सरकारी निर्माण कार्यों में नए नियमों का शिकंजा
देशभर में अवैध खनन और खनिजों के अवैध परिवहन पर नकेल कसने के लिए कड़े कदम उठाए जा रहे हैं। इसी कड़ी में सरकारी निर्माण कार्यों में इस्तेमाल होने वाली हर तरह की खनिज सामग्री के लिए वैध चालान होना अनिवार्य कर दिया गया है। इस नियम का मुख्य उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि किसी भी सरकारी प्रोजेक्ट में चोरी-छिपे निकाले गए खनिजों का इस्तेमाल न हो और सरकारी राजस्व को कोई नुकसान न पहुँचे। लेकिन जमीनी स्तर पर इस नए नियम के लागू होने के बाद से एक अजीब असमंजस की स्थिति पैदा हो गई है।
नियमों के तहत यह प्रावधान किया गया है कि यदि निर्माण कार्य में बिना वैध चालान के सामग्री पाई जाती है, तो जुर्माने की राशि को पहले के मुकाबले काफी बढ़ा दिया जाएगा। पहले जहां मामूली जुर्माना लगता था, अब उसे बढ़ाकर सीधा 10 प्रतिशत तक कर दिया गया है। इस सख्ती का असर अब सीधे तौर पर धरातल पर चल रहे विकास कार्यों पर साफ दिखाई देने लगा है। ठेकेदार और संवेदक नए प्रोजेक्ट्स को हाथ में लेने से कतराने लगे हैं, क्योंकि उन्हें भारी जुर्माने और वित्तीय घाटे का डर सता रहा है।
विशेष रूप से स्थानीय स्तर पर मिट्टी, मोरम, पत्थर, गिट्टी, ईंट, सीमेंट, छड़ और अलकतरा जैसी जरूरी निर्माण सामग्री के लिए वैध चालान उपलब्ध कराने वाली अधिकृत एजेंसियों की भारी कमी महसूस की जा रही है। जब निर्माण सामग्री के वैध कागजात ही आसानी से नहीं मिल पा रहे हैं, तो ठेकेदार चाहकर भी नियमों का पूरी तरह पालन करने में असमर्थ साबित हो रहे हैं। इसका नतीजा यह हुआ है कि कई महत्वपूर्ण निर्माण कार्य या तो आधे रास्ते में रुक गए हैं या फिर उनका काम शुरू ही नहीं हो पा रहा है।
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असमंजस और स्पष्टता की कमी से रुका भुगतान
इस पूरी समस्या का सबसे बड़ा पहलू यह है कि बढ़े हुए जुर्माने और रॉयल्टी की वसूली को लेकर शासन स्तर से जमीनी अधिकारियों को स्पष्ट दिशा-निर्देश प्राप्त नहीं हुए हैं। अधिकारी इस बात को लेकर उलझन में हैं कि बिना चालान वाली पुरानी सामग्रियों के मामलों में किस तरह से गणना की जाए और रॉयल्टी की वसूली कैसे सुनिश्चित हो। दिशा-निर्देशों के अभाव में विभागों ने एहतियात के तौर पर संवेदकों यानी ठेकेदारों के भुगतानों पर रोक लगानी शुरू कर दी है।
विशेष प्रमंडल विभाग ने चालान से संबंधित स्थिति स्पष्ट न होने का हवाला देते हुए साफ कह दिया है कि जब तक सभी दस्तावेज पूरे नहीं हो जाते, तब तक कोई भुगतान जारी नहीं किया जाएगा। यही नहीं, इसका प्रतिकूल असर वर्ष 2023-24 की पुरानी और लंबित पड़ी योजनाओं पर भी पड़ रहा है। पुरानी लघु सिंचाई और ग्रामीण विकास से जुड़ी कई योजनाओं को तो संवेदकों ने जैसे-تैसे अतिरिक्त रॉयल्टी की जेब से राशि भरकर पूरा कर दिया, लेकिन अब नए नियमों की मार झेल रहे ठेकेदार भविष्य के प्रोजेक्ट्स में हाथ डालने से पूरी तरह पीछे हट रहे हैं।
"चालान जमा नहीं करने की स्थिति में रॉयल्टी को लेकर सरकार की ओर से स्पष्ट दिशा-निर्देश नहीं मिला है। इसी कारण संवेदकों के भुगतान पर रोक लगी हुई है। विभाग स्थिति स्पष्ट होने का इंतजार कर रहा है ताकि आगे की प्रक्रिया तय की जा सके।" — रमाकांत राम, विशेष प्रमंडल पदाधिकारी
140 करोड़ रुपए से अधिक की 70 योजनाएं प्रभावित
