नई दिल्ली/ग्राउंड ब्यूरो — देश की राजधानी में विरोध प्रदर्शन करने का हक अब धीरे-धीरे एक कागजी औपचारिकता बनकर रह गया है। जंतर-मंतर जैसे पारंपरिक धरना स्थलों पर भी आवाज़ उठाने के लिए अब पहले से अनुमति लेना अनिवार्य कर दिया गया है। स्थिति यह है कि सरकार और प्रशासन के खिलाफ अपनी बात कहने वालों को हर मोड़ पर रोक का सामना करना पड़ता है। द फ्रीलान्स की टीम ने जब ज़मीनी स्तर पर पड़ताल की तो यह साफ हुआ कि विरोध के हर स्वर को दबाने के लिए नियमों का दायरा लगातार कड़ा किया जा रहा है।
नागरिकों के लोकतांत्रिक अधिकारों की रक्षा करने का दावा करने वाले तंत्र में अब असहमति की आवाज़ को बर्दाश्त करने की गुंजाइश कम होती जा रही है। हाल ही में कई ऐसे मामले सामने आए हैं जहां जंतर-मंतर पर शांतिपूर्ण धरना देने पहुंचे समूहों को पुलिस ने बलपूर्वक हटा दिया। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक विरोध प्रदर्शनों पर यह रोक सिर्फ राजधानी तक सीमित नहीं है, बल्कि देश के दूसरे राज्यों में भी प्रशासनिक स्तर पर जनता के अधिकारों में कटौती की जा रही है।
प्रशासनिक पाबंदियां और इजाजत का बढ़ता जाल
जमीनी हकीकत यह है कि किसी भी मुद्दे पर आवाज उठाने के लिए अब हफ्तों पहले अनुमति के आवेदन देने होते हैं। अधिकारियों की ओर से इन आवेदनों पर या तो कोई जवाब नहीं दिया जाता या फिर सुरक्षा कारणों का हवाला देकर सीधे खारिज कर दिया जाता है। लोकतंत्र में विरोध करने के संवैधानिक अधिकार को इस तरह से लाल फीताशाही के जाल में उलझा देना बेहद चिंताजनक है। आम आदमी जब अपनी किसी समस्या या नीतिगत विरोध के लिए सड़क पर उतरता है, तो उसे अपराधी की तरह घेर लिया जाता है।
इस बीच देश के अन्य हिस्सों से भी ऐसे ही प्रशासनिक दबाव और भेदभाव के मामले सामने आ रहे हैं। कर्नाटक एसआईआर के मामले में दावणगेरे जिला प्रशासन पर हजारों नाम हटाने का भारी दबाव होने की बात सामने आई है। स्थानीय अधिकारियों का कहना है कि प्रशासनिक मशीनरी का इस तरह से इस्तेमाल आम जनता के अधिकारों पर सीधा हमला है। दूसरी ओर, अरुणाचल क्रिश्चियन Forum ने भी आरोप लगाया है कि स्टेट बैंक के सॉफ्टवेयर में ईसाई आवेदकों को एसटी विकल्प चुनने से रोका जा रहा है, जो सीधे तौर पर नागरिकों के साथ भेदभाव का बड़ा मामला है।
नागरिक अधिकारों पर मंडराता संकट
इन तमाम घटनाओं से यह साफ हो जाता है कि देश के भीतर लोकतांत्रिक मूल्यों को किस प्रकार कमजोर किया जा रहा है। एक तरफ विरोध प्रदर्शन की हर अर्जी को खारिज किया जा रहा है, तो दूसरी तरफ प्रशासनिक सॉफ्टवेयर और दस्तावेजों के जरिए लोगों के अधिकार छीने जा रहे हैं। जब जंतर-मंतर जैसी जगहों पर जनता की आवाज़ को बैरिकेड्स और पुलिस बल के जरिए रोक दिया जाता है, तो यह सवाल उठना लाजिमी है कि क्या हम वास्तव में एक स्वतंत्र गणराज्य में जी रहे हैं।
आम जनता और सामाजिक कार्यकर्ताओं का मानना है कि विरोध का गला घोंटना किसी भी स्वस्थ लोकतंत्र की निशानी नहीं हो सकता। देश के अलग-अलग कोनों से आ रही इन खबरों से यह स्पष्ट है कि असहमति को अपराध की तरह पेश किया जा रहा है। जब तक नागरिक समाज एकजुट होकर इन पाबंदियों के खिलाफ सवाल नहीं उठाएगा, तब तक अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का दायरा यूं ही सिमटता रहेगा।
द फ्रीलान्स की अंतिम ग्राउंड पड़ताल
हमारी पड़ताल यह बताती है कि इजाज़त का यह पूरा तंत्र जनता की आवाज़ को दबाने का एक सुनियोजित हथियार बन चुका है। पुलिस और प्रशासन की यह कोशिश रहती है कि कोई भी बड़ी जनविरोधी नीति पर खुलकर सवाल न उठा सके। लेकिन इतिहास गवाह है कि जनता के गले में कितनी भी पाबंदियों का फंदा कसा जाए, विरोध की चिंगारी किसी न किसी रूप में बाहर आ ही जाती है। जंतर-मंतर से लेकर देश के अन्य मंचों तक, नागरिक अपने अधिकारों के लिए लगातार संघर्ष करने को मजबूर हैं।






