ओटीटी प्लेटफॉर्म प्राइम वीडियो पर हाल ही में रिलीज हुई क्राइम थ्रिलर फिल्म 'बबीता सिंह रिपोर्टिंग' इन दिनों दर्शकों के बीच चर्चा का विषय बनी हुई है। दो घंटे और ग्यारह मिनट की यह फिल्म सिर्फ एक सामान्य मर्डर मिस्ट्री नहीं है, बल्कि यह हमारे समाज की उस गहरी जड़ें जमा चुकी पितृसत्तात्मक सोच पर भी करारा प्रहार करती है, जो अक्सर आम परिवारों के भीतर छिपी रहती है। फिल्म की कहानी बहुत ही सधे हुए तरीके से एक ऐसी महिला के संघर्ष को दिखाती है, जो पेशेवर मोर्चे पर उपेक्षा का शिकार होने के बावजूद अपने दम पर सच की तलाश करती है।
भोपाल पुलिस थाने से शुरू होती है बबीता की कहानी
फिल्म की मुख्य किरदार बबीता सिंह भोपाल में एक असिस्टेंट सब-इंस्पेक्टर के रूप में तैनात है। उसे यह नौकरी अपने पिता के निधन के बाद अनुकंपा नियुक्ति के तहत मिली है। पुलिस विभाग में इस तरह की नियुक्तियों को अक्सर लोग हल्के में लेते हैं, और यही कारण है कि थाने का कोई भी अधिकारी या कर्मचारी बबीता को गंभीरता से नहीं लेता है। उसे थाने के भीतर केवल छोटे-मोटे कागजी काम या मामूली कामकाज ही सौंपे जाते हैं।
बबीता की स्थिति ऐसी है कि वह अपने सीनियर्स की हर बात पर सिर्फ हां में हां मिलाने के लिए मजबूर है। वह लंबे समय से फील्ड ड्यूटी पर जाने की इच्छा रखती है, ताकि वह असली पुलिसिंग का अनुभव ले सके। हालांकि, उसकी यह इच्छा पूरी होने ही वाली होती है, उससे पहले ही कुछ ऐसा घटित होता है कि उसे सस्पेंड कर दिया जाता है। दिलचस्प बात यह है कि बबीता को अपना यह सस्पेंशन बुरा नहीं लगता, क्योंकि इसके बहाने उसे अपने ससुराल जाने के लिए जरूरी छुट्टियां मिल जाती हैं, जो उसे वैसे नहीं मिल पा रही थीं।
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रीवा में दोस्त की मौत और एक नया मोड़
सस्पेंड होने के बाद बबीता अपने पति शरद के साथ रीवा स्थित अपने ससुराल के लिए रवाना हो जाती है। रीवा पहुंचते ही उसकी मुलाकात उसके एक पुराने स्कूल के दोस्त बंसी से होती है। सालों बाद अपनी पुरानी दोस्त को देखकर बंसी बहुत खुश होता है और वे दोनों जल्द ही दोबारा मिलने का वादा करते हैं। लेकिन नियति को कुछ और ही मंजूर होता है। बबीता उस दोस्त से दोबारा मिल पाती, उससे पहले ही एक दुखद घटना में बंसी की संदिग्ध परिस्थितियों में मौत हो जाती है।
यहीं से फिल्म की असली कहानी और मर्डर मिस्ट्री की शुरुआत होती है। बबीता अपने दोस्त की इस अचानक और रहस्यमयी मौत का सच सामने लाने का दृढ़ फैसला करती है। इस केस की तह तक जाने के दौरान बबीता के सामने बंसी के जीवन के कई ऐसे पहलू उजागर होते हैं, जो मामले को और अधिक उलझा देते हैं। एक तरफ जहां वह अपने दोस्त के लिए न्याय पाने की लड़ाई लड़ रही है, वहीं दूसरी तरफ उसके अपने घर के भीतर भी मोर्चे खुले हुए हैं।
पारिवारिक जीवन और पितृसत्ता की कड़वी सच्चाई
फिल्म का सबसे मजबूत पक्ष यह है कि यह बहुत ही सहजता से दिखाती है कि कैसे हमारे समाज में महिलाओं को दबाकर रखने की कोशिश की जाती है। एक तरफ बबीता बाहर एक उलझे हुए केस को सुलझाने के लिए तमाम मुश्किलों का सामना कर रही है, तो दूसरी तरफ उसके ससुराल वाले और उसका पति शरद लगातार उसके लिए नई-नई चुनौतियां और मानसिक दबाव खड़े कर रहे हैं। समाज में यह मान लिया गया है कि घर की बहू तभी अच्छी है जब वह चुपचाप सबकी बात माने और अपना मुंह बंद रखे।
