नई दिल्ली/ग्राउंड ब्यूरो — देश भर में सरकारी कामकाज के तौर-तरीकों में पिछले कुछ वर्षों में बड़ा बदलाव आया है। केंद्र और राज्य स्तर पर शासन व्यवस्था को तकनीक से जोड़ने की रफ्तार काफी तेज हुई है। गांव-देहात से लेकर शहरों तक सरकारी दफ्तरों के चक्कर काटने की मजबूरी अब धीरे-धीरे कम हो रही है। डिजिटल पहचान, सीधे खाते में राहत राशि और मोबाइल पर मिलने वाली सुविधाओं ने आम नागरिक के रोजमर्रा के जीवन को सीधे तौर पर प्रभावित किया है। सरकारी रिपोर्टों के मुताबिक तकनीक के जरिए जनता और प्रशासन की दूरी पाटने की कोशिश की जा रही है।
दक्षिण भारत के राज्यों से लेकर उत्तर भारत के कस्बों तक लोग अब अपने अधिकारों को लेकर पहले से अधिक जागरूक नजर आ रहे हैं। पेंशन हो या किसान सम्मान निधि, पैसा अब सीधे बैंक खातों में पहुंच रहा है। इससे पहले योजनाओं का लाभ लेने के लिए लोगों को स्थानीय स्तर पर कई बिचौलियों से जूझना पड़ता था। कागजी औपचारिकताओं में हफ्तों और महीनों का वक्त बर्बाद होता था। अब मोबाइल पर एक संदेश आते ही बैंक खाते से रकम निकाली जा सकती है। इस पूरी व्यवस्था ने छोटे व्यापारियों और दिहाड़ी मजदूरों के भरोसे को मजबूत किया है।
यूपीआई और बैंक खातों से सीधे हाथों में पहुंचती मदद
भारत में वित्तीय लेन-देन का ढांचा पूरी तरह बदल चुका है। आज चाय की छोटी दुकान से लेकर बड़े किराना स्टोर तक केवल क्यूआर कोड स्कैन करके भुगतान हो रहा है। यूपीआई ने नकदी पर लोगों की निर्भरता बहुत कम कर दी है। इसके साथ ही जनधन खातों ने उन करोड़ों परिवारों को औपचारिक बैंकिंग से जोड़ा है, जो कभी बैंक के दरवाजे तक जाने से कतराते थे। गांव के बुजुर्ग और महिलाएं अब अपने बैंक खातों का खुद संचालन कर रहे हैं।
जमीनी पड़ताल में दिखता है कि डायरेक्ट बेनिफिट ट्रांसफर यानी सीधे खाते में पैसा भेजने की व्यवस्था ने भ्रष्टाचार पर गहरी चोट की है। पहले सरकारी सहायता का एक बड़ा हिस्सा रास्ते में ही गायब हो जाता था। अब केंद्र या राज्य स्तर से जारी हुआ पूरा पैसा सीधे लाभार्थी के खाते में पहुंचता है। इससे न केवल जनता का समय बचा है, बल्कि प्रशासन में पारदर्शिता भी आई है। हालांकि, सुदूर इलाकों में इंटरनेट नेटवर्क की कमजोरी कभी-कभी बुजुर्गों के लिए बायोमेट्रिक सत्यापन में अड़चन जरूर पैदा करती है।
चिप निर्माण और नई तकनीक पर बढ़ता सरकारी जोर
सरकार का ध्यान अब केवल पुरानी योजनाओं को चलाने तक सीमित नहीं है। भविष्य के उद्योगों को खड़ा करने के लिए सेमीकंडक्टर और कृत्रिम बुद्धिमत्ता यानी एआई पर बड़ा निवेश किया जा रहा है। देश में सेमीकंडक्टर चिप बनाने के कारखानों की स्थापना को मंजूरी दी गई है। इसका सीधा मकसद इलेक्ट्रॉनिक्स के क्षेत्र में भारत को आत्मनिर्भर बनाना है। मोबाइल फोन, कार और घरेलू उपकरणों में इस्तेमाल होने वाली चिप्स के लिए अब तक विदेशी बाजारों पर निर्भरता रही है।
