भारतीय महानगरों और टियर-1 व टियर-2 शहरों में क्विक कॉमर्स (Blinkit, Zepto, Swiggy Instamart) ने खरीदारी के पारंपरिक तौर-तरीकों को पूरी तरह बदलकर रख दिया है। महज 10 से 15 मिनट में दूध, ब्रेड, स्नैक्स और फल-सब्जियां दरवाजे पर पहुंचा देने की यह सहूलियत जितनी आकर्षक लगती है, उतनी ही खामोशी से यह आम उपभोक्ता की जेब पर अतिरिक्त आर्थिक बोझ भी डाल रही है। हाल के महीनों में उपभोक्ताओं के बीच एक नई चर्चा छिड़ गई है—सामान के दाम तो जस-के-तस दिख रहे हैं, लेकिन पैकेट खोलते ही सामान पहले से कम नजर आता है। अर्थशास्त्र और उपभोक्ता अधिकार कानून की भाषा में इसे 'श्रिंकफ्लेशन' (Shrinkflation) कहा जाता है। 'द फ्रीलांस' की इस विस्तृत खोजी पड़ताल में हमने क्विक कॉमर्स ऐप्स पर बिकने वाले 50 से अधिक प्रमुख एफएमसीजी (FMCG) उत्पादों के पैकेट साइज, वजन और यूनिट कीमतों का बारीकी से विश्लेषण किया है।
क्विक कॉमर्स और एफएमसीजी ब्रांड्स की खामोश रणनीति: क्या है 'श्रिंकफ्लेशन'?
'श्रिंकफ्लेशन' दो शब्दों—श्रिंक (Shrink यानी सिकुड़ना या घटना) और इन्फ्लेशन (Inflation यानी महंगाई) से मिलकर बना है। जब विनिर्माण लागत, पाम ऑयल के दाम, पैकेजिंग प्लास्टिक और लॉजिस्टिक्स खर्च में वृद्धि होती है, तो कंपनियों के सामने दो रास्ते होते हैं। पहला रास्ता यह है कि वे उत्पाद का एमआरपी (MRP) ₹20 से बढ़ाकर ₹25 कर दें। लेकिन भारतीय उपभोक्ता कीमतों को लेकर बेहद संवेदनशील है, और दाम बढ़ते ही वह किसी सस्ते विकल्प की तरफ रुख कर सकता है। इसलिए कंपनियां दूसरा रास्ता चुनती हैं—दाम ₹20 ही रखा जाता है, लेकिन पैकेट के अंदर सामग्री का शुद्ध वजन (Net Weight) 85 ग्राम से घटाकर 68 ग्राम कर दिया जाता है। ग्राहक को लगता है कि उसने पुराने दाम पर ही सामान खरीदा, जबकि वास्तविकता में उसने प्रति ग्राम 20% से 25% अधिक कीमत चुकाई है।
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'द फ्रीलांस' की पड़ताल: किन लोकप्रिय प्रोडक्ट्स में हुई वजन की सबसे बड़ी कटौती?
'द फ्रीलांस' इन्वेस्टिगेटिव डेस्क ने दिल्ली-एनसीआर, लखनऊ, मुंबई और बेंगलुरु के डार्क स्टोर्स से ऑर्डर किए गए दैनिक उपयोग के सामानों की तुलना पिछले 18 महीनों के पुराने पैकेट्स से की। आंकड़ों से जो तस्वीर सामने आई, वह चौंकाने वाली है:
- आलू के चिप्स व नमकीन (Chips & Snacks): एक प्रमुख मल्टीनेशनल स्नैक्स ब्रांड के ₹20 वाले लोकप्रिय चिप्स पैकेट में डेढ़ साल पहले 85 से 90 ग्राम चिप्स आते थे। आज उसी ₹20 के पैकेट में केवल 65 से 70 ग्राम सामग्री मिल रही है। यानी पैकेट का साइज बाहर से बड़ा दिखता है, लेकिन अंदर हवा (नाइट्रोजन) की मात्रा 50% से अधिक हो गई है।
- बिस्कुट व कुकीज (Biscuits & Bakery): ₹10 वाले लोकप्रिय ग्लूकोज और मिल्क बिस्कुट पैकेट में बिस्कुटों की गिनती 13-14 से घटकर 9-10 रह गई है। क्रीम बिस्कुट में पैकेट का कुल वजन 120 ग्राम से घटाकर 95 ग्राम कर दिया गया है।
- डिटर्जेंट, साबुन और डिशवॉश बार: पहले 100 ग्राम की मानक साबुन टिकिया का चलन था, जो अब घटकर 80 से 85 ग्राम रह गई है। ₹10 वाले डिशवॉश बार का वजन 125 ग्राम से घटकर 90 ग्राम पर सिमट गया है।
- खाद्य तेल और देसी घी पाउच: पैकेजिंग में सबसे बड़ा भ्रम तेल और घी में देखने को मिलता है। उपभोक्ता सामान्यतः '1 लीटर' मानकर पाउच खरीदता है, जबकि कई ब्रांड्स ने पाउच पर '1 लीटर' (आयतन) की जगह '900 मिलीलीटर' या '850 ग्राम' लिखना शुरू कर दिया है। नतीजतन, सीधे तौर पर 10% से 15% माल कम मिल रहा है।
डार्क स्टोर्स का एल्गोरिद्म: छोटे एसकेयू को प्राथमिकता क्यों?
