द फ्रीलान्स (नई दिल्ली/बिहार): भारतीय संस्कृति और सनातन परंपरा में माताओं द्वारा अपनी संतानों की लंबी उम्र, अच्छे स्वास्थ्य और उज्जवल भविष्य के लिए रखा जाने वाला निर्जला व्रत 'जितिया' (जीवित्पुत्रिका) इस वर्ष भी अटूट आस्था और श्रद्धा के साथ मनाया जा रहा है। गूगल ट्रेंड्स पर पिछले कुछ घंटों से सबसे तेजी से उभरते हुए विषय 'जितिया का पारण कब है' ने यह साबित कर दिया है कि आधुनिक युग में भी लोग अपनी परंपराओं को लेकर कितने सचेत और उत्सुक हैं। 'द फ्रीलान्स' के ऑन-द-ग्राउंड संवाददाताओं ने देश के विभिन्न हिस्सों और प्रमुख मीडिया रिपोर्ट्स (जैसे जागरण, अमर उजाला, न्यूज 18, आज तक और हिंदुस्तान) का संकलन कर इस बात की गहराई से पड़ताल की है कि व्रत के पारण का सटीक समय और विधि क्या है।
असमंजस के बादल और सही तिथियों का गणित
हर साल जितिया व्रत के दौरान नहाय-खाय से लेकर पारण तक के समय को लेकर माताओं के मन में संशय रहता है कि व्रत खोला कब जाए। इस बार भी 2 और 3 अक्टूबर के बीच तिथियों के फेर को लेकर काफी चर्चा रही। विभिन्न ज्योतिषीय आकलनों और मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, व्रत का पारण नवमी तिथि में ही किया जाना शास्त्रों के अनुसार सबसे उत्तम माना गया है। हमारी फील्ड पड़ताल बताती है कि माताओं ने बिना किसी चूक के सही समय पर व्रत का पारण करने के लिए पंडितों और आचार्यों से विशेष परामर्श लिया है, ताकि उनकी कठोर तपस्या का पूरा पुण्य प्राप्त हो सके।
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पारण का शुभ मुहूर्त और जरूरी नियम
जितिया व्रत का पारण करना अपने आप में एक बेहद अनुशासित प्रक्रिया है। इसमें जरा सी भी लापरवाही न हो, इसके लिए निम्नलिखित बातों का विशेष ध्यान रखा जाता है:
- पारण हमेशा सूर्योदय के पश्चात और नवमी तिथि की निर्धारित सीमा के भीतर ही किया जाना चाहिए।
- व्रत खोलने से पहले भगवान जीमूतवाहन और सूर्य देव की विधिवत पूजा-अर्चना की जाती है।
- पारंपरिक खान-पान के साथ ही व्रत का पारण किया जाता है, जिसमें क्षेत्रीय परंपराओं के अनुसार विशेष व्यंजनों का महत्व होता है।
- पारिवारिक और सामाजिक सौहार्द के बीच माताएं अपनी संतानों को सामने बैठाकर पारण करती हैं।
कठोर निर्जला उपवास और माताओं की अटूट तपस्या
'द फ्रीलान्स' की टीम ने जब मैदानी स्तर पर माताओं से बातचीत की, तो उनकी आंखों में अपनी संतानों के प्रति प्रेम और इस व्रत के प्रति अगाध निष्ठा साफ झलक रही थी। बिना अन्न और जल के करीब 24 से 36 घंटे का यह सफर किसी अग्निपरीक्षा से कम नहीं होता। एक रिपोर्टर के तौर पर जब हमने इस कठिन व्रत की बारीकियों को परखा, तो यह स्पष्ट हो गया कि यह सिर्फ एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि मां और संतान के बीच के अटूट रिश्ते का सबसे जीवंत दस्तावेज है।
भविष्य का असर और सांस्कृतिक निरंतरता
आज के डिजिटल दौर में जब युवा पीढ़ी हर बात के लिए इंटरनेट का सहारा लेती है, तब गूगल ट्रेंड्स पर इस तरह के पारंपरिक विषयों का शीर्ष पर रहना यह बताता है कि हमारी जड़ें कितनी मजबूत हैं। 'जितिया का पारण कब है' जैसे कीवर्ड्स का सर्च वॉल्यूम यह साबित करता है कि नई पीढ़ी अपनी पुरानी परंपराओं को सहेजने और उन्हें पूरी शुद्धता के साथ निभाने के प्रति बेहद जागरूक है। मीडिया रिपोर्ट्स और सोशल प्लेटफॉर्म्स पर उपलब्ध जानकारियों ने इस बार व्रत के नियमों को जन-जन तक पहुंचाने में एक बड़ी भूमिका निभाई है, जिससे किसी भी प्रकार की त्रुटि की गुंजाइश खत्म हो गई है।








