नई दिल्ली/ग्राउंड ब्यूरो — देश में होने वाली अगली जनगणना के नियमों में केंद्र सरकार ने बड़ा फेरबदल किया है। नए बदलाव के तहत अब केवल सरकारी विभागों के भरोसे ही जनगणना का काम नहीं छोड़ा जाएगा। सरकार ने इसमें निजी क्षेत्र और खास तौर पर निजी शिक्षण संस्थानों में पढ़ाने वाले शिक्षकों को भी शामिल करने का अधिकार दे दिया है। इस बदलाव से देश भर में घर-घर जाकर लोगों की गिनती करने और सही आंकड़े जुटाने का काम बहुत तेजी से पूरा किया जा सकेगा। पिछले कुछ सालों से प्रशासनिक अमले पर काम का दबाव लगातार बढ़ रहा था, जिसे कम करने के लिए यह फैसला लिया गया है।
सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार, जनगणना अधिनियम के नियमों में संशोधन करके यह दायरा बढ़ाया गया है। अब जिला प्रशासन और स्थानीय अधिकारी जरूरत पड़ने पर निजी स्कूलों, कॉलेजों और अन्य संस्थानों के योग्य कर्मचारियों की सेवाएं ले सकेंगे। देश के दूरदराज के इलाकों और बड़े महानगरों में जहां आबादी बहुत ज्यादा है, वहां कर्मचारियों की कमी एक बड़ी चुनौती रही है। निजी सेक्टर के शिक्षकों और कर्मचारियों को इस बड़े राष्ट्रीय काम से जोड़ने से जमीनी स्तर पर डेटा जुटाने की प्रक्रिया में बड़ी मदद मिलेगी। सरकार का मुख्य मकसद यह सुनिश्चित करना है कि हर एक नागरिक की गिनती सही समय पर पूरी हो सके।
निजी शिक्षकों को मिली बड़ी जिम्मेदारी
शिक्षा क्षेत्र से जुड़े लोगों और जानकारों का मानना है कि निजी संस्थानों के शिक्षकों को इस काम में लगाना एक व्यावहारिक कदम है। शिक्षक समाज का एक ऐसा वर्ग है जिस पर लोग आसानी से भरोसा करते हैं और उनके पास कागजी कार्रवाई का अच्छा अनुभव भी होता है। हालांकि, कई शिक्षक संगठनों ने इस बात पर चिंता भी जताई है कि शिक्षण कार्य के दौरान उन्हें अतिरिक्त काम सौंपने से पढ़ाई पर असर पड़ सकता है। इसके बावजूद प्रशासन का मानना है कि इस बार डिजिटल जनगणना के कारण काम पहले से काफी आसान और पारदर्शी होगा, जिससे किसी को भी बहुत ज्यादा परेशानी नहीं उठानी पड़ेगी।
देश के कई राज्यों में जिला प्रशासन ने इस नए नियम के तहत अपनी तैयारियां भी शुरू कर दी हैं। अधिकारियों की मानें तो आने वाले दिनों में इन सभी नए गणनाकारों को विशेष प्रशिक्षण दिया जाएगा। उन्हें सिखाया जाएगा कि कैसे मोबाइल ऐप या डिजिटल टैबलेट के जरिए घर-घर जाकर सही जानकारी दर्ज करनी है। इस पूरी प्रक्रिया में पारदर्शिता बनाए रखने के लिए सख्त दिशानिर्देश भी जारी किए गए हैं ताकि किसी भी स्तर पर आंकड़ों में कोई गड़बड़ी न हो सके।
प्रशासनिक और तकनीकी बदलाव की जरूरत
जनगणना जैसे विशाल राष्ट्रीय अभियान को पूरा करना हमेशा से एक बड़ी प्रशासनिक चुनौती रहा है। भारत जैसे विशाल देश में जहां आबादी लगातार बढ़ रही है, वहां पारंपरिक तरीकों के साथ आधुनिक तकनीकों का इस्तेमाल बेहद जरूरी हो गया है। नए नियमों में डिजिटल माध्यमों के इस्तेमाल को कानूनी रूप से मजबूत किया गया है ताकि लोग खुद भी अपनी जानकारी ऑनलाइन दर्ज करवा सकें। इस हाइब्रिड मॉडल से समय और लागत दोनों की बचत होगी और सटीक आंकड़े देश के नीति निर्माताओं तक पहुंच सकेंगे।
आम जनता के लिए भी यह समझना जरूरी है कि जनगणना देश के विकास की योजनाओं की नींव होती है। सही आंकड़ों के आधार पर ही सरकारें गरीबों के लिए योजनाएं बनाती हैं, बजट तय करती हैं और बुनियादी सुविधाओं का विस्तार करती हैं। निजी संस्थानों के लोगों के जुड़ने से अब इस काम में किसी तरह की देरी की गुंजाइश नहीं बचेगी। द फ्रीलान्स की टीम इस पूरी प्रक्रिया पर लगातार नजर बनाए हुए है और जैसे ही जिला स्तर पर कार्यशालाएं शुरू होंगी, हम आप तक जमीनी हकीकत पहुंचाते रहेंगे।
देशभर में प्रशासनिक तैयारियां और आगे की राह
आगामी जनगणना की तारीखों को लेकर सुगबुगाहट तेज हो गई है और सभी राज्यों को प्रशासनिक स्तर पर अपनी कमर कसने के निर्देश दे दिए गए हैं। डिजिटल पोर्टल और मोबाइल एप्लिकेशन के परीक्षण का काम लगभग अंतिम चरण में है ताकि किसी भी तकनीकी खामी से बचा जा सके। जमीनी स्तर पर काम करने वाले नए कर्मचारियों यानी प्राइवेट शिक्षकों और अन्य कर्मियों को जल्द ही उनके कार्यक्षेत्र और सेक्टर की जिम्मेदारी सौंप दी जाएगी। आने वाले हफ्तों में इस पूरी प्रक्रिया का आधिकारिक ब्लूप्रिंट जनता के सामने रखा जाएगा।





