राजधानी दिल्ली में चुनाव आयोग के खिलाफ उबाल और छात्रों का प्रदर्शन
देश की राजधानी दिल्ली इन दिनों सियासी और चुनावी नियुक्तियों को लेकर सुलग रही है। जंतर-मंतर से लेकर इंडिया गेट तक विरोध प्रदर्शनों का दौर थमने का नाम नहीं ले रहा है। इसी कड़ी में वामपंथी छात्र संगठन ऑल इंडिया स्टूडेंट्स एसोसिएशन (AISA) ने मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) ज्ञानेश कुमार के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है। संगठन का आरोप है कि चुनाव आयोग के कामकाज में गंभीर अनियमितताएं हो रही हैं और विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) प्रक्रिया के तहत बड़ी संख्या में मतदाताओं के नाम चुपचाप हटाए जा रहे हैं। इसी मुद्दे को लेकर छात्रों ने लगातार तीसरे दिन अपना विरोध प्रदर्शन जारी रखा, जिसके बाद माहौल काफी गरमा गया।
प्रदर्शनकारियों की मुख्य मांग मुख्य चुनाव आयुक्त का इस्तीफा देना है। छात्रों का कहना है कि जब तक निर्वाचन आयोग अपनी कार्यप्रणाली में पारदर्शिता नहीं लाता, तब तक उनका यह आंदोलन शांतिपूर्ण तरीके से सड़क पर जारी रहेगा। हालांकि, इस विरोध प्रदर्शन को नियंत्रित करने के लिए दिल्ली पुलिस और सुरक्षा बलों ने पहले से ही कड़े इंतजाम कर रखे थे। जंतर-मंतर के आसपास भारी पुलिस बल और बैरिकेडिंग की गई थी ताकि किसी भी तरह की अप्रिय स्थिति से निपटा जा सके, लेकिन इसके बावजूद प्रदर्शनकारियों का गुस्सा फूट पड़ा।
विरोध प्रदर्शन के दौरान उस वक्त भारी ड्रामा देखने को मिला जब पुलिस ने प्रदर्शनकारियों को तितर-बितर करना शुरू किया। छात्र नेताओं का आरोप है कि पुलिस ने आंदोलन को कुचलने के लिए तानाशाही रवैया अपनाया। इस पूरे घटनाक्रम के दौरान AISA की राष्ट्रीय अध्यक्ष नेहा बोरा पुलिस के निशाने पर आ गईं और उन्हें मौके से हिरासत में ले लिया गया। पुलिस की इस कार्रवाई के बाद से छात्र संगठनों में भारी रोष व्याप्त है और उन्होंने पुलिस प्रशासन की कार्यशैली पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं।
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निजी गाड़ी में बैठाकर ले जाने और नियमों की अनदेखी का गंभीर आरोप
AISA के सदस्यों ने दिल्ली पुलिस की कार्रवाई पर गंभीर सवाल उठाते हुए सनसनीखेज आरोप लगाए हैं। संगठन का दावा है कि राष्ट्रीय अध्यक्ष नेहा बोरा को जंतर-मंतर के पास से एक ऐसी प्राइवेट गाड़ी में जबरन उठाया गया जिस पर कोई नंबर प्लेट तक नहीं लगी हुई थी। छात्रों का कहना है कि किसी भी महिला प्रदर्शनकारी या नेता को हिरासत में लेते समय तय कानूनी प्रक्रियाओं का पालन करना अनिवार्य होता है, लेकिन इस मामले में उन नियमों की धज्जियां उड़ाई गईं।
छात्र नेताओं ने यह भी दावा किया कि जिस निजी वाहन में नेहा बोरा को बैठाकर ले जाया गया, उसमें कोई भी महिला पुलिस अधिकारी या कर्मी मौजूद नहीं थी। नियमानुसार, महिला को हिरासत में लेने के दौरान महिला पुलिस बल का होना आवश्यक है ताकि सुरक्षा और मर्यादा बनी रहे। इस तरह अचानक बिना नंबर प्लेट की गाड़ी में उठाकर अज्ञात स्थान पर ले जाने से कुछ समय के लिए असमंजस की स्थिति बन गई थी। शुरुआत में यह स्पष्ट नहीं हो पा रहा था कि उन्हें किस थाने में ले जाया गया है, जिससे साथियों में भारी चिंता फैल गई थी।
बाद में वकीलों की टीम और अन्य साथियों की खोजबीन के बाद यह जानकारी सामने आई कि नेहा बोरा को दिल्ली के दूरदराज इलाके में स्थित नरेला इंडस्ट्रियल एरिया पुलिस स्टेशन ले जाया गया था। वहां कुछ समय तक हिरासत में रखने के बाद उन्हें रिहा कर दिया गया। इस दौरान उनके पास उनका मोबाइल फोन और बैग भी नहीं था, जिसे लेकर वकीलों की टीम लगातार प्रशासनिक अधिकारियों के संपर्क में बनी रही।
'हम कोई कीड़े-मकोड़े नहीं हैं': रिहाई के बाद फूटा नेहा बोरा का गुस्सा
