पाकिस्तान की सियासत में उबाल, शहबाज सरकार पर उठे गंभीर सवाल
पड़ोसी मुल्क पाकिस्तान में राजनीतिक और प्रशासनिक उथल-पुथल थमने का नाम नहीं ले रही है। देश की हुकूमत और विपक्ष के बीच चल रहा टकराव अब सड़कों से लेकर जनसभाओं तक खुलकर सामने आ चुका है। हाल ही में जमीयत उलेमा-ए-इस्लाम-फजल (JUI-F) पार्टी के प्रमुख और देश के जाने-माने विपक्षी नेता मौलाना फजलुर रहमान ने प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ की सरकार पर बेहद तीखा हमला बोला है। उन्होंने मौजूदा हुकूमत को सीधे तौर पर 'फर्जी सरकार' करार दिया है और इसके चुनावी जनादेश की वैधता पर बड़े सवालिया निशान खड़े कर दिए हैं।
मुल्तान जिले में आयोजित एक विशाल जनसभा को संबोधित करते हुए मौलाना फजलुर रहमान ने कहा कि जिस सरकार को देश की आम जनता का वास्तविक चुनावी समर्थन ही हासिल नहीं हो, उसे सत्ता में बने रहने का कोई नैतिक अधिकार नहीं है। उन्होंने सत्ता में बैठे शीर्ष लोगों को 'ताकतहीन शासक' बताते हुए आरोप लगाया कि देश की लोकतांत्रिक संस्थाओं को कमजोर करने का सुनियोजित खेल खेला जा रहा है। उनके इस बयान ने पाकिस्तानी राजनीतिक गलियारों में खलबली मचा दी है, क्योंकि यह ऐसे समय में आया है जब देश के विभिन्न हिस्सों में पहले से ही गहरा असंतोष व्याप्त है।
खैबर पख्तूनख्वा में गवर्नर शासन और आपातकाल का कड़ा विरोध
इस ताजा राजनीतिक टकराव की मुख्य वजह खैबर पख्तूनख्वा प्रांत में इमरान खान की पार्टी पाकिस्तान तहरीक-ए-इंसाफ (PTI) की प्रांतीय सरकार को हटाए जाना है। राष्ट्रपति आसिफ अली जरदारी ने प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ की कैबिनेट की सिफारिश पर प्रांत में आपातकाल और गवर्नर शासन लागू करने का बड़ा कदम उठाया था। इस कार्रवाई के बाद से ही पीटीआई समर्थकों और विपक्षी दलों में भारी रोष देखा जा रहा है।
मौलाना फजलुर रहमान ने इस फैसले को सीधे तौर पर लोकतंत्र के गले पर घोंटा गया चाकू बताया है। उनका कहना है कि इस तरह से चुनी हुई प्रांतीय सरकारों को बर्खास्त करना देश के संघीय ढांचे और संविधान की मूल भावना के पूरी तरह खिलाफ है। हालांकि उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि वे इस पूरी कार्रवाई का विरोध पूरी तरह से लोकतांत्रिक और शांतिपूर्ण तरीकों से करेंगे, लेकिन हुकूमत की ज्यादतियों को चुपचाप सहन नहीं किया जाएगा।
सेना और नौकरशाही की भूमिका पर उठाए गए बड़े सवाल
अपनी जनसभा के दौरान विपक्षी नेता ने देश की शक्तिशाली सेना और नौकरशाही के बढ़ते प्रभाव पर भी खुलकर बात की। उन्होंने दो टूक शब्दों में चेतावनी दी कि सेना, खुफिया एजेंसियों, नौकरशाही और सभी संवैधानिक संस्थाओं को अपने तयशुदा दायरे में रहकर ही काम करना चाहिए। राजनीति में लगातार हो रहा गैर-जरूरी दखल देश के लोकतांत्रिक भविष्य के लिए बेहद खतरनाक साबित हो सकता है।
मौलाना ने कहा कि जब देश के ادارے अपने संवैधानिक कर्तव्यों से भटककर राजनीतिक फैसलों में सीधे तौर पर शामिल होने लगते हैं, तो जनता का सिस्टम से भरोसा उठ जाता है। उनका यह बयान ऐसे समय आया है जब प्रांत में सुरक्षा हालात का हवाला देकर आपातकाल थोपा गया है, जबकि आलोचकों का मानना है कि इसका असल मकसद राजनीतिक विरोधियों का दमन करना है।
"देश की मौजूदा सरकार को जनता का कोई जनादेश प्राप्त नहीं है। यह पूरी तरह से एक फर्जी हुकूमत है जो ताकतों के इशारे पर चल रही है। सेना और सभी संस्थाओं को अपने संवैधानिक दायरे में रहकर काम करना चाहिए, तभी देश में लोकतंत्र बच पाएगा।" — मौलाना फजलुर रहमान, प्रमुख, JUI-F
घरेलू क्रिकेट और जनजीवन पर भी पड़ रहा है गहरा असर
इस राजनीतिक और प्रशासनिक अस्थिरता का असर अब केवल संसद और सड़कों तक सीमित नहीं रहा, बल्कि इसका सीधा प्रभाव आम नागरिकों के जीवन और खेल गतिविधियों पर भी साफ दिखाई देने लगा है। सुरक्षा और प्रशासनिक व्यवस्था के बिगड़ने का हवाला देते हुए पाकिस्तान क्रिकेट बोर्ड (PCB) को घरेलू क्रिकेट टूर्नामेंट के कई महत्वपूर्ण मुकाबलों के वेन्यू बदलने पड़े हैं। खैबर पख्तूनख्वा के जिन इलाकों में हालात सबसे ज्यादा तनावपूर्ण बने हुए हैं, वहां से मैचों को दूसरे सुरक्षित शहरों में शिफ्ट किया गया है।
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि हुकूमत और विपक्ष के बीच चल रहा यह गतिरोध जल्द ही बातचीत के जरिए हल नहीं किया गया, तो देश में आर्थिक और सामाजिक संकट और अधिक गहरा सकता है। महंगाई और बेरोजगारी से जूझ रही आम जनता पहले से ही त्रस्त है, और ऐसे में राजनीतिक दलों की यह खींचतान मुल्क को एक नए अनिश्चित दौर में धकेल सकती है।












