नई दिल्ली/ग्राउंड ब्यूरो — देश की राजधानी में विरोध प्रदर्शन करने के लिए अनुमति लेने की प्रक्रिया अब एक लंबी और थका देने वाली कानूनी लड़ाई बन गई है। द वायर की एक रिपोर्ट के मुताबिक, जंतर-मंतर जैसी जगहों पर अपनी बात रखने के लिए नागरिकों को भारी प्रशासनिक बाधाओं का सामना करना पड़ रहा है। हालात ऐसे बन गए हैं कि सरकार की नीतियों के खिलाफ बोलने वालों को या तो अनुमति नहीं मिलती या फिर उन्हें दूर-दराज के इलाकों में धकेल दिया जाता है। इस रिपोर्ट में हम यह समझने की कोशिश कर रहे हैं कि कैसे विरोध जताने के मौलिक अधिकार को धीरे-धीरे कागजी औपचारिकताओं में बांधा जा रहा है।
देश के अलग-अलग हिस्सों से भी ऐसे ही मामले लगातार सामने आ रहे हैं, जो यह बताते हैं कि लोकतांत्रिक व्यवस्था में असहमति की जगह कैसे कम हो रही है। हाल ही में अरुणाचल प्रदेश से एक मामला सामने आया जहां अरुणाचल क्रिश्चियन फोरम ने गंभीर आरोप लगाया कि स्टेट बैंक के सॉफ्टवेयर में ईसाई आवेदकों को एसटी विकल्प चुनने नहीं दिया जा रहा है। इसी तरह कर्नाटक के दावणगेरे से भी प्रशासनिक दबाव में लगभग तीन हजार नाम मतदाता सूची या अन्य सरकारी दस्तावेजों से हटाने का सनसनीखेज मामला सामने आया है। इन सभी घटनाओं की कड़ियां अगर जोड़ी जाएं तो साफ दिखता है कि आम आदमी के अधिकारों का दायरा लगातार सिमट रहा है।
जंतर-मंतर पर प्रदर्शन की बढ़ती मुश्किलें
ऐतिहासिक रूप से जंतर-मंतर देश भर के आंदोलनों, धरनों और विरोध प्रदर्शनों का मुख्य केंद्र रहा है। लेकिन पिछले कुछ वर्षों में स्थानीय प्रशासन और पुलिस ने यहां प्रदर्शन करने के नियमों को इतना सख्त कर दिया है कि आम जनता के लिए अपनी आवाज़ उठाना लगभग नामुमकिन हो गया है। जब कोई संगठन या आम नागरिक प्रदर्शन की अर्जी देता है, तो उसे महीनों चक्कर काटने पड़ते हैं। कई बार अंतिम समय पर अनुमति रद्द कर दी जाती है या फिर ऐसी कड़ी शर्तें लाद दी जाती हैं जिनका पालन करना बहुत मुश्किल होता है। यह सिर्फ एक जगह का नियम नहीं है, बल्कि पूरे देश में विरोध की संस्कृति को कुचलने का एक सोचा-समझा तरीका बन चुका है.
ग्राउंड पर काम करने वाले सामाजिक कार्यकर्ताओं और वकीलों का कहना है कि संविधान ने देश के हर नागरिक को शांतिपूर्ण ढंग से इकट्ठा होने और अपनी बात कहने का अधिकार दिया है। लेकिन 'इजाज़त का गणतंत्र' नाम की इस नई व्यवस्था में उस संवैधानिक अधिकार को प्रशासनिक दया पर छोड़ दिया गया है। यदि कोई समूह बिना अनुमति के सड़क पर उतरता है, तो तुरंत पुलिस बल का प्रयोग कर उसे गैरकानूनी घोषित कर दिया जाता है। इससे आम जनता के मन में एक डर का माहौल बन रहा है, ताकि कोई भी सरकार की नीतियों के खिलाफ खुलकर बोलने की हिम्मत न जुटा सके।
प्रशासनिक फैसलों और सॉफ्टवेयर की तकनीकी दीवारें
विरोध और असहमति सिर्फ सड़कों तक सीमित नहीं है, बल्कि अब सरकारी प्रणालियों और तकनीक के जरिए भी अधिकारों का हनन किया जा रहा है। अरुणाचल प्रदेश में एसबीआई के सॉफ्टवेयर द्वारा ईसाई समुदाय के लोगों को एसटी विकल्प न मिलने का विवाद इस बात का ताजा उदाहरण है। तकनीक को निष्पक्ष माना जाता है, लेकिन जब उसमें ऐसे तकनीकी पेंच डाल दिए जाते हैं जिससे एक खास वर्ग के लोग अपने हक से वंचित हो जाएं, तो यह गंभीर चिंता का विषय बन जाता है। स्थानीय लोगों का आरोप है कि बार-बार शिकायत करने के बावजूद बैंक और प्रशासनिक अधिकारी इस तकनीकी खामी को ठीक करने में आनाकानी कर रहे हैं।
वहीं कर्नाटक के दावणगेरे जिले में प्रशासन पर लगभग तीन हजार नाम हटाने का दबाव होने का मामला भी प्रशासनिक हलकों में भूचाल ला चुका है। जिला उपायुक्त के बयानों से यह साफ जाहिर होता है कि निचले स्तर के अधिकारियों पर किस तरह ऊपर से दबाव बनाया जाता है। जब सरकारी मशीनरी का इस्तेमाल जनता के अधिकारों की रक्षा करने के बजाय उन्हें दबाने के लिए किया जाने लगे, तो लोकतंत्र की नींव हिलने लगती है। दावणगेरे की यह घटना अकेली नहीं है, बल्कि देश के कई अन्य जिलों में भी मतदाता सूचियों और नागरिक अधिकारों के साथ इस तरह की छेड़छाड़ की खबरें दबी जुबान से बाहर आ रही हैं।
लोकतंत्र में असहमति का भविष्य और हमारी जिम्मेदारी
इन तमाम घटनाओं को अगर एक साथ रखकर देखा जाए तो एक डरावनी तस्वीर सामने आती है। एक तरफ जहां जंतर-मंतर जैसे प्रतीकात्मक स्थलों पर प्रदर्शनकारियों को रोककर उनकी आवाज़ का गला घोंटा जा रहा है, वहीं दूसरी तरफ डिजिटल और प्रशासनिक स्तर पर लोगों के अधिकार छीने जा रहे हैं। जब विरोध करने के सारे दरवाजे बंद कर दिए जाते हैं, तो समाज के भीतर घुटन और गुस्सा बढ़ने लगता है। इतिहास गवाह है कि जब जनता की जायज़ आवाज़ को दबाया जाता है, तो वह किसी न किसी रूप में बाहर आती ही है।
द फ्रीलान्स की इस ग्राउंड पड़ताल का निष्कर्ष यही है कि लोकतंत्र की असली खूबसूरती उसकी सहनशीलता में होती है। सरकारें आती-जाती रहती हैं, लेकिन नागरिकों के अधिकार हमेशा सर्वोपरि होने चाहिए। यदि विरोध के हर स्वर को कुचलने का यह सिलसिला ऐसे ही चलता रहा, तो वह दिन दूर नहीं जब यह देश केवल कागजों पर ही लोकतांत्रिक रह जाएगा। समय आ गया है कि देश का नागरिक इन प्रशासनिक बंदिशों को समझे और अपने संवैधानिक अधिकारों की रक्षा के लिए शांतिपूर्ण लेकिन दृढ़ता के साथज एकजुट हो।





