देश की आर्थिक राजधानी मुंबई की पटरियों से लेकर राजस्थान के रेगिस्तानी इलाकों और पूर्वी छोर पर स्थित पश्चिम बंगाल तक, प्रकृति का एक अलग ही और खौफनाक रूप देखने को मिल रहा है। 'द फ्रीलान्स' की विशेष टीम ने जब जमीनी हालात का जायजा लिया, तो पाया कि मूसलाधार बारिश और बाढ़ ने आम जनजीवन को पूरी तरह से पटरी से उतार दिया है। मौसम विभाग की चेतावनियों के बावजूद बुनियादी ढांचे की कमियां एक बार फिर खुलकर सामने आ गई हैं।
मुंबई की धड़कन थमी: जलमग्न पटरियां और रेंगती लोकल ट्रेनें
व्यापारिक नगरी मुंबई में पिछले कुछ घंटों से हो रही झमाझम बारिश ने एक बार फिर साबित कर दिया है कि मानसून की एक जोरदार पारी महानगर के ड्रेनेज सिस्टम की पोल खोलने के लिए काफी है। स्थिति इतनी गंभीर हो चुकी है कि पटरियों पर पानी भरने के कारण लोकल ट्रेनें, जिन्हें मुंबई की 'लाइफलाइन' कहा जाता है, पानी को चीरती हुई बेहद धीमी गति से आगे बढ़ रही हैं। निचले इलाकों में जलभराव के कारण ट्रैफिक जाम की लंबी कतारें लग गई हैं और आम नागरिकों को दफ्तर पहुंचने में भारी मशक्कत करनी पड़ रही है।
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पश्चिम बंगाल में कुदरत का कहर: कई जिलों में 'लाल अलर्ट' जारी
सिर्फ पश्चिमी भारत ही नहीं, बल्कि पूर्वी भारत में भी मौसम के तेवर तल्ख बने हुए हैं। पश्चिम बंगाल के मौसम विभाग ने राज्य के कई जिलों में भारी से अति भारी बारिश की चेतावनी जारी करते हुए 'रेड अलर्ट' (Red Alert) घोषित किया है। नदी किनारे बसे इलाकों और निचले हिस्सों में रहने वाले लोगों को सुरक्षित स्थानों पर जाने के निर्देश दिए गए हैं। स्थानीय प्रशासन किसी भी अप्रिय स्थिति से निपटने के लिए पूरी तरह मुस्तैद नजर आ रहा है, लेकिन लगातार हो रही बारिश के कारण राहत कार्यों में बाधा आ रही है।
राजस्थान में बाढ़ का प्रलय: रेगिस्तान में जलसैलाब
रेगिस्तानी राज्य के रूप में पहचाने जाने वाले राजस्थान में इस बार मानसून ने हैरान करने वाले आंकड़े पेश किए हैं। राज्य के कई हिस्सों में बादल फटने और भारी बारिश के चलते बाढ़ जैसे हालात पैदा हो गए हैं। 'द फ्रीलान्स' के इनपुट के मुताबिक, ग्रामीण इलाकों में पानी भर जाने से संपर्क टूट गया है और जनजीवन बुरी तरह प्रभावित हुआ है। प्रशासनिक अमला राहत और बचाव कार्यों में जुटा है, लेकिन अचानक आए इस जलसैलाब ने ग्रामीण अर्थव्यवस्था को गहरा आघात पहुंचाया है।
जलवायु परिवर्तन और शहरी नियोजन की नाकामी
विशेषज्ञों का मानना है कि मौसम के मिजाज में आ रहा यह बदलाव केवल सामान्य मानसूनी चक्र नहीं है, बल्कि इसके पीछे ग्लोबल वार्मिंग और अनियोजित शहरीकरण की बड़ी भूमिका है। मुंबई से लेकर बंगाल और राजस्थान तक, जल निकासी के पुराने पड़ चुके तरीकों ने संकट को और विकराल बना दिया है। जब तक शहरों और गांवों में ड्रेन नेटवर्क को मजबूत नहीं किया जाएगा, तब तक हर साल इस तरह की आपदाएं आम नागरिकों की जिंदगी को यूं ही बेपटरी करती रहेंगी।








