नई दिल्ली/ग्राउंड ब्यूरो — 'द फ्रीलान्स' के विशेष फील्ड सर्वे और जमीनी पड़ताल में यह बात सामने आई है कि समाज के सबसे निचले पायदान पर खड़े व्यक्ति की लड़ाई अब सिर्फ पेट भरने की नहीं रह गई है। आज का आम इंसान दो जून की रोटी के संघर्ष से आगे निकल चुका है और उसकी मुख्य तलाश सामाजिक बराबरी तथा न्याय की है।
देश के अलग-अलग हिस्सों में चल रहे सामाजिक बदलावों और आंदोलनों का जब हमने जायजा लिया, तो एक नया सच उभर कर आया। चाहे बात छात्र आंदोलनों की हो या फिर पुलिसिया कार्रवाई और व्यवस्था के खिलाफ उठने वाली आवाज़ों की, हर जगह एक ही बात प्रमुखता से सामने आ रही है। लोग अब चुपचाप जुल्म सहने को तैयार नहीं हैं और उन्हें बराबरी का हक चाहिए।
छात्र आंदोलनों से लेकर सड़कों तक बराबरी की गूंज
हाल के दिनों में देश भर में कई जगह छात्र आंदोलन और युवाओं के प्रदर्शन देखने को मिले हैं। राजनीति और समाज के वरिष्ठ जानकारों का भी मानना है कि युवा पीढ़ी अब केवल पढ़ाई और नौकरी तक सीमित नहीं रहना चाहती। वे नीतिगत बदलावों और व्यवस्था में बराबरी की हिस्सेदारी मांग रहे हैं। मुरली मनोहर जोशी जैसे वरिष्ठ नेताओं ने भी हाल ही में कहा है कि आंदोलनों और असंतोष से निपटने के लिए केवल बल या डंडे का प्रयोग करना किसी समस्या का समाधान नहीं हो सकता।
जमीनी हकीकत यह है कि जब तक युवाओं और आम जनता की आवाज को सुना नहीं जाएगा, तब तक असंतोष की यह आग बुझने वाली नहीं है। पुलिस चौकियों के बाहर होने वाली हिंसा और कार्रवाई के वीडियो भी सोशल मीडिया पर लगातार वायरल हो रहे हैं, जो यह दिखाते हैं कि आम नागरिक और शासन के बीच का टकराव किस हद तक बढ़ चुका है। बिना नंबर प्लेट की गाड़ियों पर स्टंट करने वाले युवा हों या फिर कानून हाथ में लेने वाले लोग, हर घटना के पीछे कहीं न कहीं व्यवस्था से उपजा एक गहरा क्षोभ साफ दिखाई देता है।
व्यवस्था में सुधार और आम आदमी के अधिकार
हमारी फील्ड टीम ने जब आम लोगों से बात की, तो उन्होंने खुलकर अपनी परेशानियां साझा कीं। नाना पाटेकर जैसे कलाकारों के जीवन के संघर्ष और उनकी फिटनेस के पीछे छिपी कहानियों से लेकर आम आदमी के दैनिक जीवन के तनाव तक, समाज का हर वर्ग किसी न किसी बड़े बदलाव से गुजर रहा है। कोई अपनी बुरी आदतों को छोड़कर नई शुरुआत कर रहा है, तो कोई अपने अधिकारों के लिए सड़क पर उतरा हुआ है।
लेकिन बड़ा सवाल यह है कि क्या हमारी व्यवस्था इन बदलावों को स्वीकार करने के लिए तैयार है? जब तक कानून का राज निष्पक्ष तरीके से लागू नहीं होगा और हर नागरिक को बराबरी का अहसास नहीं कराया जाएगा, तब तक समाज में शांति और स्थिरता आना मुश्किल है। 'द फ्रीलान्स' की इस ग्राउंड रिपोर्ट का निष्कर्ष यही है कि 'द लास्ट मील' यानी समाज के अंतिम व्यक्ति तक पहुंचना है, तो उसे सिर्फ योजनाएं नहीं, बल्कि बराबर का सम्मान और अधिकार देना होगा।









