नई दिल्ली से हमारी ग्राउंड रिपोर्ट के मुताबिक, भारतीय रिजर्व बैंक ने देश में लगातार बढ़ रही महंगाई को रोकने के लिए एक बार फिर रेपो रेट में बढ़ोतरी कर दी है। रिजर्व बैंक के इस बड़े फैसले का सीधा मतलब यह है कि अब बैंक से कर्ज लेना और भी ज्यादा महंगा हो गया है। आम आदमी जो पहले से ही महंगाई की मार झेल रहा था, अब उस पर बैंक की तरफ से चुकाई जाने वाली मासिक किस्त यानी ईएमआई का बोझ और ज्यादा बढ़ गया है। बाजार के जानकारों का मानना है कि इस कदम से आने वाले दिनों में आम आदमी की जेब पर दबाव और गहराएगा।
इस पूरी प्रक्रिया में जब हमने जमीनी स्तर पर पड़ताल की तो पता चला कि बैंक अब होम लोन, कार लोन और पर्सनल लोन की ब्याज दरों में तेजी से बदलाव कर रहे हैं। जिन लोगों ने पहले से फिक्स या फ्लोटिंग रेट पर लोन ले रखा है, उनकी किस्तें बढ़ने लगी हैं। बैंक अधिकारियों का कहना है कि महंगाई को नियंत्रित करने के लिए केंद्रीय बैंक के पास नीतिगत दरों को बढ़ाने के अलावा और कोई दूसरा विकल्प नहीं बचा था। लेकिन इस सबके बीच सवाल यह उठ रहा है कि क्या आम आदमी की कमाई में उस हिसाब से बढ़ोतरी हो रही है जिस तेजी से उसके लोन की ईएमआई बढ़ रही है?
बढ़ती ब्याज दरों से कैसे बिगड़ेगा घर का बजट
रसोई के सामान से लेकर ईंधन और अब बैंक के लोन तक, हर मोर्चे पर आम आदमी को चौतरफा मार झेलनी पड़ रही है। मध्यम वर्गीय परिवारों के लिए अपने सपनों का घर खरीदना या बच्चों की पढ़ाई के लिए लोन लेना अब बहुत कठिन हो गया है। हर महीने आने वाला बैंक का मैसेज लोगों की नींद उड़ा रहा है क्योंकि पुरानी आय में अब घर का खर्च चलाना और बढ़ी हुई ईएमआई चुकाना बेहद मुश्किल साबित हो रहा है। बहुत से परिवारों ने अपने बजट में कटौती करनी शुरू कर दी है ताकि वे बैंक का समय पर भुगतान कर सकें।
बाजार के विशेषज्ञों का कहना है कि जब तक महंगाई दर रिजर्व बैंक के तय दायरे में नहीं आती, तब तक ब्याज दरों में राहत मिलने की कोई खास उम्मीद नजर नहीं आ रही है। इसका मतलब यह है कि आने वाले कुछ महीनों तक कर्ज लेने वालों को राहत मिलने वाली नहीं है। लोगों को अपने वित्तीय मामलों में बहुत सावधानी बरतने की जरूरत है ताकि वे किसी भी तरह के आर्थिक संकट से बच सकें। फालतू खर्चों से बचना और बचत पर ध्यान देना ही इस समय सबसे समझदारी भरा कदम माना जा रहा है।
बैंकों के नए फैसलों से ग्राहकों पर बढ़ा मानसिक तनाव
देशभर के अलग-अलग शहरों में जब हमने आम लोगों से बात की तो उनका दर्द साफ झलकता दिखा। कई लोगों का कहना है कि उनकी नौकरी में वेतन तो उतना ही है, लेकिन बैंक हर महीने ईएमआई की रकम बढ़ा देता है। इससे न केवल उनका मासिक बजट पूरी तरह बिगड़ गया है बल्कि परिवार चलाना भी एक बड़ी चुनौती बन गया है। लोग अब इस बात पर चर्चा कर रहे हैं कि क्या उन्हें अपना पुराना कर्ज समय से पहले चुकाने के लिए अपनी जमा पूंजी निकालनी चाहिए या नहीं।
द फ्रीलान्स की इस ग्राउंड पड़ताल से यह बिल्कुल साफ हो जाता है कि महंगाई और रेपो रेट की इस जंग में सबसे ज्यादा पिसने वाला आम आदमी ही है। सरकार और केंद्रीय बैंक भले ही अर्थव्यवस्था को संभालने के लिए कड़े कदम उठा रहे हैं, लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि इन फैसलों से आम नागरिक का जीवन और अधिक संघर्षपूर्ण हो गया है। आने वाले दिनों में यह देखना बेहद दिलचस्प होगा कि क्या सरकार इस मोर्चे पर राहत देने के लिए कोई नई योजना या नीति लेकर आती है या नहीं।










