस महिला फांसीघर का इतिहास डेढ़ सदी से भी ज्यादा पुराना है। उपलब्ध ऐतिहासिक दस्तावेजों और जेल रिकॉर्ड के मुताबिक, इस विशेष फांसीघर का निर्माण आज से करीब 155 साल पहले ब्रिटिश शासनकाल के दौरान किया गया था। अंग्रेजों ने अपनी दंडात्मक नीतियों और प्रशासनिक सुगमता के तहत इस अलग ढांचे को खड़ा किया था, ताकि गंभीर और दुर्लभतम मामलों में महिला अपराधियों को अन्य कैदियों की पहुंच से दूर रखकर मृत्युदंड दिया जा सके।
दिलचस्प बात यह है कि देश की आजादी के बाद से लेकर अब तक इस ऐतिहासिक महिला फांसीघर में किसी भी महिला कैदी को वास्तव में फांसी के फंदे पर नहीं लटकाया गया है। अमरोहा की चर्चित अपराधी शबनम अली के मामले में भी जब दया याचिका खारिज होने की चर्चाएं तेज हुई थीं, तब भी इसी मथुरा जेल के फांसीघर ने सुर्खियां बटोरी थीं। अब एक बार फिर मेरठ की मुस्कान रस्तोगी के मामले के बाद यह डेढ़ सदी पुराना ढांचा प्रशासनिक और मीडिया गलियारों में बहस का मुख्य विषय बन गया है।
जिला जज के कड़े तेहर और न्याय का संदेश
इस बहुचर्चित मुकदमे की सुनवाई करने वाले जिला जज अरविंद कुमार मिश्रा भी अपने अनूठे और सख्त अंदाज के कारण खासे चर्चा में हैं। फैसला सुनाने से पहले उन्होंने अदालत कक्ष में महाभारत के प्रसंगों का हवाला दिया और समाज तथा कानून के बीच के गहरे रिश्ते को समझाया। जज ने एक स्पष्ट संदेश देते हुए कहा कि जिस प्रकार जंगल में बाघ के होने से जंगल सुरक्षित रहता है, उसी प्रकार कानून का भय समाज में व्यवस्था और शांति कायम रखता है।
फैसला सुनाने के बाद जज द्वारा इस्तेमाल किए गए पेन को कचरे के डिब्बे में डाल देने की घटना ने भी हर किसी का ध्यान खींचा। न्यायिक इतिहास में इसे एक कड़े संदेश के रूप में देखा जा रहा है। करीब तेरह महीने तक चली लंबी अदालती कार्रवाई और 126 तारीखों की सुनवाई के बाद आया यह फैसला मेरठ के न्यायिक इतिहास में मील का पत्थर माना जा रहा है, जहां लगभग तेरह साल बाद किसी मामले में मौत की सजा सुनाई गई है।
पवन जल्लाद ने दी प्रतिक्रिया, कहा- आदेश मिलने पर तैयार हूं
इस पूरे घटनाक्रम के बीच निर्भया सामूहिक दुष्कर्म और हत्या मामले के दोषियों को फांसी के फंदे पर लटकाने वाले मेरठ के प्रसिद्ध पवन जल्लाद का बयान भी सामने आया है। पवन जल्लाद ने मीडिया से बातचीत करते हुए अदालत के इस फैसले को पूरी तरह से उचित ठहराया है। उनका कहना है कि सौरभ राजपूत की हत्या और उसके बाद शव के साथ जो अमानवीय कृत्य किया गया, वह बेहद जघन्य अपराध की श्रेणी में आता है।
"सौरभ राजपूत की हत्या और उसके शव को नीले ड्रम में छिपाने का तरीका बेहद वीभत्स और अमानवीय था। अदालत ने इस गंभीर अपराध में मृत्युदंड सुनाकर बिल्कुल सही और न्यायसंगत फैसला लिया है। यदि मुझे शासन या जेल प्रशासन की तरफ से आधिकारिक आदेश मिलता है, तो मैं अपनी जिम्मेदारी निभाने के लिए पूरी तरह तैयार हूं। हालांकि, फांसी की तारीख और उसकी तामील कानूनी प्रक्रिया पूरी होने और डेथ वारंट जारी होने के बाद ही तय होगी।"— पवन जल्लाद, वरिष्ठ जल्लाद
फांसी से पहले कानूनी प्रक्रिया और डेथ वारंट की अनिवार्यता
निचली अदालत द्वारा मृत्युदंड सुनाए जाने का यह मतलब कतई नहीं होता कि सजा की तामील तुरंत कर दी जाएगी। भारतीय न्याय संहिता और आपराधिक प्रक्रिया संहिता के तहत अभी कई लंबी कानूनी लड़ाइयां और चरण बाकी हैं। सबसे पहले सत्र न्यायालय के इस मृत्युदंड के फैसले की पुष्टि के लिए मामला संबंधित उच्च न्यायालय यानी हाईकोर्ट में भेजा जाता है। हाईकोर्ट जब इस फैसले पर मुहर लगाता है, तब दोषियों के पास सुप्रीम कोर्ट में अपील करने और अंत में राष्ट्रपति के समक्ष दया याचिका दाखिल करने का संवैधानिक अधिकार सुरक्षित रहता है.
जब ये सभी कानूनी विकल्प समाप्त हो जाते हैं और सभी याचिकाएं खारिज हो जाती हैं, तब संबंधित निचली अदालत द्वारा आधिकारिक डेथ वारंट जारी किया जाता है। इसी डेथ वारंट के आधार पर जेल प्रशासन फांसी की निश्चित तिथि, समय और अन्य प्रशासनिक तैयारियां पूरी करता है। फिलहाल मेरठ और मथुरा जेल प्रशासन का यही कहना है कि उन्हें इस मामले में अभी तक कोई औपचारिक दिशा-निर्देश या डेथ वारंट प्राप्त नहीं हुआ है, और पूरी प्रक्रिया कानून के दायरे में ही आगे बढ़ेगी।









