उत्तराखंड की वादियों को दहला देने वाला वह खौफनाक मंजर
साल 2022 का सितंबर महीना उत्तराखंड के इतिहास में एक ऐसा काला अध्याय लेकर आया, जिसने हर संवेदनशील इंसान की रूह को झकझोर कर रख दिया था। पौड़ी गढ़वाल जिले के गंगा भोगपुर क्षेत्र में स्थित वनंतरा रिसॉर्ट की रिसेप्शनिस्ट अंकिता भंडारी की चीखें आज भी न्याय की गुहार लगाती प्रतीत होती हैं। मात्र उन्नीस साल की उम्र में इस युवती ने अपनी जान गंवा दी, क्योंकि उसने रिसॉर्ट में आने वाले एक रसूखदार मेहमान यानी तथाकथित 'VIP' को विशेष सेवाएं देने से साफ इनकार कर दिया था। इस घटना के सामने आने के बाद पूरे राज्य में भारी आक्रोश फैल गया था, और आम जनता सड़कों पर उतरकर न्याय की मांग करने लगी थी।
वरिष्ठ खोजी पत्रकारों और स्थानीय रिपोर्टों के अनुसार, अंकिता अपनी आजीविका चलाने के लिए उस रिसॉर्ट में काम कर रही थी। उसके परिवार की आर्थिक स्थिति बेहद साधारण थी और वह अपने घर कासहारा बनना चाहती थी। लेकिन उसे क्या पता था कि जिस जगह वह अपने सपनों को पंख देने की उम्मीद कर रही है, वही उसकी जिंदगी का आखिरी पड़ाव साबित होगी। घटना के शुरुआती दिनों में पुलिस प्रशासन की भूमिका पर भी सवाल उठे थे, क्योंकि शुरुआती दौर में अंकिता के गायब होने की सामान्य गुमशुदगी दर्ज की गई थी, लेकिन जब सोशल मीडिया और जनता का दबाव बढ़ा, तब जाकर प्रशासन हरकत में आया और इस भयानक अपराध की परतें खुलनी शुरू हुईं।
मुख्य आरोपी पुलकित आर्य और रिसॉर्ट का काला सच
पुलिस जांच में यह बात सामने आई कि रिसॉर्ट का मालिक पुलकित आर्य इस पूरे घटनाक्रम का मुख्य साजिशकर्ता था। पुलकित आर्य उस समय सत्ताधारी दल से जुड़े एक बड़े नेता का बेटा था, जिसके कारण शुरुआती स्तर पर मामलों को दबाने की कोशिशों के आरोप भी लगे। पुलकित के साथ उसके दो अन्य कर्मचारियों सौरभ भास्कर और अंकित गुप्ता को भी इस मामले में सह-आरोपी बनाया गया। इन तीनों पर आरोप था कि उन्होंने अंकिता को चीला नहर में धक्का देकर मौत के घाट उतार दिया था, क्योंकि अंकिता रिसॉर्ट की अवैध गतिविधियों और उस 'VIP' मेहमान की डिमांड के बारे में बाहरी दुनिया को बताने की धमकी दे रही थी।
गिरफ्तारी के बाद आरोपियों को जेल भेज दिया गया और एसआईटी (SIT) का गठन करके इस मामले की गहराई से जांच शुरू की गई। अदालत में चार्जशीट दाखिल होने के बाद कानूनी प्रक्रिया चल रही है, लेकिन पीड़ित परिवार और राज्य के नागरिकों का एक बड़ा वर्ग इस बात से बेहद आहत और निराश है कि उस तथाकथित 'VIP' का नाम अब तक सार्वजनिक क्यों नहीं किया गया। परिवार का बार-बार यह कहना रहा है कि मुख्य आरोपियों ने तो केवल मोहरे का काम किया है, असली गुनाहगार तो वह शख्स है जिसके लिए अंकिता पर दबाव बनाया जा रहा था।
न्याय की लंबी लड़ाई और परिवार का अटूट संघर्ष
