नई दिल्ली/ग्राउंड ब्यूरो — प्रशांत महासागर से उठी विनाशकारी मौसमी लहरों ने इस साल भारत के कृषि क्षेत्र की नींद उड़ा दी है। मौसम विज्ञानियों की कड़ी चेतावनियों के बीच अल नीनो की आधिकारिक शुरुआत हो चुकी है, जिसका सीधा और घातक असर देश के मानसून पर साफ दिखाई दे रहा है। ताजा आंकड़ों के मुताबिक, भारत में इस बार पिछले 17 साल का सबसे सूखा मानसून दर्ज किया गया है। मानसून सीजन के खत्म होने के बाद जो आंकड़े सामने आए हैं, वे बेहद डराने वाले हैं और देश के अन्नदाताओं की मुश्किलें बढ़ा रहे हैं।
जमीनी हकीकत पर नजर डालें तो देश के कई राज्यों में बारिश का कोटा पूरा नहीं हो पाया है। खेतों में नमी गायब है और कुएं सूखने की कगार पर पहुंच गए हैं। ताजा रिपोर्ट बताती है कि बिहार में सामान्य से 37 प्रतिशत कम बारिश दर्ज की गई है। वहीं, रेगिस्तानी और खेती के लिए संवेदनशील माने जाने वाले राज्य राजस्थान में भी 21 प्रतिशत कम पानी बरसा है। इन आंकड़ों ने साफ कर दिया है कि अल नीनो का यह दौर सिर्फ एक मौसमी बदलाव नहीं है, बल्कि यह देश की ग्रामीण अर्थव्यवस्था के लिए एक बड़ी चुनौती बन चुका है।
किसानों की मेहनत पर पानी फेर रहा सुपर अल नीनो
मौसम विशेषज्ञों और वैज्ञानिकों का मानना है कि इस बार का अल नीनो सामान्य से कहीं अधिक ताकतवर यानी सुपर अल नीनो के रूप में उभर रहा है। यह समुद्री बदलाव बादलों को सोख रहा है और समय पर बारिश होने नहीं दे रहा है। खरीफ की मुख्य फसलें जैसे धान, मक्का और दलहन इस सूखे की मार सबसे ज्यादा झेल रही हैं। कई इलाकों में किसानों ने उम्मीद खो दी है क्योंकि रोपाई के वक्त ही पानी की भारी कमी हो गई थी। सिंचाई के महंगे साधनों का उपयोग करना आम किसान के बस की बात नहीं है, जिससे उसकी लागत लगातार बढ़ती जा रही है।
इस पूरे संकट के बीच विश्व मौसम विज्ञान संगठन यानी डब्लूएमओ ने एक हल्की सी उम्मीद भी जताई है। जानकारों के अनुसार, पॉजिटिव आईओडी यानी हिंद महासागर द्विध्रुव इस स्थिति में थोड़ा सुधार कर सकता है और मानसून को कुछ हद तक संभाल सकता है। लेकिन इसके बावजूद बड़े पैमाने पर फसलों को हुआ नुकसान चिंता का विषय बना हुआ है। ग्रामीण इलाकों में भूजल स्तर तेजी से नीचे जा रहा है, जिससे आने वाले सर्दियों के सीजन यानी रबी की फसलों पर भी संकट के बादल मंडराने लगे हैं।
अकाल जैसी स्थिति और प्रशासनिक तैयारियां
देश के कई हिस्सों में अकाल जैसी घड़ी नजदीक आने की आहट सुनाई देने लगी है। होर्मुज जलडमरूमध्य से लेकर हमारे अपने समुद्र तटों तक से मिल रहे संकेत अच्छे नहीं हैं। खाद्य सुरक्षा और महंगाई को नियंत्रित रखने के लिए सरकार के सामने भी अब बड़े कदम उठाने की मजबूरी पैदा हो गई है। कृषि विशेषज्ञों का कहना है कि यदि समय रहते वैकल्पिक सिंचाई और सूखा राहत योजनाओं को जमीन पर नहीं उतारा गया, तो स्थिति हाथ से निकल सकती है।
द फ्रीलान्स की ग्राउंड पड़ताल बताती है कि गांवों में पानी के भारी संकट के कारण पलायन भी शुरू हो गया है। किसान कर्ज के दलदल में फंसते जा रहे हैं क्योंकि उनकी फसलें आधी-अधूरी ही उग पाई हैं। मौसम विभाग लगातार पैनी नजर बनाए हुए है और आने वाले दिनों में सर्दी के मौसम के मिजाज पर भी अल नीनो का असर देखने को मिल सकता है। आम जनता और सरकार दोनों के लिए यह समय बेहद सतर्क रहने और पानी की एक-एक बूंद बचाने का है।
बदला हुआ मौसम चक्र और भविष्य की चेतावनी
यह साफ हो चुका है कि जलवायु परिवर्तन अब भविष्य की कोई बात नहीं बल्कि वर्तमान की एक कड़वी सच्चाई बन चुका है। प्रशांत महासागर की हलचल ने भारतीय उपमहाद्वीप के मौसम को पूरी तरह से उलट-पुलट कर रख दिया है। वैज्ञानिकों का यह भी कहना है कि अगर हालात ऐसे ही रहे तो आने वाले वर्षों में सदी के सबसे पुराने रिकॉर्ड भी टूट सकते हैं। समय आ गया है कि देश की नीतियां पानी के प्रबंधन और खेती के पारंपरिक तरीकों को पुनर्जीवित करने पर जोर दें।






