नई दिल्ली/ग्राउंड ब्यूरो — देश की राजधानी में इन दिनों विरोध प्रदर्शन करने के हक और प्रशासनिक पाबंदियों के बीच एक बड़ी जंग छिड़ी हुई है। लोकतांत्रिक देश में अपनी बात सरकार तक पहुंचाने के लिए पहचाने जाने वाले जंतर-मंतर पर अब हर किसी को आसानी से आने की इजाज़त नहीं मिलती है। द वायर की हालिया रिपोर्ट में इस बात पर तीखा सवाल उठाया गया है कि क्या हम अब एक ऐसे दौर में पहुंच गए हैं जहां विरोध जताना भी अपराध बन गया है। जब भी आम लोग या कोई समूह अपनी मांगों को लेकर सड़क पर उतरता है, तो पुलिस और प्रशासन उसे रास्ते में ही रोक देते हैं। इस हालात को 'इजाज़त का गणतंत्र' नाम दिया गया है, जिसका मतलब है कि अब हक मांगने के लिए भी अधिकारियों के आगे गिड़गिड़ाना पड़ेगा।
जमीनी स्तर पर स्थिति यह है कि प्रदर्शनकारियों को उनके तय स्थान तक पहुंचने से पहले ही हिरासत में ले लिया जाता है या बैरिकेड्स लगाकर रास्तों को पूरी तरह सील कर दिया जाता है। पत्रकारों और सामाजिक कार्यकर्ताओं का कहना है कि यह जनता के बुनियादी अधिकारों का सीधा गला घोंटना है। संविधान ने हर नागरिक को शांतिपूर्ण तरीके से विरोध करने का अधिकार दिया है, लेकिन सुरक्षा और कानून-व्यवस्था का हवाला देकर इस अधिकार को धीरे-धीरे खत्म किया जा रहा है। आम आदमी जब अपनी समस्याओं को लेकर बड़े मंचों तक पहुंचना चाहता है, तो उसे अनुमति न मिलने का बहाना बनाकर घर वापस भेज दिया जाता है। इस कड़े पहरे के कारण लोगों के मन में यह सवाल उठने लगा है कि क्या लोकतंत्र में सरकार से सवाल पूछना अब गुनाह बन चुका है।
अरुणाचल प्रदेश में सॉफ्टवेयर की बंदिशों से ईसाई आवेदकों की मुश्किलें
इस बीच देश के दूरदराज के राज्यों से भी प्रशासनिक और तकनीकी भेदभाव की बड़ी खबरें सामने आ रही हैं। अरुणाचल क्रिश्चियन फोरम ने गंभीर आरोप लगाया है कि स्टेट बैंक ऑफ इंडिया के सॉफ्टवेयर में एक ऐसा तकनीकी पेंच फंसाया गया है जिससे ईसाई आवेदकों को अनुसूचित जनजाति यानी एसटी का विकल्प चुनने की अनुमति नहीं मिल रही है। फोरम का कहना है कि यह केवल एक तकनीकी चूक नहीं है बल्कि इसके पीछे एक गहरी साजिश है जो एक खास समुदाय के अधिकारों को सीमित करना चाहती है। जब पीड़ित लोग इस समस्या को लेकर बैंक अधिकारियों के पास जाते हैं, तो उन्हें संतोषजनक जवाब नहीं मिलता। इस तरह की घटनाएं यह दिखाती हैं कि कैसे तकनीक और नियमों का इस्तेमाल करके आम लोगों को उनके हक से वंचित किया जा रहा है और कोई इस पर खुलकर बोलने को तैयार नहीं है।
