दिल्ली के राजनीतिक गलियारों में उस समय हलचल तेज हो गई जब तथाकथित 'थप्पड़ कांड' के मामले में दिल्ली सरकार के मंत्री प्रवेश वर्मा के खिलाफ पुलिस ने प्रथम सूचना रिपोर्ट (FIR) दर्ज करने के बजाय एनसीआर (Non-Cognizable Report) दर्ज की। जैसे ही यह खबर सार्वजनिक हुई, सोशल मीडिया से लेकर कानूनी हलकों तक एक ही सवाल गूंजने लगा कि आखिर एनसीआर क्या होती है और यह सामान्य एफआईआर से किस प्रकार भिन्न है? 'द फ्रीलान्स' की ऑन-द-ग्राउंड इन्वेस्टिगेटिव टीम ने इस मामले की तह तक जाकर पुलिस और कानून के जानकारों से बातचीत की है ताकि इस कानूनी पेचीदगी को पूरी तरह से साफ किया जा सके।
क्या होती है एनसीआर (NCR) और कब दर्ज होती है?
दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 154 और 155 के तहत अपराधों को मुख्य रूप से दो श्रेणियों में बांटा गया है—संज्ञेय (Cognizable) और असंज्ञेय (Non-Cognizable)। जब कोई ऐसा मामला सामने आता है जो गैर-संज्ञेय प्रकृति का होता है—यानी जिसमें अपराध कम गंभीर प्रकृति का होता है और आमतौर पर तीन साल से कम की सजा का प्रावधान होता है—तब पुलिस एफआईआर दर्ज नहीं करती, बल्कि एनसीआर (गैर-संज्ञेय अपराध रिपोर्ट) दर्ज करती है। इस मामले में पुलिस सीधे तौर पर अपनी तरफ से जांच शुरू नहीं कर सकती है।
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एफआईआर (FIR) से कितनी अलग है एनसीआर?
आम जनता के बीच यह भ्रम अक्सर देखा जाता है कि पुलिस में शिकायत दर्ज होने का मतलब एफआईआर ही होता है। लेकिन दोनों में जमीन-आसमान का फर्क है:
- जांच का अधिकार: एफआईआर दर्ज होने पर पुलिस को मजिस्ट्रेट की अनुमति के बिना तुरंत छानबीन और गिरफ्तारी का अधिकार मिल जाता है। इसके विपरीत, एनसीआर दर्ज होने पर पुलिस बिना अदालत (न्यायिक मजिस्ट्रेट) की अनुमति के न तो आरोपी को गिरफ्तार कर सकती है और न ही अपनी मर्जी से मामले की जांच शुरू कर सकती है।
- अपराध की गंभीरता: हत्या, डकैती, बलात्कार या गंभीर चोट जैसे गंभीर और संज्ञेय अपराधों में एफआईआर होती है। वहीं, मामूली मारपीट, गाली-गलौज, मानहानि या धमकी जैसे असंज्ञेय मामलों में एनसीआर दर्ज की जाती है।
- न्यायालय की भूमिका: एनसीआर के मामले में शिकायतकर्ता को सीधे अदालत का रुख करना पड़ता है। अदालत के आदेश के बाद ही पुलिस आगे की कानूनी कार्रवाई या जांच के लिए कदम उठाती है।
थप्पड़ कांड और प्रवेश वर्मा का मामला
सूत्रों और मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, प्रवेश वर्मा से जुड़े इस ताज़ा प्रकरण में लगे आरोपों की प्रकृति को देखते हुए पुलिस ने सीआरपीसी के प्रावधानों का पालन करते हुए इसे एनसीआर के दायरे में रखा है। जमीन पर मौजूद हमारे संवाददाताओं ने जब इस कानूनी पहलू को टटोला, तो यह बात सामने आई कि राजनीतिक हस्तियों से जुड़े मामलों में जनता की नजरें पुलिस की हर एक कार्रवाई पर टिकी रहती हैं। यही वजह है कि एक मामूली प्रतीत होने वाला गैर-संज्ञेय मामला भी आज राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा का विषय बन गया है।
भविष्य का असर और कानूनी जानकारों की राय
कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि इस तरह के मामलों में एनसीआर दर्ज होना अपने आप में एक सामान्य प्रक्रिया है, बशर्ते आरोप और साक्ष्य उसी श्रेणी के हों। हालांकि, यदि पीड़ित पक्ष अदालत में जाता है और अदालत को लगता है कि मामले में गहराई से जांच की आवश्यकता है, तो मजिस्ट्रेट पुलिस को एफआईआर दर्ज कर जांच करने का आदेश भी दे सकते हैं। 'द फ्रीलान्स' इस पूरे घटनाक्रम और आगे आने वाले न्यायिक फैसलों पर अपनी पैनी नजर बनाए रखेगा।








