नई दिल्ली और केरल से 'द फ्रीलान्स' की विशेष ग्राउंड रिपोर्ट। भारत में शादियों का मौसम हमेशा से एक बड़ा सामाजिक उत्सव रहा है। हाल ही में केरल के प्रसिद्ध गुरुवायूर मंदिर में मालविका और नवनीत जैसे जोड़ों की शादियों की तस्वीरें सोशल मीडिया पर छाई हुई हैं। पारंपरिक संगीत और पवित्र गानों के बीच लोग नए जीवन की शुरुआत कर रहे हैं। समाज में इन आयोजनों को बहुत पवित्र माना जाता है और परिवार बड़े उत्साह के साथ इन रस्मों को पूरा करते हैं। लेकिन इन खुशियों के बीच एक बहुत जरूरी और गंभीर सामाजिक मुद्दा भी सामने आ रहा है जिसपर ध्यान देना बेहद जरूरी है।
दूसरी तरफ अंतरराष्ट्रीय संस्था यूनिसेफ ने बाल विवाह को पूरी तरह खत्म करने की सख्त जरूरत बताई है। यूनिसेफ की रिपोर्ट साफ कहती है कि जब तक बच्चों की कम उम्र में शादी रुकती नहीं है, तब तक उनका असली विकास संभव नहीं है। किशोरों का सशक्तिकरण आज के समय की सबसे बड़ी मांग है। शिक्षा और सही मार्गदर्शन के बिना युवा अपने पैरों पर खड़े नहीं हो सकते। केरल जैसे साक्षर राज्य में भी बाल विवाह के खिलाफ जागरूकता अभियान लगातार चलाए जा रहे हैं ताकि कोई भी बच्चा इस कुप्रथा का शिकार न बने।
संविधान का अधिकार और शादी की सही उम्र
कानूनी जानकारों का मानना है कि देश का संविधान हर बालिग नागरिक को अपनी पसंद से जीवन साथी चुनने का पूरा अधिकार देता है। सिविल सेवा परीक्षाओं और कानूनी पढ़ाई में भी अक्सर यह सवाल पूछा जाता है कि भारतीय संविधान का कौन सा अनुच्छेद व्यक्ति को अपनी पसंद के इंसान से शादी करने की आजादी देता है। अनुच्छेद 21 के तहत जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार हर नागरिक को मिला हुआ है। हालांकि यह अधिकार केवल उन लोगों के लिए है जो कानून द्वारा तय की गई शादी की उम्र पूरी कर चुके हैं। कम उम्र में शादी करना कानूनन अपराध है और इससे बच्चों का भविष्य बर्बाद हो जाता है।
पारिवारिक आयोजनों और धार्मिक अनुष्ठानों के बीच डिजिटल प्लेटफॉर्म पर भी शादियों से जुड़े गाने और वीडियो खूब देखे जा रहे हैं। यूट्यूब और अन्य सोशल मीडिया चैनलों पर 'ईडन थोट्टम' जैसे पवित्र विवाह गीत बहुत लोकप्रिय हो रहे हैं। लोग इन गानों को सुनकर अपनी संस्कृति से जुड़ रहे हैं और पुराने पारंपरिक तरीकों से शादियां कर रहे हैं। इन सांस्कृतिक आयोजनों में लोगों की भारी भीड़ उमड़ रही है, जिससे स्थानीय बाजारों और व्यापारियों को भी अच्छा फायदा मिल रहा है।
प्रशासन की सख्ती और बाल अधिकारों की सुरक्षा
बाल विवाह रोकने के लिए जिला प्रशासन और पुलिस विभाग लगातार सतर्क नजर आ रहे हैं। कई जिलों में बाल विवाह निषेध अधिकारियों को विशेष निर्देश दिए गए हैं कि वे गुप्त रूप से सूचना जुटाएं और ऐसी शादियों को तुरंत रोकें। समाज कल्याण विभाग स्कूलों और कॉलेजों में जाकर छात्र-छात्राओं को उनके कानूनी अधिकारों के बारे में बता रहा है। शिक्षकों और स्थानीय नेताओं की भी मदद ली जा रही है ताकि गांवों और कस्बों में लोगों को समझाया जा सके कि बच्चों की शादी उनकी पढ़ाई पूरी होने से पहले बिल्कुल न करें।
शादियों के इस दौर में समाज के हर वर्ग को यह समझना होगा कि जश्न मनाने के साथ-साथ बच्चों के अधिकारों की रक्षा करना हमारी सबसे बड़ी जिम्मेदारी है। एक तरफ जहां गुरुवायूर जैसे मंदिरों में भव्य विवाह समारोह हो रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ बाल विवाह मुक्त समाज बनाने का संकल्प भी लिया जा रहा है। 'द फ्रीलान्स' की इस पड़ताल से यह साफ होता है कि कानूनी जागरूकता और सामाजिक सुधार मिलकर ही देश को एक नई दिशा दे सकते हैं।