स्थानीय लोगों का दर्द यह है कि वे अपनी ही ज़मीन पर अपनी पहचान साबित करने के लिए संघर्ष कर रहे हैं। बैंक के डिजिटल सिस्टम में इस तरह के बदलाव आने से युवाओं के भविष्य पर संकट मंडराने लगा है क्योंकि वे छात्रवृत्ति या सरकारी योजनाओं के लिए आवेदन नहीं कर पा रहे हैं। अरुणाचल क्रिश्चियन फोरम ने चेतावनी दी है कि अगर इस तकनीकी खामी को तुरंत ठीक नहीं किया गया, तो राज्यभर में बड़े पैमाने पर आंदोलन शुरू किया जाएगा। प्रशासन इस मामले में अभी चुप्पी साधकर बैठा है, जिससे लोगों का गुस्सा और ज्यादा भड़कता जा रहा है। फील्ड पर हमारी पड़ताल बताती है कि छोटे-छोटे तकनीकी बदलाव किस तरह आम इंसान की जिंदगी को नर्क बना सकते हैं और कोई अधिकारी इसकी जिम्मेदारी लेने को तैयार नहीं होता।
कर्नाटक एसआईआर विवाद: दावणगेरे में नाम हटाने के भारी प्रशासनिक दबाव का खुलासा
दूसरी तरफ कर्नाटक से भी एक चौंकाने वाला मामला सामने आया है जहां प्रशासनिक अमले पर किस तरह का दबाव डाला जाता है, इसका पर्दाफाश हुआ है। कर्नाटक एसआईआर प्रक्रिया के दौरान दावणगेरे ज़िला प्रशासन के उपायुक्त ने खुलकर यह स्वीकार किया है कि उन पर लगभग तीन हजार लोगों के नाम सूची से हटाने का भारी दबाव था। यह बयान ऐसे समय आया है जब चुनाव और मतदाता सूचियों की पारदर्शिता पर पहले से ही देश भर में सवाल उठ रहे हैं। जब जिला स्तर के जिम्मेदार अधिकारी पर इस तरह से ऊपर से अवैध काम करने का दबाव बनाया जाता है, तो आम जनता की सुरक्षा और निष्पक्षता पर बहुत बड़ा सवालिया निशान लग जाता है।
स्थानीय नागरिकों का कहना है कि यदि प्रशासन ही इस तरह के दबाव में काम करने लगेगा, तो आम आदमी को न्याय कहां से मिलेगा। दावणगेरे ज़िले में हुए इस खुलासे ने राजनीतिक गलियारों में भूचाल ला दिया है और विपक्षी दल इस मामले की उच्च स्तरीय जांच की मांग कर रहे हैं। रिपोर्टर की डायरी के मुताबिक, जब हमने स्थानीय लोगों से बात की तो उन्होंने बताया कि उन्हें डर है कि कहीं उनके नाम भी चुपचाप सूचियों से गायब न कर दिए जाएं। अधिकारी भले ही दबाव के आगे झुकने से इनकार कर रहे हों, लेकिन इस तरह की घटनाएं यह साबित करती हैं कि सरकारी तंत्र का किस हद तक राजनीतिक इस्तेमाल किया जा रहा है।
विरोध की हर आवाज़ को कुचलने की कोशिश पर जनता का मौन आक्रोश
चाहे वह दिल्ली में जंतर-मंतर पर प्रदर्शनों को रोकना हो, अरुणाचल में सॉफ्टवेयर के जरिए अधिकारों पर कैंची चलाना हो या फिर कर्नाटक में सूचियों से नाम हटाने का प्रशासनिक दबाव हो, इन सभी घटनाओं की एक ही कहानी है। यह कहानी है उस बढ़ती असहिष्णुता की जो देश के हर कोने में लोकतंत्र की जड़ों को खोखला कर रही है। जब मीडिया और जनता दोनों की आवाज़ को दबाने के लिए कानून और पुलिस का डर दिखाया जाता है, तो समाज में एक खौफ का माहौल बन जाता है। आम लोग अब यह सोचने पर मजबूर हो गए हैं कि क्या उनकी कोई सुनवाई करने वाला बचा है या फिर देश सिर्फ चंद ताकतवर लोगों के इशारे पर चलेगा। द फ्रीलान्स की यह जमीनी पड़ताल साफ कहती है कि जब तक जनता एकजुट होकर इन ज्यादतियों के खिलाफ सवाल नहीं पूछेगी, तब तक अधिकारों का यह गला घोंटना बंद नहीं होगा।








