नई दिल्ली के जंतर-मंतर को देश के लोकतांत्रिक इतिहास में विरोध प्रदर्शनों और जन आंदोलनों का केंद्र माना जाता है। लेकिन पिछले कुछ समय से यहां आवाज उठाने वालों के सामने प्रशासनिक बाधाएं लगातार खड़ी की जा रही हैं। स्थिति यह हो गई है कि सरकार या प्रशासन की बिना पूर्व अनुमति के किसी भी बड़े मुद्दे पर आवाज बुलंद करना लगभग असंभव सा बना दिया गया है। जानकारों का कहना है कि यह केवल नियमों का मामला नहीं है, बल्कि यह सीधे तौर पर नागरिकों के मौलिक अधिकारों के हनन से जुड़ा एक बड़ा संकट है। जब हर छोटी-सी मांग या विरोध के लिए पुलिस और प्रशासन से लिखित मंजूरी लेना अनिवार्य कर दिया जाए, तो उसे लोकतंत्र कहना मुश्किल हो जाता है।
हालिया मीडिया रिपोर्ट्स में इस बात पर गहरी चिंता जताई गई है कि कैसे विरोध के संवैधानिक अधिकार को नियंत्रित करने के लिए 'इजाजत का गणतंत्र' खड़ा कर दिया गया है। इसका मतलब यह है कि अब आपकी आवाज तभी गूंज सकती है जब सिस्टम आपको इसकी अनुमति देगा। अगर आपकी मांग सत्ताधारी व्यवस्था के खिलाफ है, तो अनुमतियों के आवेदन कागजों में उलझा दिए जाते हैं या सिरे से खारिज कर दिए जाते हैं। जंतर-मंतर जैसी जगहों पर बैरिकेडिंग बढ़ा दी गई है, भारी पुलिस बल तैनात किया जाता है और प्रदर्शनकारियों को अपराधियों की तरह देखा जाता है। यह रवैया इस बात का स्पष्ट संकेत है कि देश में असहमति की जगह को योजनाबद्ध तरीके से खत्म किया जा रहा है।
प्रशासनिक पाबंदियां और विरोध प्रदर्शनों का बदलता स्वरूप
जमीनी स्तर पर स्थिति यह है कि जब भी छात्र, किसान, मजदूर या सामाजिक कार्यकर्ता अपनी किसी जायज मांग को लेकर दिल्ली पहुंचते हैं, उन्हें सबसे पहले शहर की सीमाओं पर ही रोक लिया जाता है। इसके बाद उन्हें जंतर-मंतर तक पहुंचने नहीं दिया जाता है और वैकल्पिक स्थानों पर भेज दिया जाता है, जहां आम जनता की नजर उन तक नहीं पहुंच पाती है। यह रणनीति विरोध की धार को कुंद करने के लिए अपनाई जा रही है। मीडिया रिपोर्ट्स बताती हैं कि पिछले कुछ महीनों में अनगिनत विरोध प्रदर्शनों को या तो अनुमति ही नहीं मिली या फिर उन्हें तय समय से पहले ही जबरन हटा दिया गया। इस तरह की कार्रवाइयों से नागरिकों के मन में एक डर का माहौल पैदा किया जा रहा है, ताकि कोई भी सरकार की नीतियों पर सवाल उठाने की हिम्मत न जुटा सके।
इस पूरे घटनाक्रम के बीच देश के अन्य हिस्सों से भी प्रशासनिक और संस्थागत दबाव की खबरें सामने आ रही हैं। एक तरफ जहां दिल्ली में विरोध की आवाज़ों को रोका जा रहा है, वहीं दूसरी तरफ अरुणाचल प्रदेश और कर्नाटक जैसे राज्यों से भी प्रशासनिक तंत्र के दुरुपयोग के मामले सुर्खियों में हैं। अरुणाचल क्रिश्चियन फोरम ने गंभीर आरोप लगाया है कि स्टेट बैंक के सॉफ्टवेयर में ईसाई आवेदकों को अनुसूचित जनजाति यानी एसटी का विकल्प चुनने से रोका जा रहा है। वहीं कर्नाटक के दावणगेरे जिले में लगभग तीन हजार नाम हटाने के लिए जिला प्रशासन पर अनुचित दबाव डालने की बात सामने आई है। ये तमाम घटनाएं इस बात की गवाही देती हैं कि देश के अलग-अलग हिस्सों में संस्थागत प्रणालियों का इस्तेमाल आम लोगों के अधिकारों को कुचलने के लिए किया जा रहा है।
नागरिक अधिकारों पर मंडराता संकट और भविष्य की चुनौतियां
संविधान ने देश के हर नागरिक को शांतिपूर्ण तरीके से इकट्ठा होने और अपनी बात कहने की पूरी आजादी दी है। लेकिन जिस तरह से अनुमति के नाम पर इस आजादी को कागजी शर्तों में बांधा जा रहा है, वह लोकतंत्र के भविष्य के लिए एक डरावना संकेत है। जब न्याय और अधिकारों की मांग करने वालों को ही अपराधी मान लिया जाए, तो संवाद के सारे रास्ते अपने आप बंद हो जाते हैं। मीडिया रिपोर्ट्स और सामाजिक संगठनों की यह पड़ताल इस बात पर जोर देती है कि अगर इस प्रवृत्ति को समय रहते नहीं रोका गया, तो विरोध करने का अधिकार केवल एक छलावा बनकर रह जाएगा। जनता की आवाज को इस तरह दबाना किसी भी स्वस्थ समाज के लिए घातक साबित हो सकता है।
द फ्रीलान्स की इस ग्राउंड पड़ताल से यह साफ होता है कि इजाजत का यह मॉडल केवल एक प्रशासनिक प्रक्रिया नहीं है, बल्कि यह असहमति को कुचलने का एक हथियार बन चुका है। चाहे राजधानी दिल्ली में जंतर-मंतर पर प्रदर्शनों को रोकना हो या राज्यों में प्रशासनिक स्तर पर हो रहे भेदभाव, हर जगह एक ही पैटर्न दिखाई देता है। आम नागरिकों को यह समझना होगा कि उनके बुनियादी अधिकारों की सुरक्षा के लिएजवाबदेही तय करना कितना जरूरी है। यदि आज इन पाबंदियों के खिलाफ आवाज नहीं उठाई गई, तो कल लोकतंत्र का दायरा और अधिक सिकुड़ जाएगा, जहां सरकार से सवाल पूछना सबसे बड़ा गुनाह बन जाएगा।