अंकिता के माता-पिता ने अपनी बेटी को इंसाफ दिलाने के लिए हरसंभव संघर्ष किया है। उनकी आंखों के आंसू आज भी थमे नहीं हैं। एक तरफ जहां कोर्ट में कानूनी लड़ाइयां चल रही हैं, वहीं दूसरी तरफ सामाजिक संगठनों और विपक्षी दलों द्वारा लगातार यह सवाल उठाया जा रहा है कि आखिर पुलिस उस 'VIP' तक पहुंचने में क्यों नाकाम रही या फिर उस नाम को जानबूझकर छिपाया जा रहा है। मामले की गंभीरता को देखते हुए कई बार उच्च स्तरीय जांच की मांग भी की गई, ताकि यह साफ हो सके कि उस रात रिसॉर्ट में कौन आने वाला था और किस रसूख के बल पर एक निर्दोष बेटी की जिंदगी छीन ली गई।
"हमारी बेटी अब इस दुनिया में वापस नहीं आ सकती, लेकिन हम आखिरी सांस तक उस दरिंदे और उस 'VIP' को बेनकाब करने के लिए लड़ेंगे जिसने हमारी बच्ची की बलि चढ़ाई। हमें केवल कानूनी प्रक्रिया पर नहीं, बल्कि भगवान के न्याय पर भी पूरा भरोसा है।" — बीर सिंह भंडारी, अंकिता के पिता
राजनीतिक भूचाल और सिस्टम की कार्यप्रणाली पर सवाल
इस हत्याकांड ने देवभूमि उत्तराखंड की शांत फिजाओं में ऐसा राजनीतिक भूचाल ला दिया था कि सरकार को भी बैकफुट पर आना पड़ा था। विपक्षी दलों ने आरोप लगाया कि आरोपियों के राजनीतिक रसूख के कारण जांच की दिशा को भटकाने का प्रयास किया गया। हालांकि, सरकार ने तुरंत कार्रवाई करते हुए आरोपी के रिसॉर्ट के अवैध हिस्से पर बुलडोजर चलवा दिया था और एसआईटी गठन के आदेश दिए थे, लेकिन जनता के मन में आज भी यह संशय बना हुआ है कि क्या कानून के हाथ वाकई उस ताकतवर शख्स तक पहुंच पाएंगे?
खोजी पत्रकारिता के नजरिए से देखें तो इस मामले में कई कड़ियां आज भी गायब हैं। रिसॉर्ट के रजिस्टर, वहां आने-जाने वाले लोगों के कॉल डिटेल्स और कर्मचारियों के बयान बहुत कुछ बयां करते हैं, लेकिन आधिकारिक बयानों में उस मुख्य कड़ी का जिक्र न होना कई गंभीर संकेत देता है। समाजशास्त्री मानते हैं कि इस तरह की घटनाएं महिलाओं की सुरक्षा और प्रशासनिक पारदर्शिता पर एक बहुत बड़ा प्रश्नचिह्न लगाती हैं, जब तक हर दोषी को सख्त सजा नहीं मिलती, तब तक जनता का विश्वास पूरी तरह बहाल होना मुश्किल है।
सुरक्षा, कानून और जनचेतना का भविष्य
अंकिता भंडारी हत्याकांड केवल एक हत्या का मामला नहीं है, बल्कि यह कामकाजी महिलाओं की सुरक्षा, सत्ता और धन के अहंकार के खिलाफ एक बहुत बड़ी चेतावनी है। देश के विभिन्न हिस्सों से जब भी ऐसी घटनाएं सामने आती हैं, तो यह सोचना लाजिमी हो जाता है कि क्या हमारे समाज में पैसे और रुतबे वाले लोग कानून से ऊपर हैं? आज भी उत्तराखंड के युवा और महिला संगठन हर महीने की निश्चित तारीख को अंकिता को याद करते हैं और मोमबत्ती मार्च निकालकर इंसाफ की मांग दोहराते हैं।
यह मामला इस बात का भी गवाह है कि अगर जनता और मीडिया एक साथ मिलकर आवाज उठाएं, तो बड़े से बड़े अपराधियों को भी जेल की सलाखों के पीछे पहुंचना पड़ता है। भले ही मुख्य आरोपी जेल में बंद हैं और निचली अदालतों में सुनवाई जारी है, लेकिन जब तक उस 'VIP' का चेहरा बेनकाब नहीं होता, तब तक अंकिता की आत्मा को सच्ची शांति मिलने की बात अधूरा सच ही मानी जाएगी। 'द फ्रीलांस' इस पूरे मामले की हर अपडेट पर अपनी पैनी नजर बनाए रखेगा और जब तक पीड़ित परिवार को पूर्ण न्याय नहीं मिल जाता, तब तक इस संघर्ष की कहानी को देश के सामने प्रमुखता से रखता रहेगा।







