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धर्मपढ़ने में समय: 3 मिनट

गरुड़ पुराण: जानिए मृत्यु के बाद शव की नाक और कान में क्यों रखी जाती है रुई, क्या है इसके पीछे का रहस्य

हिंदू धर्म में मृत्यु के बाद शव की नाक, कान और खुले अंगों में रुई रखने की परंपरा है। गरुड़ पुराण और आयुर्वेद में इसके पीछे ऊर्जा के संरक्षण, स्वच्छता और वैज्ञानिक कारणों को विस्तार से समझाया गया है।
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धर्म एवं संस्कृति डेस्क, द फ्रीलांस
संस्कृति व विरासत डेस्क•8 अक्टूबर 2026 • अपडेटेड•48
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गरुड़ पुराण: जानिए मृत्यु के बाद शव की नाक और कान में क्यों रखी जाती है रुई, क्या है इसके पीछे का रहस्य
📷 गरुड़ पुराण: जानिए मृत्यु के बाद शव की नाक और कान में क्यों रखी जाती है रुई, क्या है इसके पीछे का रहस्य — मुख्य घटनाक्रमफोटो साभार: रॉयटर्स / एजेंसीज़ / सोशल मीडिया

खबर की बड़ी बातें (Key Highlights)

  • हिंदू धर्म और गरुड़ पुराण में मृत्यु के बाद संस्कारों के लिए कड़े नियम तय किए गए हैं।
  • शव के खुले अंगों में रुई रखने से ऊर्जा के रिसाव को रोकने और पवित्रता बनाए रखने में मदद मिलती है।
  • वैज्ञानिक और आयुर्वेदिक दृष्टिकोण से यह प्रक्रिया डीकंपोजिशन के दौरान निकलने वाले तरल पदार्थों और संक्रमण को रोकती है।

हिंदू धर्म में जन्म से लेकर मृत्यु तक और उसके बाद के संस्कारों के लिए कई कड़े नियम, परंपराएं और रीति-रिवाज तय किए गए हैं। इन सभी संस्कारों के पीछे कोई न कोई गहरा वैज्ञानिक, दार्शनिक या आध्यात्मिक कारण जरूर छिपा होता है। किसी व्यक्ति की मृत्यु के तुरंत बाद आपने एक परंपरा जरूर देखी होगी, जिसमें मृतक के शव की नाक, कान और अन्य खुले अंगों में रुई (Cotton) या कफन के कपड़े का टुकड़ा रख दिया जाता है।

अक्सर लोगों के मन में यह सवाल आता है कि आखिर अंतिम संस्कार से पहले मृत शरीर के साथ ऐसा क्यों किया जाता है? क्या यह महज एक प्रथा है या इसके पीछे कोई धार्मिक और वैज्ञानिक वजह है? हिंदू धर्म के पवित्र ग्रंथ 'गरुड़ पुराण' और आयुर्वेद में इस परंपरा के पीछे के रहस्यों को बहुत ही विस्तार से समझाया गया है। आइए जानते हैं कि मृत्यु के बाद नाक और कान में रुई क्यों लगाई जाती है।

प्राण वायु और ऊर्जा के संरक्षण का नियम

गरुड़ पुराण के अनुसार, जब किसी व्यक्ति की मृत्यु होती है, तो उसके शरीर से प्राण निकलकर सूक्ष्म यात्रा पर चले जाते हैं। गरुड़ पुराण के अनुसार, शरीर के भीतर नौ मुख्य द्वार (छिद्र) माने गए हैं- दो आंखें, दो कान, दो नाक के छिद्र, एक मुंह और दो नीचे के अंग। ऐसा माना जाता है कि मृत्यु के समय और उसके तुरंत बाद भी शरीर की ऊर्जा और बची हुई सूक्ष्म प्राण-वायु इन खुले अंगों के जरिए बाहर निकलने का प्रयास करती है। ऊर्जा के इस अनावश्यक रिसाव को रोकने और शरीर की पवित्रता बनाए रखने के लिए नाक और कान जैसे अंगों को रुई से बंद कर दिया जाता है।

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वैज्ञानिक और स्वास्थ्य से जुड़ा कारण

धार्मिक मान्यताओं के साथ-साथ इस प्रथा के पीछे एक बहुत बड़ा वैज्ञानिक और व्यावहारिक कारण भी है। आयुर्वेद और मेडिकल साइंस के अनुसार मृत्यु के कुछ ही घंटों बाद शरीर में प्राकृतिक रूप से डीकंपोजिशन (सड़न) की प्रक्रिया शुरू हो जाती है और शरीर के भीतर गैसें बनने लगती हैं। वहीं, कई बार आंतरिक अंगों के ढीले पड़ने के कारण नाक या कानों से शारीरिक तरल पदार्थ (Fluids) बाहर आने लगते हैं।

इसके अलावा, अंतिम यात्रा शुरू होने से पहले और घर पर रिश्तेदारों के आने-जाने के दौरान किसी तरह की असुविधा या संक्रमण (Infection) न फैले, इसलिए स्वच्छता और गरिमा बनाए रखने के लिए इन अंगों को रुई से ढंका जाता है.

नकारात्मक ऊर्जा से रक्षा की मान्यता

लोक मान्यताओं और प्राचीन ग्रंथों के अनुसार, मृत शरीर का अंतिम संस्कार होने तक वह बहुत संवेदनशील अवस्था में रहता है। ऐसा माना जाता है कि खुले हुए अंगों के माध्यम से कोई नकारात्मक सूक्ष्म शक्ति या कीट-पतंगे शरीर को प्रभावित न कर सकें, इसलिए भी सुरक्षा के तौर पर यह उपाय किया जाता है ताकि मृतक की आत्मा की शांति और पवित्रता भंग न हो.

डिस्क्लेमर एवं साभार

सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर वायरल इस वीडियो के दावों की सत्यता की 'The Freelance' स्वतंत्र रूप से पुष्टि नहीं करता है। यह वीडियो सोशल मीडिया पर व्यापक चर्चा का विषय बना हुआ है। वीडियो साभार: संबंधित सोशल मीडिया हैंडल / क्रिएटर।

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