नरेला थाने से रिहा होने के तुरंत बाद AISA अध्यक्ष नेहा बोरा ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म 'एक्स' पर एक वीडियो जारी कर अपनी भड़ास निकाली। उन्होंने अपनी जुबानी इस पूरी घटना का जिक्र करते हुए पुलिस और शासन व्यवस्था को आड़े हाथों लिया। उन्होंने कहा कि नागरिकों को लोकतंत्र में अपनी आवाज उठाने और सवाल पूछने का पूरा अधिकार है, लेकिन सरकार और प्रशासन इस आवाज को दबाने की कोशिश कर रहे हैं।
"हमें लगता है कि हम कुत्ते हैं, कॉकरोच हैं। हमें पकड़कर कहीं भी फेंक दो, मारो और गाड़ी में घुसा कर 50 किलोमीटर दूर हिरासत में ले लो। लेकिन आज आपने यह दिखाया कि हम कुत्ते नहीं हैं, कॉकरोच नहीं हैं और कीड़े-मकोड़े नहीं बल्कि इस देश के नागरिक हैं।" — नेहा बोरा, राष्ट्रीय अध्यक्ष, AISA
नेहा बोरा ने आगे कहा कि इस देश के हर नागरिक को यह जानने का पूरा अधिकार है कि जो वोट जनता देती है, उसका क्या सौदा किया जा रहा है और निर्वाचन आयोग तथा सत्ताधारी दल की क्या मिलीभगत है। उन्होंने दो टूक शब्दों में कहा कि जब-जब उनके तय किए गए प्रदर्शन स्थलों पर उन्हें रोकने की कोशिश होगी और बर्बरतापूर्वक हिरासत में लिया जाएगा, तब-तब वे सार्वजनिक मंचों पर अपनी दावेदारी और सवाल मजबूती से दर्ज कराते रहेंगे।
हिरासत में लिए जाने से ठीक पहले का वाकया भी काफी नाटकीय था। पुलिस की बैरिकेडिंग के ऊपर चढ़कर विरोध दर्ज कराती हुईं नेहा बोरा का आक्रामक अंदाज कैमरे में कैद हो गया था। पुलिस की इस दमनकारी कार्रवाई के विरोध में छात्रों ने साफ कर दिया है कि वे अपनी मांगों से पीछे हटने वाले नहीं हैं और चुनाव आयोग के खिलाफ उनका यह संघर्ष आगे भी जारी रहेगा।
इंडिया गेट और जंतर-मंतर पर हाई वोल्टेज ड्रामा, सौरभ भारद्वाज भी हुए डिटेन
यह पूरा मामला केवल नेहा बोरा तक ही सीमित नहीं रहा, बल्कि रविवार को दिल्ली के अलग-अलग हिस्सों में विरोध प्रदर्शन का एक बड़ा दौर देखने को मिला। इंडिया गेट के पास भी आम आदमी पार्टी (AAP) और उसके छात्र संगठन के कार्यकर्ताओं ने मुख्य चुनाव आयुक्त के खिलाफ जोरदार प्रदर्शन किया। हालात इतने तनावपूर्ण हो गए कि आप कार्यकर्ता उन बसों की छतों और दरवाजों पर चढ़ गए जिनमें हिरासत में लिए गए लोगों को ले जाया जा रहा था।
प्रदर्शनकारियों ने सड़क को पूरी तरह जाम कर दिया और पुलिस की गाड़ियों को आगे बढ़ने से रोक दिया। कानून-व्यवस्था की स्थिति बिगड़ने की आशंका को देखते हुए इंडिया गेट, रायसीना रोड और जंतर-मंतर के आसपास भारी संख्या में पुलिस बल के साथ-साथ पैरामिलिट्री फोर्स के जवानों को भी तैनात करना पड़ा। इस दौरान आम आदमी पार्टी के प्रमुख नेता और विधायक सौरभ भारद्वाज को भी पुलिस ने हिरासत में ले लिया।
डिटेन किए जाने के बाद सौरभ भारद्वाज ने अपनी तीखी प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि पुलिस उन्हें इस तरह से उठा कर फेंक रही है जैसे वे कोई फुटबॉल हों। उन्होंने पुलिसिया कार्रवाई की निंदा करते हुए कहा कि राजधानी में इतनी बड़ी संख्या में फोर्स तैनात है, लेकिन इसके बावजूद प्रशासनिक स्तर पर जवाबदेही तय नहीं की जा रही है। इसके साथ ही, भारतीय युवा कांग्रेस ने भी रायसीना रोड से जंतर-मंतर तक एक बड़ा कैंडल मार्च निकाला, जिसकी अगुवाई युवा कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष उदय भानु चिब ने की।
निष्कर्ष और आगे की राह
दिल्ली में चुनाव आयोग के कामकाज को लेकर राजनीतिक दलों और छात्र संगठनों का यह विरोध प्रदर्शन इस बात का संकेत है कि चुनावी निष्पक्षता और संवैधानिक संस्थाओं की कार्यप्रणाली पर जनता का भरोसा डगमगा रहा है। विपक्ष और छात्र संगठन लगातार एसआईआर प्रक्रिया और वोटर लिस्ट से नाम हटाने के मामलों की निष्पक्ष जांच की मांग कर रहे हैं। हालांकि पुलिस प्रशासन ने कानून और व्यवस्था बनाए रखने के अपने तर्क दिए हैं, लेकिन जिस प्रकार से नेताओं और छात्र अध्यक्षों को हिरासत में लिया गया, उसने मानवाधिकारों और लोकतांत्रिक असहमतियों के दमन पर एक बार फिर गंभीर बहस छेड़ दी है। आने वाले दिनों में यह राजनीतिक घमासान और अधिक तूल पकड़ सकता है क्योंकि विपक्ष इस मुद्दे को राष्ट्रीय स्तर पर उठाने की तैयारी में है।








