जकार्ता और दुनियाभर से आ रही तस्वीरें बेहद डराने वाली हैं। मौसम के बदले मिजाज और अल-नीनो के घातक असर ने पूरी दुनिया में तबाही मचा रखी है। इंडोनेशिया के घने जंगलों में इन दिनों भीषण आग लगी हुई है। आग इतनी भयानक है कि दूर-दूर तक आसमान का रंग पूरी तरह बदल चुका है। स्थानीय लोगों के मुताबिक, धुएं और धूल के गुबार की वजह से दिन में भी आसमान पीला और नारंगी नजर आ रहा है। सांस लेना मुश्किल हो गया है और प्रशासन ने लोगों को घरों में रहने की चेतावनी दी है।
यह संकट सिर्फ इंडोनेशिया तक ही सीमित नहीं है। यूरोप और एशिया के कई दूसरे देश भी इस कुदरती मार का शिकार बन रहे हैं। तुर्की के इस्तांबुल शहर में हाल ही में भारी बारिश और बाढ़ ने जनजीवन अस्त-व्यस्त कर दिया है। हालात इतने खराब हैं कि शहर की सड़कें धंस गई हैं। बाढ़ का पानी सीधे अस्पतालों के अंदर तक घुस गया है। मरीजों और डॉक्टरों को सुरक्षित स्थानों पर पहुंचाने के लिए युद्ध स्तर पर बचाव कार्य चलाने पड़े हैं। मौसम वैज्ञानिकों का साफ कहना है कि इन सभी त्रासदियों के पीछे अल-नीनो का बढ़ता प्रभाव मुख्य वजह है।
किसानों और पशुपालकों पर पड़ी दोहरी मार
मौसम के इस अजीब और खतरनाक बदलाव ने खेती और पशुपालन से जुड़े लोगों की कमर तोड़ दी है। कई इलाकों में लगातार सूखे की वजह से खेतों में घास और चारा पूरी तरह खत्म हो चुका है। पशुओं को खिलाने के लिए दाना तक नहीं बचा है। हालात इतने बदतर हो गए हैं कि मजबूर किसानों को अपनी गायें और अन्य मवेशी आधी कीमत पर बेचने पड़ रहे हैं। बाजार में खरीदार भी कम हैं क्योंकि हर कोई इस सूखे और महंगाई की मार से परेशान है। ग्रामीण इलाकों में अर्थव्यवस्था पूरी तरह चरमरा गई है और किसानों के सामने रोजी-रोटी का संकट खड़ा हो गया है।
पर्यावरण और मौसम विभाग के जानकारों का मानना है कि आने वाले दिनों में यह संकट और गहरा सकता है। अल-नीनो की वजह से समुद्री सतह का तापमान लगातार बढ़ रहा है। इसका सीधा असर दुनिया भर के मानसून और बारिश के चक्र पर पड़ रहा है। कहीं जरूरत से ज्यादा सूखा पड़ रहा है तो कहीं अचानक बादल फटने जैसी घटनाएं सामने आ रही हैं। सरकारों और अंतरराष्ट्रीय एजेंसियों के लिए इस स्थिति से निपटना एक बड़ी चुनौती बन गया है। आम जनता के स्तर पर भी पानी और ऊर्जा की बचत करने की अपील की जा रही है ताकि इस आपदा से किसी तरह निपटा जा सके।
प्रशासन की नाकामी और राहत कार्यों की धीमी रफ्तार
इंडोनेशिया के प्रभावित इलाकों में जंगलों की आग बुझाने के लिए दमकल और बचाव दल जुटे हुए हैं। लेकिन आग का दायरा इतना बड़ा है कि संसाधनों की कमी साफ तौर पर नजर आ रही है। घने जंगलों और पहाड़ी इलाकों तक गाड़ियों का पहुंचना मुमकिन नहीं हो पा रहा है। हेलीकॉप्टरों की मदद से पानी और रसायन का छिड़काव किया जा रहा है ताकि आग को आगे बढ़ने से रोका जा सके। स्थानीय लोग प्रशासन पर यह आरोप भी लगा रहे हैं कि शुरुआती दौर में आग को हल्के में लिया गया, जिसकी वजह से स्थिति आज इतनी बेकाबू हो गई है।
हवा की गुणवत्ता सूचकांक यानी एक्यूआई इन इलाकों में खतरनाक स्तर को पार कर चुका है। अस्पतालों में सांस के मरीजों की संख्या तेजी से बढ़ रही है। बच्चों और बुजुर्गों को सबसे ज्यादा परेशानी का सामना करना पड़ रहा है। डॉक्टर लोगों को बिना एन-95 मास्क के बाहर न निकलने की सलाह दे रहे हैं। सरकार ने प्रभावित क्षेत्रों में अस्थायी राहत शिविर बनाए हैं और लोगों को सुरक्षित जगहों पर शिफ्ट किया जा रहा है। हालांकि, जब तक मौसम मेहरबान नहीं होता और बारिश शुरू नहीं होती, तब तक इस आग और धुएं के कहर से राहत मिलने की कोई उम्मीद नजर नहीं आ रही है।
वैश्विक जलवायु संकट पर उठ रहे बड़े सवाल
यह पूरी घटना एक बार फिर इंसानी लापरवाही और ग्लोबल वार्मिंग के खतरे को सामने लाती है। औद्योगिक प्रदूषण और पर्यावरण से लगातार हो रहे खिलवाड़ ने मौसम के चक्र को पूरी तरह बिगाड़ दिया है। अल-नीनो जैसी मौसमी घटनाएं अब पहले से ज्यादा आक्रामक रूप ले रही हैं। दुनियाभर के वैज्ञानिक और पर्यावरणविद् कई मंचों से यह चेतावनी दे रहे हैं कि अगर समय रहते ठोस कदम नहीं उठाए गए, तो आने वाले सालों में पृथ्वी पर जीवन और अधिक कठिन हो जाएगा। सरकारों को अपनी नीतियों में बदलाव करने की जरूरत है ताकि प्रकृति के इस गुस्से को कुछ हद तक शांत किया जा सके।