नई तकनीकी पहलों से युवाओं के लिए उच्च स्तर के रोजगार पैदा होने की उम्मीद बंधी है। स्थानीय स्तर पर तकनीकी कौशल सिखाने के लिए नए प्रशिक्षण केंद्र खोले जा रहे हैं। जानकारों का मानना है कि यदि सेमीकंडक्टर मिशन योजना के मुताबिक आगे बढ़ा, तो भारत वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला का एक अहम केंद्र बन जाएगा। इससे देश के विनिर्माण उद्योग को बड़ा संबल मिलेगा और आयात पर खर्च होने वाली विदेशी मुद्रा की बचत होगी।
कॉलेजों और अदालतों के कामकाज को आसान बनाने के कदम
उच्च शिक्षा के क्षेत्र में भी बड़े नीतिगत बदलाव किए जा रहे हैं। नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति के तहत छात्रों को पढ़ाई के दौरान ज्यादा लचीलापन दिया जा रहा है। कॉलेज स्तर पर शोध और नए प्रयोगों को बढ़ावा देने के लिए अलग से बजट आवंटित हो रहा है। विदेशी विश्वविद्यालयों के साथ साझेदारी और ऑनलाइन पाठ्यक्रमों की मान्यता से ग्रामीण छात्रों को भी बेहतर शिक्षा के अवसर मिल रहे हैं। इसके साथ ही डिग्री और प्रमाणपत्रों को डिजिटल लॉकर में सुरक्षित रखने की सुविधा से फर्जीवाड़े पर रोक लगी है।
दूसरी तरफ अदालती मामलों में होने वाली भारी देरी को कम करने के लिए न्यायाधिकरण प्रणाली में सुधार किए जा रहे हैं। विशेष ट्रिब्यूनल के गठन और उनमें खाली पदों को तेजी से भरने की दिशा में काम चल रहा है। इसका मुख्य उद्देश्य वाणिज्यिक और सेवा से जुड़े विवादों को तय समय सीमा में सुलझाना है। नियमित अदालतों पर मुकदमों का भारी बोझ है, जिसे हल्का करने के लिए इन विशेष न्यायाधिकरणों को डिजिटल उपकरणों से लैस किया जा रहा है।
जमीनी हकीकत और आम नागरिकों की रोजमर्रा की मुश्किलें
तमाम तकनीकी तरक्की के बावजूद कुछ बुनियादी समस्याएं आज भी नागरिकों को परेशान करती हैं। कई तहसीलों और ब्लॉक स्तर के दफ्तरों में सर्वर डाउन रहने की शिकायतें अक्सर सामने आती हैं। जाति प्रमाण पत्र, आय प्रमाण पत्र या जमीन के कागजात दर्ज कराने में आम लोगों को अब भी पोर्टल पर तकनीकी खामियों का सामना करना पड़ता है। कई बार बुजुर्ग नागरिकों के अंगूठे के निशान राशन दुकानों पर मशीन से मेल नहीं खाते, जिससे उन्हें परेशानी झेलनी पड़ती है।
नागरिकों का कहना है कि जब तक जमीनी स्तर के सरकारी कर्मचारियों की जवाबदेही तय नहीं होगी, तब तक डिजिटल व्यवस्था का पूरा फायदा हर व्यक्ति तक नहीं पहुंचेगा। बड़े शहरों में सुविधाएं तुरंत मिल जाती हैं, लेकिन दूरदराज के क्षेत्रों में आज भी जागरूकता की भारी कमी है। साइबर धोखाधड़ी के बढ़ते मामलों ने भी कम पढ़े-लिखे लोगों में एक नया डर पैदा किया है। इसलिए प्रशासन को तकनीकी सुरक्षा और आम जनता के प्रशिक्षण पर अतिरिक्त ध्यान देने की सख्त जरूरत है।





