नई दिल्ली और कीव से ग्राउंड रिपोर्ट — रूस और यूक्रेन के बीच चल रही जंग अब बेहद खतरनाक मोड़ पर पहुंच गई है। पिछले कुछ घंटों में यूक्रेन ने रूस की तेल सुविधाओं और ब्लैक सी यानी काले सागर से गुजर रहे तेल टैंकरों पर जोरदार जवाबी ड्रोन हमले किए हैं। इन हमलों के बाद आसमान में काले धुएं के गुबार साफ देखे जा सकते हैं। यूक्रेन का यह कदम साफ दिखाता है कि वह रूसी अर्थव्यवस्था को सीधे तौर पर चोट पहुंचाना चाहता है ताकि मॉस्को पर दबाव बनाया जा सके।
दूसरी तरफ, रूस ने भी यूक्रेन के खिलाफ अपने हमले और तेज कर दिए हैं। रूसी सेना ने यूक्रेन की राजधानी कीव के पास एक अहम मिसाइल उत्पादन संयंत्र और लाखों गाड़ियों के आने-जाने वाले दो बड़े पुलों को निशाना बनाया है। इन लगातार हो रहे हवाई और ड्रोन हमलों से दोनों तरफ हताहतों की संख्या में तेजी से इजाफा हुआ है। आम लोग बंकरों में रहने को मजबूर हैं और कीव तथा अन्य शहरों में हर तरफ तबाही के निशान साफ नजर आ रहे हैं।
तीस देशों के प्रतिनिधि कीव पहुंचे
इस खूनी संघर्ष के बीच अंतरराष्ट्रीय कूटनीति भी पूरी तरह से सक्रिय हो गई है। हाल ही में बयालीस नाटो देशों के प्रतिनिधि अचानक कीव पहुंचे और यूक्रेनी नेतृत्व के साथ उच्च स्तर की बैठकें कीं। इन बैठकों का मुख्य उद्देश्य यूक्रेन को और अधिक सैन्य व आर्थिक मदद पहुंचाना है ताकि वह रूसी हमलों का डटकर सामना कर सके। हालांकि, पश्चिमी देशों की इस सक्रियता से युद्ध के थमने के बजाय इसके और अधिक फैलने का खतरा पैदा हो गया है, जिससे यूरोपीय देशों की चिंताएं काफी बढ़ गई हैं।
युद्ध के इस माहौल के बीच भारत ने एक बड़ी कूटनीतिक पहल की है। भारत ने रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन और यूक्रेन के राष्ट्रपति वोलोडिमिर जेलेंस्की को एक तीन सूत्रीय शांति प्लान भेजा है। इस भारतीय प्लान में बातचीत के जरिए मसले को सुलझाने, मानवीय सहायता बढ़ाने और संघर्ष को रोकने के ठोस उपाय सुझाए गए हैं। दुनिया भर के जानकारों का मानना है कि भारत की तटस्थ और मजबूत छवि के कारण यह शांति प्लान दोनों पक्षों को बातचीत की मेज पर लाने में अहम भूमिका निभा सकता है।
तेल टैंकरों पर हमलों से बढ़ी वैश्विक चिंता
काले सागर में रूसी तेल टैंकर पर हुए ड्रोन हमले ने वैश्विक ऊर्जा बाजार में हलचल मचा दी है। इस हमले के बाद कच्चे तेल की आपूर्ति बाधित होने का खतरा पैदा हो गया है, जिसका असर भारत समेत पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था पर पड़ सकता है। तेल टैंकर में लगी भीषण आग को बुझाने के लिए स्थानीय प्रशासन को भारी मशक्कत करनी पड़ी। युद्ध के मैदान में इस तरह की आर्थिक और रणनीतिक कार्रवाइयों ने हालात को और ज्यादा पेचीदा बना दिया है।
जमीनी हकीकत यह है कि दोनों देश पीछे हटने को तैयार नहीं हैं और हर दिन हमलों का दायरा बढ़ता जा रहा है। आम जनता इस युद्ध की सबसे बड़ी कीमत चुका रही है, जिनके घर और बुनियादी ढांचे पूरी तरह तबाह हो चुके हैं। नाटो देशों के प्रतिनिधियों की मौजूदगी और रूस के ताबड़तोड़ हमलों के बीच अब सबकी निगाहें भारत के इस नए शांति प्रस्ताव पर टिकी हैं कि क्या यह प्लान इस विनाशकारी युद्ध को रोक पाएगा या नहीं।
शांति की उम्मीद और आगे की राह
द फ्रीलान्स की ग्राउंड पड़ताल के मुताबिक, इस युद्ध का कोई सैन्य समाधान नजर नहीं आ रहा है और अंततः सभी पक्षों को कूटनीति का ही सहारा लेना होगा। भारत द्वारा भेजा गया तीन सूत्रीय प्लान फिलहाल एकमात्र ऐसा विकल्प दिख रहा है जो दोनों देशों को स्वीकार्य हो सकता है। अंतरराष्ट्रीय समुदाय भी अब भारत के इस रुख का समर्थन कर रहा है ताकि दुनिया को एक और बड़े आर्थिक संकट और मानवीय त्रासदी से बचाया जा सके। आने वाले कुछ दिन यह तय करेंगे कि कूटनीति बंदूक की गोलियों पर भारी पड़ती है या युद्ध का यह दौर और लंबा खिंचेगा।



