जम्मू-कश्मीर के कठुआ जिले से एक ऐसी खबर सामने आई है जिसने देश के सुरक्षा ढांचे को झकझोर कर रख दिया है। एक केंद्रीय औद्योगिक सुरक्षा बल (CISF) कैंप के भीतर अचानक चली गोलियों की गड़गड़ाहट ने चार जिंदगियों को लील लिया। इस खूनी संघर्ष में एक असिस्टेंट कमांडेंट समेत चार जवानों की मौत हो गई। 'द फ्रीलान्स' के ऑन-द-ग्राउंड रिपोर्टर के तौर पर जब हमने इस घटना के तह में जाने की कोशिश की, तो जो परतें खुलीं, वे सिर्फ एक तात्कालिक विवाद की नहीं, बल्कि सुरक्षा बलों के भीतर लंबे समय से सुलग रहे मानसिक तनाव और असंतोष की दास्तान बयां करती हैं।
कठुआ कैंप में क्या हुआ था उस रोज?
प्राथमिक जांच और स्थानीय सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार, ड्यूटी के दौरान अचानक उपजे किसी आपसी विवाद ने इतना भयानक रूप ले लिया कि एक जवान ने अपनी ही सर्विस राइफल से अपने साथियों पर गोलियां बरसा दीं। यह घटना इतनी तेजी से घटी कि किसी को संभलने का मौका तक नहीं मिला। हालांकि उच्चाधिकारियों ने तुरंत मौके पर पहुंचकर स्थिति को नियंत्रित किया और कोर्ट ऑफ इंक्वायरी के आदेश दे दिए गए हैं, लेकिन यह सवाल अपनी जगह कायम है कि आखिर देश की रक्षा करने वाले प्रशिक्षित जवान किस मानसिक दबाव से गुजर रहे हैं कि वे अपने ही साथियों के खून के प्यासे हो जाते हैं।
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सुरक्षा बलों में बढ़ता आंतरिक तनाव और 'फ्रैटरीसाइड' के मामले
बीते कुछ वर्षों के आंकड़ों पर नजर डालें तो पाएंगे कि यह कोई पहली घटना नहीं है। देश के विभिन्न सुरक्षा बलों—चाहे वह CISF हो, CRPF हो या सेना—में आपसी झगड़ों और फ्रैटरीसाइड (सहकर्मियों पर गोलीबारी) के मामलों में खतरनाक बढ़ोतरी दर्ज की गई है। पिछले 5 सालों में इस तरह के तनावपूर्ण संघर्षों में दर्जनों जवानों ने अपनी जान गंवाई है। लंबे ड्यूटी आवर्स, छुट्टियों का न मिलना, पारिवारिक चिंताएं और उच्चाधिकारियों का दवाब—ये वे तमाम कारक हैं जो जवानों की मानसिक स्थिति को बुरी तरह प्रभावित कर रहे हैं।
बदलता सुरक्षा परिदृश्य और बढ़ती चौकसी
एक तरफ जहां कठुआ कैंप में यह आंतरिक त्रासदी घटी, वहीं दूसरी ओर जम्मू-कश्मीर के बडगाम और अन्य इलाकों में सुरक्षा बलों की आतंकियों के खिलाफ लगातार कार्रवाई जारी है। बडगाम में एक मुठभेड़ के दौरान सुरक्षाबलों ने एक आतंकी को ढेर कर दिया और जंगलों में सर्च ऑपरेशन अभी भी जारी है। एक तरफ बाहरी दुश्मनों से लोहा लेने की चुनौती, तो दूसरी तरफ आंतरिक मोर्चे पर इस तरह के बढ़ते तनाव—यह दोहरी मार हमारे सुरक्षा तंत्र के लिए एक बड़ी चुनौती बनती जा रही है।
पर्यावरण और जल संकट की अनदेखी
इसी बीच, देश के अन्य हिस्सों से आ रही रिपोर्टें भी नीति निर्माताओं के लिए चिंता का विषय हैं। हाल ही में देश के 10 राज्यों में पहली बार झरनों की गिनती की गई, जिसमें कुल 14,468 झरने दर्ज किए गए। अकेले मणिपुर में सबसे ज्यादा झरने पाए गए, लेकिन चौंकाने वाली बात यह है कि इनमें से 1,336 झरने आज गंभीर खतरे की जद में हैं। प्राकृतिक संसाधनों का दोहन और जलवायु परिवर्तन का यह संकट भी अप्रत्यक्ष रूप से हमारी जीवनशैली और आंतरिक स्थिरता को प्रभावित कर रहा है।
निष्कर्ष और सुधार की आवश्यकता
कठुआ की यह घटना केवल एक आपराधिक मामला या तात्कालिक आवेश का परिणाम नहीं है, बल्कि यह एक चेतावनी है। यदि समय रहते सुरक्षा बलों के मानसिक स्वास्थ्य, काउंसलिंग सेशन और उनके काम करने के तौर-तरीकों में सुधार नहीं किया गया, तो देश को बाहरी खतरों के साथ-साथ आंतरिक मोर्चों पर भी भारी कीमत चुकानी पड़ सकती है। जरूरत इस बात की है कि केवल आदेश देने के बजाय जवानों की बात सुनने और समझने वाला तंत्र विकसित किया जाए।