क्विक कॉमर्स प्लेटफॉर्म्स (डार्क स्टोर्स) का बिजनेस मॉडल इन्वेंट्री टर्नओवर और स्पेस ऑप्टिमाइजेशन पर टिका होता है। 10 मिनट में डिलीवरी करने के लिए राइडर के बैग में सामान का वजन और आकार नियंत्रित रखना आवश्यक होता है। इसी वजह से क्विक कॉमर्स प्लेटफॉर्म्स बड़े 5 किलोग्राम या 10 किलोग्राम के राशन पैक्स के मुकाबले ₹10, ₹20, ₹50 और ₹100 वाले छोटे 'कॉम्पैक्ट एसकेयू' को अपने ऐप के होमपेज पर एल्गोरिद्म के जरिए सबसे ऊपर दिखाते हैं। उपभोक्ता को लगता है कि ₹40-₹50 में उसका काम चल रहा है, लेकिन यदि उसी सामान की प्रति किलोग्राम लागत की गणना की जाए, तो वह थोक या पारंपरिक किराना दुकान से 30% से 40% तक महंगी साबित होती है।
"श्रिंकफ्लेशन सीधे तौर पर उपभोक्ता के साथ एक मनोवैज्ञानिक छलावा है। जब ग्राहक ₹20 का नोट देता है, तो उसे लगता है कि उसने पहले जितना ही सामान खरीदा है, जबकि हकीकत में उसकी थाली या रसोई से 20% सामग्री कम हो चुकी है। सरकार को ई-कॉमर्स पोर्टल्स पर यूनिट सेल प्राइस का फॉन्ट साइज अनिवार्य रूप से बड़ा करना चाहिए ताकि ग्राहक भ्रमित न हो।" — डॉ. अरविंद कुमार, वरिष्ठ आर्थिक विश्लेषक व पूर्व सदस्य, कंज्यूमर एडवाइजरी काउंसिल
कंज्यूमर प्रोटेक्शन एक्ट 2019 और लीगल मेट्रोलॉजी रूल्स: क्या कहता है कानून?
उपभोक्ता मामलों के मंत्रालय (Ministry of Consumer Affairs) ने लीगल मेट्रोलॉजी (पैकेज्ड कमोडिटीज) रूल्स, 2011 में संशोधन करते हुए ई-कॉमर्स प्लेटफॉर्म्स के लिए स्पष्ट नियम तय किए हैं। कानून के अनुसार:
- प्रत्येक ई-कॉमर्स और क्विक कॉमर्स ऐप पर उत्पाद की कुल कीमत के साथ-साथ 'यूनिट सेल प्राइस' (USP - प्रति ग्राम ₹/g या प्रति मिलीलीटर ₹/ml) का उल्लेख करना कानूनी रूप से अनिवार्य है।
- कंज्यूमर प्रोटेक्शन एक्ट 2019 की धारा 2(47) के तहत यदि कोई कंपनी भ्रामक पैकेजिंग (Slack Fill यानी जरूरत से बड़ा डिब्बा या पैकेट बनाकर अंदर कम माल भरना) का सहारा लेती है, तो इसे 'अनुचित व्यापार व्यवहार' (Unfair Trade Practice) माना जा सकता है।
- हालांकि, कई क्विक कॉमर्स ऐप्स पर यूनिट सेल प्राइस का फॉन्ट आकार इतना सूक्ष्म (Tiny Text) रखा जाता है कि साधारण मोबाइल स्क्रीन पर जब तक ग्राहक विशेष रूप से जूम न करे, उसे यह दिखाई ही नहीं देता।
स्मार्ट उपभोक्ता गाइड: क्विक कॉमर्स पर खरीदारी करते समय कैसे बचाएं अपनी गाढ़ी कमाई?
इस खामोश महंगाई और श्रिंकफ्लेशन के दौर में जागरूक उपभोक्ता बनकर ही अपनी बचत की रक्षा की जा सकती है। 'द फ्रीलांस' के पाठकों के लिए वित्तीय विशेषज्ञों के कुछ महत्वपूर्ण सुझाव:
- यूनिट सेल प्राइस (₹/gm या ₹/ml) की तुलना करें: ऐप पर किसी भी सामान को कार्ट में डालने से पहले नीचे लिखी प्रति ग्राम या प्रति मिलीलीटर दर अवश्य जांचें। अक्सर ₹40 वाले दो पैकेट्स की कुल कीमत ₹80 वाले एक बड़े पैकेट से 25% अधिक बैठती है।
- महीने का राशन लोकल किराना या सुपरमार्केट से लें: रोजमर्रा के छोटे-मोटे सामान के लिए क्विक कॉमर्स ठीक है, लेकिन महीने की दाल, चावल, आटा, मसाले और तेल स्थानीय किराना स्टोर या होलसेल मंडी से ही खरीदें। 4 सदस्यों वाला परिवार इससे हर महीने ₹2,500 से ₹4,500 तक की सीधी बचत कर सकता है।
- ग्राम/एमएल पर नजर रखें, केवल दाम पर नहीं: जब भी आपका पसंदीदा स्नैक्स, साबुन या बिस्कुट खरीदें, तो पिछले पैकेट के वजन से नए पैकेट के वजन का मिलान जरूर करें।
- कंज्यूमर हेल्पलाइन पर दर्ज कराएं शिकायत: यदि किसी पैकेट पर शुद्ध वजन नहीं लिखा है या ऐप पर वजन की गलत जानकारी दी गई है, तो राष्ट्रीय उपभोक्ता हेल्पलाइन (National Consumer Helpline - 1915) पर अपनी शिकायत दर्ज कराएं।


