नई दिल्ली/ग्राउंड ब्यूरो — देश भर में इन दिनों स्थानीय प्रशासनिक दफ्तरों और खासकर तहसीलदारों के कामकाज को लेकर चर्चाएं तेज हो गई हैं। गूगल ट्रेंड्स पर 'तहसीलदार' शब्द अचानक सबसे ज्यादा सर्च किए जाने वाले विषयों में शामिल हो गया है। आम लोग जमीन की रजिस्ट्री, इंतकाल यानी नामांतरण और सरकारी दस्तावेजों के लिए सीधे तहसील कार्यालयों की तरफ रुख कर रहे हैं। हमारे फील्ड रिपोर्टर ने जब राज्यों के स्थानीय दफ्तरों की जमीनी हकीकत जानी, तो पता चला कि हर दिन सैकड़ों आवेदन पेंडिंग पड़े हैं। लोगों को अपने छोटे-छोटे कागजात बनवाने के लिए कई-कई दिनों तक बाबू और अधिकारियों के चक्कर काटने पड़ रहे हैं।
इस पूरे मामले की मुख्य वजह जमीन के डिजिटल रिकॉर्ड और पुरानी फाइलों का मिलान न होना है। कई इलाकों में किसानों और छोटे भू-स्वामियों को अपनी जमीन बेचने या उस पर लोन लेने के लिए तहसीलदार के हस्ताक्षर की सख्त जरूरत होती है। लेकिन दफ्तरों में स्टाफ की कमी और सर्वर डाउन रहने की समस्या आम हो चुकी है। लोग सुबह से लाइन में लगते हैं और शाम को बिना काम हुए ही वापस लौटने को मजबूर होते हैं। ऑनलाइन पोर्टल पर आवेदन करने के बाद भी कई हफ्तों तक स्टेटस में कोई बदलाव नहीं दिखता है, जिससे जनता का गुस्सा लगातार बढ़ रहा है।
जमीन के नामांतरण और इंतकाल में देरी क्यों हो रही है?
तहसील कार्यालयों में सबसे ज्यादा भीड़ जमीन के नामांतरण के मामलों को लेकर उमड़ रही है। नियम के मुताबिक जमीन की खरीद-फरोख्त के बाद तय समय सीमा के भीतर मालिकाना हक बदल जाना चाहिए। लेकिन मैदानी सच्चाई इसके बिल्कुल विपरीत नजर आती है। कई जिलों में पटवारी और कानूनगो स्तर पर फाइलें महीनों तक अटकी रहती हैं। जब आम आदमी सीधे तहसीलदार से मिलता है, तो उसे तकनीकी अड़चनों का हवाला दिया जाता है। इस देरी के कारण कई बार लोग बिचौलियों और दलालों के चंगुल में फंस जाते हैं, जो अवैध रूप से काम करवाने के नाम पर मोटी रकम वसूलते हैं।
राज्य सरकारों के राजस्व विभागों ने इस भ्रष्टाचार और लापरवाही पर कड़ा रुख अपनाया है। कई राज्यों में मुख्य सचिवों ने जिलाधिकारियों को निर्देश दिए हैं कि वे औचक निरीक्षण करें। जो अधिकारी बिना किसी ठोस वजह के फाइलों को रोक कर रखते हैं, उनके खिलाफ विभागीय जांच के आदेश दिए जा रहे हैं। सरकार चाहती है कि आम जनता को पारदर्शिता के साथ समय पर सेवाएं मिलें। इसके लिए लोक सेवा गारंटी कानूनों का सख्ती से पालन करवाने की बात कही जा रही है ताकि जवाबदेही तय हो सके।
ऑनलाइन पोर्टल और डिजिटल सेवाओं की जमीनी हकीकत
सरकार ने भ्रष्टाचार रोकने और काम में तेजी लाने के लिए सब कुछ ऑनलाइन कर दिया है। लेकिन ग्रामीण इलाकों में इंटरनेट की धीमी रफ्तार और सर्वर की खराबी इस डिजिटल प्रक्रिया में बड़ा रोड़ा बन रही है। किसानों का कहना है कि वे ऑनलाइन आवेदन तो कर देते हैं, लेकिन उसका प्रिंट लेकर जब तहसीलदार के पास जाते हैं, तो उन्हें नया टोकन लेने को कहा जाता है। तकनीक के आने से कागजी काम कम होने के बजाय और ज्यादा उलझ गया है। बुजुर्ग और कम पढ़े-लिखे लोग इन डिजिटल पोर्टल को ठीक से समझ नहीं पाते हैं, जिसके कारण उन्हें जनसेवा केंद्रों पर अतिरिक्त पैसे देने पड़ते हैं।
द फ्रीलान्स की टीम ने जब कुछ स्थानीय तहसीलदारों से इस बारे में बात की, तो उन्होंने अपनी मजबूरियां गिनाईं। उनका कहना था कि एक अधिकारी के पास दो से तीन तहसीलों का अतिरिक्त प्रभार होता है। कोर्ट के काम, प्रशासनिक बैठकें और कानून-व्यवस्था की ड्यूटी के बीच उन्हें फाइलों को देखने का पूरा वक्त नहीं मिल पाता है। इसके बावजूद वे छुट्टियों के दिन भी बैठकर काम निपटाने की कोशिश कर रहे हैं। सरकार को चाहिए कि वह मैदानी स्तर पर कर्मचारियों की संख्या बढ़ाए ताकि आम जनता को राहत मिल सके।
आम जनता के लिए जरूरी सलाह और आगे की राह
यदि आपको भी किसी काम से तहसीलदार दफ्तर जाना पड़ रहा है, तो कुछ जरूरी बातों का ध्यान जरूर रखें। अपने सभी दस्तावेज पहले से पूरे रखें और बिचौलियों के चक्कर में बिल्कुल न पड़ें। यदि कोई अधिकारी बिना वजह आपका काम अटकाता है, तो आप इसकी शिकायत उच्च अधिकारियों या भ्रष्टाचार रोधी हेल्पलाइन पर दर्ज करा सकते हैं। डिजिटल पोर्टल की रसीद हमेशा अपने पास संभाल कर रखें ताकि जरूरत पड़ने पर उसका उपयोग किया जा सके। आने वाले दिनों में प्रशासन इस व्यवस्था को और अधिक पारदर्शी बनाने के लिए कड़े कदम उठाने की तैयारी कर रहा है।








