खैबर पख्तूनख्वा में आपातकाल और राज्यपाल शासन की घोषणा
पड़ोसी देश पाकिस्तान में राजनीतिक अस्थिरता एक बार फिर गंभीर मोड़ पर पहुंच गई है। शहबाज शरीफ सरकार ने बढ़ते सुरक्षा संकट और प्रांतीय प्रशासन के असहयोग का हवाला देते हुए खैबर पख्तूनख्वा प्रांत में आपातकाल लागू करने के साथ ही राज्यपाल शासन थोप दिया है। यह प्रांत जेल में बंद पूर्व प्रधानमंत्री इमरान खान की पार्टी पाकिस्तान तहरीक-ए-इंसाफ (पीटीआई) का मुख्य राजनीतिक गढ़ माना जाता है।
संसद के संयुक्त सत्र में भारी हंगामे और विपक्षी दलों के विरोध प्रदर्शन के बीच इस प्रस्ताव को मंजूरी दी गई। संघीय सरकार का तर्क है कि प्रांतीय सरकार आतंकवाद से निपटने में नाकाम साबित हो रही थी और आंदोलन-रोधी गतिविधियों को बढ़ावा दे रही थी। हालांकि, राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह कदम असल में पीटीआई के बढ़ते जनाधार और संभावित विरोध मार्च को कुचलने की एक राजनीतिक रणनीति है।
इस फैसले के बाद से पूरे प्रांत में अनिश्चितता का माहौल है। प्रांतीय सरकार के निलंबन से संघीय और प्रांतीय राजनीति के बीच टकराव और अधिक गहरा गया है, जिससे देश के भीतर आंतरिक संघर्ष की आशंकाएं तेज हो गई हैं।
सड़कों पर उतरी सेना और चरम पर पहुंचा गतिरोध
संघीय सरकार के इस कदम के बाद पेशावर और आसपास के इलाकों में सुरक्षा बलों ने कड़ा पहरा बिठा दिया है। कई प्रमुख मार्गों पर भारी मालवाहक कंटेनर खड़े कर दिए गए हैं, और शहर के संवेदनशील हिस्सों में सेना की टुकड़ियों की तैनाती की गई है। सुरक्षा व्यवस्था का हवाला देते हुए शुरुआती दौर में इंटरनेट सेवाओं को भी आंशिक रूप से बाधित किया गया था, जिससे आम जनजीवन बुरी तरह प्रभावित हुआ।
पीटीआई कार्यकर्ताओं और समर्थकों ने इस दमनकारी कार्रवाई के खिलाफ तीखा रोष व्यक्त किया है। पार्टी के दर्जनों कार्यकर्ता सड़कों पर उतरकर सरकार विरोधी नारे लगा रहे हैं, जिन्हें तितर-बितर करने के लिए सुरक्षा बलों को आंसू गैस के गोलों का सहारा लेना पड़ा। पीटीआई के अधिकांश वरिष्ठ नेता गिरफ्तारी से बचने के लिए भूमिगत हो गए हैं, जिससे राजनीतिक संवाद के सारे रास्ते फिलहाल बंद नजर आ रहे हैं।
पाकिस्तान के सूचना मंत्री अत्ताउल्लाह तरार ने पत्रकारों से बातचीत में दावा किया था कि प्रांतीय प्रशासन के कुछ तत्व देश विरोधी ताकतों के संपर्क में थे। हालांकि, सरकार की ओर से अभी तक इस दावे के समर्थन में कोई ठोस सार्वजनिक दस्तावेज पेश नहीं किया गया है, जिससे सरकार की मंशा पर लगातार सवाल उठ रहे हैं।
घरेलू क्रिकेट पर भी मंडराया राजनीतिक संकट का साया
राजनीतिक उथल-पुथल और प्रशासनिक अनिश्चितता का सीधा असर अब पाकिस्तान की खेल गतिविधियों पर भी दिखने लगा है। पाकिस्तान क्रिकेट बोर्ड (पीसीबी) ने सुरक्षा और बिगड़ते हालातों को देखते हुए प्रेसिडेंट्स ट्रॉफी ग्रेड-1 के कई महत्वपूर्ण मुकाबलों के वेन्यू में अचानक फेरबदल किया है।
तय कार्यक्रम के अनुसार, पेशावर और एबटाबाद में होने वाले मुकाबले अब अन्य सुरक्षित शहरों में शिफ्ट किए जा चुके हैं। पेशावर के ऐतिहासिक इमरान खान स्टेडियम और एबटाबाद क्रिकेट स्टेडियम में हाल ही में बड़े स्तर पर राष्ट्रीय स्तर के मैच आयोजित करने की तैयारियां चल रही थीं, लेकिन ताजा हालात ने पीसीबी की योजनाओं पर पानी फेर दिया है।
इस बदलाव के कारण खिलाड़ियों और आयोजकों दोनों को भारी परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है। खेल प्रेमियों में भी इस बात को लेकर निराशा है कि देश की राजनीति का सीधा असर अब खेल के मैदानों पर भी पड़ने लगा है।
विपक्षी दलों का तीखा विरोध और भविष्य की आशंकाएं
संसद के संयुक्त सत्र के दौरान विपक्षी सांसदों ने संघीय सरकार के इस तानाशाही रवैये के खिलाफ जमकर प्रदर्शन किया। 'इमरजेंसी नामंजूर' लिखी तख्तियों के साथ सांसदों ने वेल में आकर नारेबाजी की। उनका कहना है कि संविधान के प्रावधानों का दुरुपयोग करके चुनी हुई प्रांतीय सरकारों को बर्खास्त करना लोकतंत्र की हत्या के समान है।
राजनीतिक जानकारों का मानना है कि यदि यही रुख जारी रहा, तो देश के अन्य हिस्सों में भी बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शन भड़क सकते हैं। इमरान खान की रिहाई की मांग को लेकर पीटीआई पहले से ही लामबंद है, और इस ताज़ा कार्रवाई ने आग में घी डालने का काम किया है।
"देश इस समय बेहद संवेदनशील दौर से गुजर रहा है। राजनीतिक बदले की भावना से लिए गए ऐसे फैसलों से आंतरिक सुरक्षा और अधिक कमजोर होगी।"— वरिष्ठ राजनीतिक विश्लेषक, इस्लामाबाद
आने वाले दिनों में यह संकट किस करवट बैठेगा, यह इस बात पर निर्भर करेगा कि न्यायपालिका और जनता इस संघीय हस्तक्षेप पर क्या रुख अपनाती है। फिलहाल, पाकिस्तान का राजनीतिक आसमान काले बादलों से घिरा हुआ है और हर कोई किसी अनहोनी की आशंका से सहमा हुआ है।








