द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान नाजी जर्मनी द्वारा परमाणु बम बनाने की कोशिशें हमेशा से इतिहास के सबसे बड़े रहस्यों में रही हैं। जर्मन वैज्ञानिक एक परमाणु रिएक्टर बनाने में जुटे थे, लेकिन नई रिसर्च से पता चला है कि जर्मनी के पास ऐसा रिएक्टर चलाने के लिए जरूरी यूरेनियम और हैवी वॉटर पर्याप्त मात्रा में था ही नहीं। वैज्ञानिकों ने पुराने दस्तावेज, बचे हुए यूरेनियम क्यूब्स और कंप्यूटर मॉडल की मदद से जर्मनी के इस परमाणु प्रयोग की दोबारा जांच करके चौंकाने वाले खुलासे किए हैं।
वर्नेर हाइजेनबर्ग का B8 प्रयोग और अधूरा सच
यह प्रयोग जर्मन वैज्ञानिक वर्नर हाइजेनबर्ग की टीम ने 1945 में किया था, जिसे B8 नाम दिया गया था। इसमें 664 यूरेनियम क्यूब्स को हैवी वॉटर में रखा गया था। वैज्ञानिकों का मकसद ऐसा रिएक्टर बनाना था, जिसमें न्यूक्लियर चेन रिएक्शन लगातार चलता रहे। लेकिन ऐसा नहीं हो पाया। नई रिसर्च के मुताबिक, अगर जर्मनी के पास मौजूद पूरा यूरेनियम और हैवी वॉटर भी एक जगह इकट्ठा कर लिया जाता, तब भी रिएक्टर को चलाना असंभव था।
इस रिसर्च में यूरेनियम के बचे हुए क्यूब्स ने अहम भूमिका निभाई। जर्मनी के परमाणु प्रयोगों में करीब 1,100 यूरेनियम क्यूब्स इस्तेमाल किए गए थे। ये क्यूब करीब 5 सेंटीमीटर चौड़े थे। आज इनमें से सिर्फ 14 क्यूब्स के बारे में पता है कि वे कहां हैं। रिसर्च टीम ने इनमें से दो क्यूब्स की सूक्ष्म जांच की, जिससे उस समय के यूरेनियम की गुणवत्ता का आकलन करने में मदद मिली।
रिएक्टर में क्यों कम पड़ गया यूरेनियम और हैवी वॉटर?
B8 रिएक्टर में करीब 1,538 किलो यूरेनियम और 1,549 किलो हैवी वॉटर था। वैज्ञानिकों ने कंप्यूटर मॉडल की मदद से इस रिएक्टर को दोबारा डिजिटल रूप में बनाया और देखा कि इसमें न्यूट्रॉन कैसे काम कर रहे थे। मॉडल से पता चला कि B8 में न्यूट्रॉन मल्टीप्लिकेशन फैक्टर करीब 0.94 था। आसान भाषा में इसका मतलब है कि अगर एक दौर में 100 न्यूट्रॉन पैदा हो रहे थे, तो अगले दौर में करीब 94 ही काम के न्यूट्रॉन बच रहे थे, जबकि लगातार चेन रिएक्शन के लिए यह संख्या 100 के आसपास होनी चाहिए थी।
नई गणना के मुताबिक, रिएक्टर को सुचारू रूप से चलाने के लिए करीब 3,000 किलो यूरेनियम और 3,500 से 3,800 किलो हैवी वॉटर की जरूरत थी। यानी B8 में मौजूद मात्रा से लगभग दोगुना सामान चाहिए था। इसके अलावा, युद्ध के दौरान नॉर्वे में हैवी वॉटर बनाने वाले प्लांट पर बार-बार हुए हमलों के कारण जर्मनी की सप्लाई पूरी तरह से ठप हो चुकी थी।
सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म और ऐतिहासिक दस्तावेजों के आधार पर तैयार इस रिपोर्ट के दावों की सत्यता की 'The Freelance' स्वतंत्र रूप से पुष्टि करता है। यह विषय ऐतिहासिक शोधों और वैज्ञानिक दस्तावेजों पर आधारित है। साभार: संबंधित शोध रिपोर्ट्स / हिस्टोरिकल आर्काइव्स।
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