नई दिल्ली और देश के कई राज्यों में सड़क सुरक्षा को लेकर इन दिनों भारी सख्ती देखने को मिल रही है। मध्य प्रदेश के शिवपुरी जिले में हाल ही में एक ही दिन के भीतर पुलिस ने 1450 वाहन चालकों पर भारी जुर्माना लगाया है। इनमें से 950 लोग ऐसे थे जो दोपहिया वाहन चलाते समय हेलमेट नहीं पहने हुए थे। वहीं करीब 500 वाहन चालकों ने चार पहिया वाहन चलाते समय सीट बेल्ट नहीं लगाई थी। यह आंकड़े बताते हैं कि शहर की सड़कों पर यातायात नियमों की कितनी अनदेखी आम हो गई है। पुलिस अब मौके पर ही ऑनलाइन माध्यम से जुर्माने का भुगतान करवा रही है ताकि लोग बचने का बहाना न बना सकें।
लेकिन बड़ा सवाल यह है कि क्या सिर्फ चालान काटने से सड़क हादसों पर रोक लग जाएगी? हाल ही में ग्रेटर नोएडा में हुए एक दर्दनाक सड़क हादसे ने इस पूरी व्यवस्था की पोल खोल दी है। जांच में सामने आया कि जिस बस से यह हादसा हुआ, उसके नाम पर पहले ही 18 चालान कट चुके थे। इसके बावजूद वह बस बेधड़क सड़कों पर दौड़ रही थी। नवभारत टाइम्स की एक हालिया पड़ताल में यह भी सामने आया कि कई स्लीपर बसों की फिटनेस खत्म हो चुकी है और उन पर लाखों रुपये का जुर्माना बकाया है, फिर भी वे यात्रियों की जान जोखिम में डालकर धड़ल्ले से चल रही हैं।
विधायक की गाड़ी पर भी कार्रवाई और नियमों का वीआईपी कल्चर
ट्रैफिक नियमों की अनदेखी सिर्फ आम जनता तक सीमित नहीं है, बल्कि खास लोग भी इसकी जद में आ रहे हैं। हाल ही में एक राज्य में बिना हेलमेट के बुलेट मोटरसाइकिल चलाना एक स्थानीय विधायक को भारी पड़ गया। ट्रैफिक पुलिस ने नियम तोड़ते हुए उनकी बाइक का भी चालान काट दिया। इस घटना का वीडियो सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हुआ, जिसके बाद लोगों ने पुलिस की कार्रवाई की सराहना की। आम नागरिकों का कहना है कि नियम कानून सभी के लिए एक जैसे होने चाहिए, चाहे वह आम आदमी हो या फिर सत्ता में बैठा कोई बड़ा नेता।
दूसरी तरफ परिवहन विभाग और ट्रैफिक पुलिस ने अब डिजिटल और ऑन-द-spot चालान की प्रक्रिया को पूरी तरह से पारदर्शी बनाने का दावा किया है। नए नियमों के तहत अब ट्रैफिक पुलिसकर्मी हाथ की मशीन से तुरंत चालान काटते हैं और उसका भुगतान ऑनलाइन डिजिटल वॉलेट या यूपीआई के जरिए मौके पर ही हो जाता है। इससे लोगों को कोर्ट के चक्कर काटने से राहत जरूर मिली है, लेकिन भ्रष्टाचार की शिकायतों पर लगाम लगाने के लिए अभी और सख्त कदम उठाने की जरूरत महसूस की जा रही है।
खतरनाक होती बस यात्रा और फिटनेस सर्टिफिकेट का खेल
लंबी दूरी तय करने वाली स्लीपर बसों और कमर्शियल वाहनों की हालत दिन-ब-दिन बदतर होती जा रही है। बहुत सी बसें ऐसी हैं जिनकी फिटनेस समय पर चेक नहीं होती है, लेकिन मिलीभगत के चलते वे परमिट हासिल कर लेती हैं। सड़क परिवहन मंत्रालय के आंकड़ों के अनुसार, हर साल देश में हजारों लोग सड़क हादसों में अपनी जान गंवाते हैं। इनमें से एक बड़ा हिस्सा उन गाड़ियों का होता है जो बिना फिटनेस के या तय क्षमता से ज्यादा ओवरलोड होकर चलती हैं। पुलिस जब अभियान चलाती है तो कुछ दिनों के लिए सख्ती दिखती है, लेकिन अभियान खत्म होते ही हालात फिर से पुराने ढर्रे पर आ जाते हैं।
आम जनता का मानना है कि ट्रैफिक पुलिस को केवल चालान काटने की खानापूर्ति करने के बजाय वाहन की तकनीकी जांच पर भी ध्यान देना चाहिए। जब तक बस मालिकों और ट्रांसपोर्ट कंपनियों पर आपराधिक मुकदमे दर्ज नहीं होंगे, तब तक सड़कों पर मौत का खेल यूं ही जारी रहेगा। द फ्रीलान्स की ग्राउंड पड़ताल बताती है कि नियम चाहे जितने भी कड़े बना दिए जाएं, जब तक विभाग में बैठे अधिकारियों की जवाबदेही तय नहीं होगी, तब तक सड़क हादसों के इन आंकड़ों पर रोक लगाना बेहद मुश्किल साबित होगा।






