नई दिल्ली/ग्लोबल डेस्क — अंतरिक्ष की दुनिया में अब इंटरनेट और संचार सेवाओं की जंग बेहद तेज हो गई है। चीन ने इस तकनीकी रेस में एक बड़ा कदम बढ़ाते हुए नॉर्थ पोल यानी उत्तरी ध्रुव से साउथ पोल यानी दक्षिणी ध्रुव के बीच सैटेलाइट के जरिए लाइव वीडियो कॉल कराने में सफलता हासिल कर ली है। यह अपने आप में एक बड़ी उपलब्धि है क्योंकि पृथ्वी के दोनों सिरों के बीच बिना किसी रुकावट के सीधा संपर्क साधना बेहद कठिन काम माना जाता है। चीन के इस नए कदम से दुनिया भर के अंतरिक्ष वैज्ञानिकों की निगाहें इस पर टिक गई हैं और इसे अमेरिकी कारोबारी एलन मस्क के स्टारलिंक नेटवर्क के लिए एक सीधी और कड़ी चुनौती के रूप में देखा जा रहा है।
इस पूरे तकनीकी कारनामे को अंजाम देने के लिए चीन ने अपने खास सैटेलाइट नेटवर्क का इस्तेमाल किया है। रिपोर्ट के मुताबिक, अंतरिक्ष में मौजूद इन आधुनिक उपग्रहों की मदद से दोनों ध्रुवों के बीच डेटा का आदान-प्रदान बहुत ही कम समय में संभव हो पाया है। ध्रुवीय इलाकों में मौसम की स्थिति हमेशा खराब रहती है और वहां नेटवर्क पहुंचाना बेहद मुश्किल होता है। इसके बावजूद चीनी वैज्ञानिकों ने यह साबित कर दिया है कि उनकी अंतरिक्ष तकनीक अब वैश्विक स्तर पर किसी भी बड़ी चुनौती का मुकाबला करने के लिए पूरी तरह तैयार है। इस सफलता के बाद अब अंतरिक्ष आधारित इंटरनेट सेवाओं का बाजार और अधिक गर्म होने की पूरी संभावना है।
एलन मस्क की स्टारलिंक को मिल रही कड़ी टक्कर
अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी स्पेसएक्स के मालिक एलन मस्क की सैटेलाइट इंटरनेट सेवा स्टारलिंक इस समय दुनिया भर में अपने पैर पसार रही है। हाल ही में आंकड़े सामने आए हैं कि स्टारलिंक के ग्राहकों का आंकड़ा एक करोड़ के पार पहुंच चुका है और हर रोज हजारों नए लोग इससे जुड़ रहे हैं। ऐसे में चीन की तरफ से इस तरह का बड़ा तकनीकी प्रदर्शन करना सीधे तौर पर मस्क के एकाधिकार को चुनौती देना है। अंतरिक्ष की इस नई जंग में अब दोनों महाशक्तियां अपने-अपने नेटवर्क को और अधिक मजबूत करने में जुटी हैं ताकि वैश्विक इंटरनेट बाजार में उनका दबदबा कायम रह सके।
विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले दिनों में अंतरिक्ष की यह तकनीक केवल वीडियो कॉल तक ही सीमित नहीं रहेगी। इसका इस्तेमाल बड़े पैमाने पर समुद्री जहाजों, उड़ानों और सेना के संचार तंत्र को सुरक्षित रखने के लिए किया जाएगा। ध्रुवीय क्षेत्रों में सैटेलाइट के जरिए इस तरह की हाई-स्पीड कनेक्टिविटी मिलने से शोधकर्ताओं और यात्रियों को भी बहुत बड़ी राहत मिलेगी। चीन की इस उपलब्धि ने यह साफ कर दिया है कि वह अंतरिक्ष विज्ञान के क्षेत्र में अमेरिका को पीछे छोड़ने के लिए हरसंभव प्रयास कर रहा है और किसी भी मोर्चे पर पीछे हटने को तैयार नहीं है।
वैश्विक इंटरनेट बाजार पर पड़ेगा गहरा असर
चीन और अमेरिका के बीच चल रही इस तकनीकी रस्साकशी का सीधा असर वैश्विक टेलीकॉम और इंटरनेट बाजार पर पड़ना तय है। अभी तक पश्चिमी देशों की कंपनियों का ही अंतरिक्ष आधारित इंटरनेट पर बड़ा प्रभाव माना जाता था। लेकिन चीन के इस सफल परीक्षण के बाद अब समीकरण बदलते नजर आ रहे हैं। कम खर्च में बेहतर और सुरक्षित सेवा देने के लिए दोनों देश अपने उपग्रहों की संख्या लगातार बढ़ा रहे हैं। इस पूरी प्रतियोगिता का सबसे बड़ा फायदा आने वाले समय में उन दूर-दराज के इलाकों के लोगों को मिलेगा जहां आज भी सामान्य इंटरनेट की पहुंच बहुत मुश्किल है।
द फ्रीलान्स की इस ग्राउंड पड़ताल से यह साफ होता है कि अंतरिक्ष अब केवल अनुसंधान का दायरा नहीं रह गया है, बल्कि यह ग्लोबल बिजनेस और कूटनीति का सबसे बड़ा अखाड़ा बन चुका है। आने वाले महीनों में यह देखना बेहद दिलचस्प होगा कि एलन मस्क की स्टारलिंक इस चीनी चुनौती का क्या जवाब देती है और क्या वे अपनी सेवाओं को और अधिक देशों में तेजी से लॉन्च कर पाते हैं। भारत जैसे बड़े बाजारों में भी इन कंपनियों की नजरें टिकी हुई हैं, जहां सैटेलाइट इंटरनेट के नियमों और मंजूरियों पर काम चल रहा है।
सुरक्षा और कूटनीति के नए समीकरण
अंतरिक्ष में इस तरह की ताकत हासिल करना केवल व्यावसायिक लाभ तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके सामरिक मायने भी बहुत गहरे हैं। नॉर्थ पोल से साउथ पोल तक निर्बाध संचार स्थापित करने का मतलब है कि दुनिया के किसी भी कोने से सुरक्षित संदेशों का आदान-प्रदान आसानी से किया जा सकता है। चीन का यह सफल परीक्षण उसकी मजबूत होती अंतरिक्ष नीति और तकनीकी आत्मनिर्भरता को साफ तौर पर दर्शाता है। आने वाले दिनों में यह देखना अहम होगा कि वैश्विक स्तर पर अंतरिक्ष के नियमों और सुरक्षा को लेकर दोनों देश क्या रुख अपनाते हैं।