चालान और रॉयल्टी की इस तकनीकी पेचीदगी ने जिलेभर में विकास कार्यों की रफ्तार पर पूरी तरह ब्रेक लगा दिया है। सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, इस समय लगभग 70 ऐसी महत्वपूर्ण सरकारी योजनाएं हैं जो इस समस्या की वजह से पूरी तरह प्रभावित हो चुकी हैं। इन सभी रुकी हुई और अटकी हुई योजनाओं की कुल अनुमानित लागत 140 करोड़ रुपए से भी अधिक है। इतने बड़े पैमाने पर फंड और प्रोजेक्ट्स के फंस जाने से स्थानीय स्तर पर आधारभूत ढांचे के विकास को बड़ा झटका लगा है।
विभागवार अगर नजर डालें तो स्थिति और भी चिंताजनक दिखाई देती है। लघु सिंचाई विभाग की लगभग 10 योजनाएं अटकी हुई हैं, जिनकी कुल लागत करीब 10 करोड़ रुपए है। इसके अलावा सबसे ज्यादा मार विशेष प्रमंडल विभाग पर पड़ी है, जिसकी 20 योजनाएं और करीब 50 करोड़ रुपए के काम ठप पड़े हैं। ग्रामीण विकास कार्य विभाग की भी 30 योजनाएं फंसी हुई हैं, जिनकी लागत भी 50 करोड़ रुपए के आसपास है। वहीं पथ निर्माण विभाग की 10 बड़ी योजनाएं भी इस संकट की चपेट में आ गई हैं, जिनका करीब 30 करोड़ रुपए का काम रुका हुआ है।
अधिकारियों की दलील और वैकल्पिक रास्ते
एक तरफ जहां विभाग नियमों का हवाला देकर अपने हाथ खींच रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ कुछ विभागों ने बीच का रास्ता निकालने की कोशिश भी की है। लघु सिंचाई विभाग के अधिकारी ई. योगेश कुमार ने इस संबंध में जानकारी देते हुए बताया कि जहां चालान उपलब्ध नहीं हो पा रहा था, वहां वैकल्पिक व्यवस्था के तहत बालू, गिट्टी, सीमेंट, छड़ और मोरम पर दो प्रतिशत अतिरिक्त राशि जमा करवाकर कुछ मामलों में संवेदकों का भुगतान किया गया है। हालांकि यह समाधान भी सभी विभागों में एकरूपता से लागू नहीं हो पा रहा है, जिससे संवेदकों में असमंजस की स्थिति बनी हुई है।
प्रशासनिक अधिकारियों का तर्क है कि ई-चालान व्यवस्था अनिवार्य होने से भविष्य में भ्रष्टाचार पर रोक लगेगी और अवैध खनन से सरकारी खजाने को जो चूना लगता था, उस पर स्थायी लगाम लगेगी। लेकिन इस नेक नीयत वाले नियम को लागू करने के दौरान जमीनी स्तर पर आने वाली व्यावहारिक कठिनाइयों का समाधान समय पर न होना आम जनता और विकास कार्यों के लिए भारी पड़ रहा है। जब तक सरकार या संबंधित विभाग इस पर कोई स्पष्ट नीति या श्वेत पत्र जारी नहीं करते, तब तक ठेकेदारों का यह अड़ियल रुख और भुगतान पर लगी रोक यूं ही जारी रहने की आशंका है।
आगे की राह और निष्कर्ष
विकास कार्यों की इस रफ्तार पर लगी रोक को हटाने के लिए अब स्थानीय स्तर पर प्रशासनिक हलकों में मंथन शुरू हो गया है। ठेकेदारों और अभियंताओं का संघ लगातार सरकार से मांग कर रहा है कि रॉयल्टी और चालान के नियमों को बेहद सरल बनाया जाए ताकि वैध तरीके से काम करने वाले लोगों को अनावश्यक रूप से प्रताड़ित न होना पड़े। यदि समय रहते इन तकनीकी अड़चनों को दूर नहीं किया गया, तो आने वाले दिनों में कई और महत्वपूर्ण प्रोजेक्ट्स समय सीमा से काफी पीछे छूट जाएंगे।
आम जनता के गाढ़े पसीने की कमाई से चलने वाले इन 140 करोड़ रुपए के प्रोजेक्ट्स का समय पर पूरा होना बेहद जरूरी है। अवैध खनन के खिलाफ सख्ती बरतना प्रशासन की प्राथमिकता होनी चाहिए, लेकिन साथ ही यह भी सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि इस प्रक्रिया में ईमानदार ठेकेदार और विकास कार्य खुद ब खुद शिकार न बन जाएं। अब देखना यह होगा कि उच्च स्तर से इस मामले में क्या नए और स्पष्ट दिशा-निर्देश जारी किए जाते हैं, जिससे अटके हुए भुगतानों का रास्ता साफ हो सके और रुकी हुई योजनाएं एक बार फिर से पटरी पर लौट सकें।





