वाशिंगटन/नई दिल्ली — अंतरराष्ट्रीय राजनीति के गलियारों से एक बार फिर बड़ा बयान सामने आया है। अमेरिका के कद्दावर नेता डोनाल्ड ट्रम्प ने रूस से ऊर्जा और डीजल के व्यापार को लेकर खुलकर बात की है। ट्रम्प का यह बयान ऐसे समय पर आया है जब पश्चिमी देश रूस पर लगातार कड़े प्रतिबंध लगा रहे हैं। ट्रम्प ने दावा किया है कि रूस से डीजल और अन्य ऊर्जा उत्पाद खरीदना अमेरिका के आर्थिक हित में है और इससे देश को बड़ा फायदा मिल रहा है। उनके इस बयान ने वैश्विक राजनीति में नई बहस छेड़ दी है।
अपनी बात को आगे बढ़ाते हुए ट्रम्प ने यूरोपीय देशों की दोहरी नीतियों पर भी सवाल खड़े किए हैं। उन्होंने अमेरिकी मीडिया की भूमिका पर भी तीखा हमला बोला है। ट्रम्प के मुताबिक, अमेरिकी मीडिया इस बात को पूरी तरह नजरअंदाज कर रहा है कि यूरोपीय संघ यानी ईयू ने रूस से करीब 250 अरब डॉलर की एनर्जी खरीदी है। ट्रम्प का यह तर्क है कि जब यूरोप खुद रूस से बड़े पैमाने पर ऊर्जा खरीद रहा है, तो अकेले अमेरिका या अन्य देशों को कटघरे में खड़ा करना पूरी तरह गलत और पक्षपातपूर्ण रवैया है।
रूस और यूक्रेन युद्ध के बीच ऊर्जा कूटनीति के नए समीकरण
रूस और यूक्रेन के बीच चल रहे लंबे युद्ध के कारण पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था प्रभावित हुई है। इस बीच ऊर्जा बाजार की कीमतें आसमान छू रही हैं। हाल ही में ट्रम्प ने यह भी दावा किया था कि यूक्रेन के राष्ट्रपति वोलोडिमिर जेलेंस्की की तुलना में रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन शांति समझौता करने के लिए ज्यादा उत्सुक हैं। ऊर्जा और डीजल के इस खेल में दुनिया भर के देश अपने-अपने फायदे और नुकसान का हिसाब लगाने में जुटे हैं। अमेरिका जैसे देश भी अपनी ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने के लिए कूटनीतिक रास्ते तलाश रहे हैं।
विश्लेषकों का मानना है कि ट्रम्प का यह बयान आगामी अमेरिकी नीतियों और अंतरराष्ट्रीय कूटनीति की दिशा तय करेगा। एक तरफ पश्चिमी देश रूस को आर्थिक रूप से कमजोर करने की बात कहते हैं, तो दूसरी तरफ दुनिया के कई देश अपनी ऊर्जा सुरक्षा के लिए रूसी तेल और गैस पर निर्भर हैं। यूरोपीय संघ द्वारा अरबों डॉलर की ऊर्जा खरीद इस बात का पुख्ता सबूत है कि प्रतिबंधों के बावजूद व्यापार के रास्ते पूरी तरह बंद नहीं हुए हैं। अमेरिकी मीडिया और राजनीतिक हलकों में ट्रम्प के इन बयानों पर अब तीखी प्रतिक्रियाएं आ रही हैं।
वैश्विक बाजार और अमेरिकी मीडिया की चुप्पी पर उठे सवाल
डोनाल्ड ट्रम्प ने जिस तरह से अमेरिकी मीडिया की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाए हैं, उसने प्रेस की स्वतंत्रता और निष्पक्षता पर भी बहस छेड़ दी है। उनका आरोप है कि मीडिया चुनिंदा मुद्दों को तूल देता है जबकि यूरोपीय संघ द्वारा किए गए अरबों डॉलर के ऊर्जा सौदों पर पर्दा डाल दिया जाता है। आम जनता और निवेशकों के बीच भी इस बात को लेकर चर्चा तेज हो गई है कि क्या महाशक्तियां अपने आर्थिक हितों के आगे नैतिकता को दरकिनार कर रही हैं। वैश्विक स्तर पर ऊर्जा आपूर्ति और महंगाई के हालात को देखते हुए यह मुद्दा आने वाले दिनों में और अधिक तूल पकड़ सकता है।
द फ्रीलान्स की ग्राउंड पड़ताल बताती है कि रूस से ऊर्जा आयात को लेकर दुनिया के बड़े देशों की नीतियां दोमुंही हैं। एक तरफ जहां सार्वजनिक मंचों पर प्रतिबंधों का ढिंढोरा पीटा जाता है, वहीं पर्दे के पीछे बड़े सौदे बदस्तूर जारी रहते हैं। ट्रम्प के इस ताजा खुलासे ने एक बार फिर से पश्चिमी देशों की कूटनीति के काले सच को दुनिया के सामने लाकर रख दिया है। आने वाले हफ्तों में यह देखना दिलचस्प होगा कि यूरोपीय संघ और अमेरिकी मीडिया इस तीखे हमले का क्या जवाब देते हैं।



