नई दिल्ली/ग्राउंड ब्यूरो — भारत के टेक जगत में इस समय एक बड़ी बहस छिड़ गई है। मशहूर टेक कंपनी जोहो के संस्थापक श्रीधर वेम्बु ने दुनिया के सबसे अमीर कारोबारी एलन मस्क को सीधा जवाब दिया है। सोशल मीडिया पर छिड़ी इस बहस का केंद्र भारत का इंटरनेट और टेलीकॉम बाजार है। मस्क भारत में अपनी सैटलाइट इंटरनेट सेवा स्टारलिंक शुरू करना चाहते हैं। दूसरी तरफ भारतीय उद्योगपति अपनी शर्तों और देश के नियमों पर काम करने की बात कर रहे हैं। इस विवाद में अब भारत के बड़े सॉफ्टवेयर कारोबारी भी खुलकर सामने आ गए हैं।
श्रीधर वेम्बु ने साफ शब्दों में कहा कि भारत में किसी भी विदेशी कंपनी की मनमानी नहीं चलेगी। उन्होंने कहा कि भारत एक खुला और प्रतिस्पर्धी बाजार है। यहां हर कंपनी को नियमों के तहत ही कारोबार करना होगा। इस मुद्दे पर कई अन्य भारतीय उद्यमियों ने भी वेम्बु का समर्थन किया है। उनका मानना है कि भारत की अपनी नीतियां पूरी तरह सही हैं। कोई भी बाहरी कंपनी अपने हिसाब से नियम बदलने का दबाव नहीं बना सकती है।
भारत में सस्ते इंटरनेट और डेटा की जमीनी हकीकत
श्रीधर वेम्बु ने सोशल मीडिया पर भारत के सस्ते इंटरनेट का उदाहरण दिया। उन्होंने लिखा कि भारत में मोबाइल डेटा इतना सस्ता है कि लोग घरों में ब्रॉडबैंड लगाना भी जरूरी नहीं समझते। आम लोग अपने फोन के डेटा से ही सारे काम आसानी से निपटा लेते हैं। दुनिया के बाकी देशों में इंटरनेट बहुत महंगा है। जबकि भारत के गांव-गांव तक बहुत कम कीमत में तेज 4जी और 5जी इंटरनेट पहुंच चुका है। यही वजह है कि भारत डिजिटल लेनदेन में आज दुनिया में सबसे आगे खड़ा है।
सैटलाइट इंटरनेट का खर्च आम आदमी की जेब के हिसाब से काफी ज्यादा बैठता है। स्टारलिंक की सेवाएं अमेरिका और यूरोप में भी बहुत महंगी मानी जाती हैं। भारत के आम उपभोक्ता के लिए इतना महंगा प्लान लेना आसान नहीं होगा। भारतीय टेलीकॉम कंपनियों ने देश के कोने-कोने में सस्ता नेटवर्क फैला रखा है। ऐसे में किसी विदेशी सेवा के लिए भारत का बाजार इतना सीधा नहीं है। वेम्बु ने इसी जमीनी हकीकत की तरफ ध्यान दिलाया है।
टेस्ला और स्टारलिंक को लेकर वेम्बु का दोहरे रवैये पर सवाल
वेम्बु ने अमेरिकी नीतियों के दोहरे रवैये पर भी खुलकर बात रखी। उन्होंने याद दिलाया कि अमेरिका भी अपनी कंपनियों को बचाने के लिए कड़े कदम उठाता है। जब चीनी इलेक्ट्रिक कारों की बात आती है तो अमेरिका भारी टैक्स लगा देता है। ऐसा इसलिए किया जाता है ताकि एलन मस्क की टेस्ला कंपनी को कोई नुकसान न हो। अमेरिका अपनी घरेलू कंपनियों को पूरा संरक्षण देता है। फिर वही लोग भारत द्वारा अपने नियम लागू करने पर सवाल कैसे उठा सकते हैं।
वेम्बु का कहना है कि हर देश को अपने घरेलू उद्योगों की रक्षा करने का पूरा हक है। भारत सरकार अगर स्थानीय कंपनियों के हितों का ध्यान रखती है तो इसमें कुछ गलत नहीं है। भारतीय कंपनियों ने देश में हजारों करोड़ रुपये का निवेश किया है। उन्होंने लाखों लोगों को नौकरियां दी हैं। ऐसे में नियमों का पालन सभी कंपनियों के लिए एक जैसा होना चाहिए। किसी एक विदेशी कंपनी को खास छूट देना सही नहीं होगा।
स्पेक्ट्रम आवंटन और कंपनियों की रस्साकशी का असल गणित
यह पूरा विवाद सैटलाइट इंटरनेट के स्पेक्ट्रम को लेकर शुरू हुआ है। भारतीय कंपनियां चाहती हैं कि सैटलाइट स्पेक्ट्रम की नीलामी हो। नीलामी होने से सभी कंपनियों को बराबरी का मौका मिलेगा। वहीं स्टारलिंक जैसी विदेशी कंपनियां बिना नीलामी के सीधा आवंटन चाहती हैं। मुकेश अंबानी की जियो और सुनील मित्तल की एयरटेल इस मामले पर एक राय रखती हैं। उनका कहना है कि जो नियम घरेलू कंपनियों पर लागू होते हैं, वही विदेशी कंपनियों पर भी लागू होने चाहिए।
द फ्रीलान्स की पड़ताल बताती है कि यह विवाद केवल दो कारोबारियों की बहस नहीं है। यह भारत के डिजिटल भविष्य और आत्मनिर्भरता से जुड़ा बड़ा सवाल है। भारत अब केवल एक बड़ा उपभोक्ता बाजार नहीं रहा। भारत अपनी खुद की मजबूत टेक नीतियां बनाने में सक्षम है। जोहो जैसी कंपनियों के प्रमुखों का यह रुख दिखाता है कि भारतीय टेक उद्योग अब आत्मविश्वास से भरा है। देश के नियमों से समझौता किए बिना ही विदेशी कंपनियों का स्वागत किया जाएगा।