फिल्म में कई ऐसे छोटे-छोटे लेकिन गहरे दृश्य हैं जो रोजमर्रा के जीवन में महिलाओं के साथ होने वाले मानसिक शोषण को उजागर करते हैं। एक खास दृश्य में शरद परिवार के सभी सदस्यों और मेहमानों के सामने बबीता को बुरी तरह खरी-खोटी सुनाता है। बाद में जब दोनों अकेले होते हैं, तो शरद को इस बात का बिल्कुल मलाल नहीं होता कि उसने अपनी पत्नी का सबके सामने अपमान किया। इसके बजाय उसे इस बात की चिंता होती है कि लोग अब उसके बारे में क्या सोचेंगे और वह खुद को विक्टिम साबित करने की कोशिश करने लगता है।
"फिल्म की खूबी यह है कि यह भारी-भरकम और फिल्मी डायलॉग्स का सहारा लिए बिना, सिर्फ अपने किरदारों के हाव-भाव और उनकी चुप्पी के जरिए बहुत कुछ कह जाती है। बबीता का किरदार आज की उस हर महिला का प्रतिनिधित्व करता है जो अब और अत्याचार सहने को तैयार नहीं है।" — फिल्म समीक्षक
निमिषा सजयन का शानदार अभिनय और किरदार का विकास
इस फिल्म में बबीता सिंह का किरदार राष्ट्रीय पुरस्कार विजेता अभिनेत्री निमिषा सजयन ने निभाया है। निमिषा ने अपने अभिनय के जरिए किरदार की हर बारीकी और उसकी भावनाओं को बेहद खूबसूरती से पर्दे पर उतारा है। भोपाल के थाने में किसी के द्वारा गंभीर नहीं मानी जाने वाली बबीता से लेकर रीवा में अकेले अपने दम पर एक मर्डर मिस्ट्री को सुलझाने वाली एक सशक्त महिला तक का यह सफर बहुत प्रेरणादायक है।
केस की जांच करते-करते बबीता को यह अहसास भी होने लगता है कि उसका पति और उसका परिवार उसे इंसान के रूप में कितनी कम अहमियत देते हैं। फिल्म के निर्देशक ने बबीता के किरदार में एक बेहतरीन ग्रोथ दिखाई है। वह अपने साथ हो रहे गलत व्यवहार का विरोध करने के लिए चिल्लाती नहीं है, बल्कि अपने आत्मविश्वास और फैसलों से यह जता देती है कि अब वह पुराने वाली बबीता नहीं रही जो हर जुल्म चुपचाप सह लेगी।
मर्डर मिस्ट्री के तौर पर कमजोर लेकिन देखने लायक फिल्म
यदि आप इस फिल्म से एक बहुत ही तेज-तर्रार, जटिल और हार्डकोर मर्डर मिस्ट्री की उम्मीद कर रहे हैं, तो मुमकिन है कि आपको थोड़ी निराशा हो। फिल्म का थ्रिलर या इन्वेस्टिगेशन वाला प्लॉट थोड़ा कमजोर और ढीला नजर आता है। लेकिन अगर आप इसे एक सामाजिक ड्रामे और एक महिला की आत्मकथात्मक जीत के रूप में देखेंगे, तो यह फिल्म आपको पूरी तरह बांधे रखेगी। इसका स्क्रीनप्ले और सभी कलाकारों का अभिनय बहुत ही नेचुरल है।
यह फिल्म 28 अगस्त से प्राइम वीडियो पर स्ट्रीमिंग के लिए उपलब्ध है। इसका निर्देशन अंबिका पंडत ने किया है और इसकी पटकथा अमिता व्यास ने तैयार की है। फिल्म में निमिषा सजयन के अलावा बरुण सोबती (बंसी), अंशुमान पुष्कर (शरद), राजेश कुमार और सुनीता राजवर जैसे बेहतरीन कलाकारों ने अपनी भूमिकाओं से जान फूंक दी है। कुल मिलाकर, यह फिल्म एक बार जरूर देखी जानी चाहिए क्योंकि यह मनोरंजन के साथ-साथ सोचने पर भी मजबूर करती है।






