नई दिल्ली/ग्राउंड ब्यूरो — राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली के जंतर-मंतर पर एक बार फिर विरोध प्रदर्शन के दौरान भारी हंगामा देखने को मिला है। सिटिज़न्स फ़ॉर जस्टिस एंड पीस यानी सीजेपी से जुड़े प्रमुख कार्यकर्ता सौरव दास, आशुतोष रांका और अजिंक्य शिंदे को दिल्ली पुलिस ने हिरासत میں ले लिया था। जंतर-मंतर पर निषेधाज्ञा और प्रदर्शन पर रोक के बावजूद ये सभी कार्यकर्ता अपनी मांगों को लेकर वहां पहुंचे थे। पुलिस ने सुरक्षा और कानून व्यवस्था का हवाला देते हुए तुरंत एक्शन लिया और इन सभी को हिरासत में लेकर थाने ले गई। इस कार्रवाई के बाद से मानवाधिकार संगठनों और समर्थकों के बीच तीखी प्रतिक्रिया देखने को मिल रही है।
पुलिस हिरासत की इस कार्रवाई के तुरंत बाद मामला अदालत तक पहुंचा जहां वकीलों और मानवाधिकार कार्यकर्ताओं ने इस गिरफ्तारी को गलत बताया। सुनवाई के बाद अदालत ने सौरव दास, आशुतोष रांका और अभिजीत दिपके को रिहा करने का आदेश दिया। हालांकि अदालत ने इन्हें कुछ खास शर्तों के आधार पर ही छोड़ा है। इस कानूनी राहत के बाद सीजेपी के सदस्यों और समर्थकों ने राहत की सांस ली है। कानूनी जानकारों का मानना है कि इस तरह की गिरफ्तारियां लोकतांत्रिक अधिकारों और विरोध दर्ज कराने की आजादी पर बड़ा सवाल खड़ा करती हैं, जिस पर आने वाले दिनों में और बहस छिड़ सकती है।
रिहाई के बाद सीजेपी की अगली कानूनी और ज़मीनी रणनीति
अदालत से सशर्त रिहाई मिलने के बाद सौरव दास ने मीडिया से बातचीत में साफ किया कि संगठन पीछे हटने वाला नहीं है। सीजेपी का यह साफ कहना है कि वे नागरिकों के अधिकारों की लड़ाई पूरी मजबूती से लड़ते रहेंगे। सौरव दास ने बताया कि संगठन अपनी आगे की रूपरेखा तैयार कर रहा है और लोकतांत्रिक दायरे में रहकर अपना विरोध दर्ज कराना जारी रखेगा। उन्होंने कहा कि पुलिस की ऐसी कार्रवाई से उनकी आवाज को दबाया नहीं जा सकता है। सीजेपी से जुड़े लोगों का यह भी कहना है कि वे संविधान के दायरे में रहकर जनता के मुद्दों को लगातार उठाते रहेंगे और कानूनी लड़ाई को भी आगे बढ़ाएंगे।
इस पूरे मामले पर विभिन्न मानवाधिकार संगठनों ने भी तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त की है। सिटीजन्स फॉर जस्टिस एंड पीस के समर्थकों का कहना है कि कॉकरोच कभी नहीं मरते, यानी वे हर मुश्किल परिस्थिति का डटकर सामना करेंगे। उनका मानना है कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और शांतिपूर्ण प्रदर्शन का अधिकार हर भारतीय नागरिक को मिला हुआ है। जंतर-मंतर पर हुई इस घटना के बाद से दिल्ली पुलिस की कार्यप्रणाली पर भी सवाल उठने लगे हैं कि क्या शांतिपूर्ण ढंग से अपनी बात रख रहे लोगों को इस तरह रोकना उचित है। पुलिस और प्रशासन की ओर से हालांकि अभी तक इस मामले में कोई बड़ा आधिकारिक बयान जारी नहीं किया गया है।
सौरव दास और सीजेपी के साथियों का अब तक का सफर
सोशल मीडिया और मीडिया रिपोर्ट्स में पिछले कुछ दिनों से सौरव दास और आशुतोष रांका के निजी जीवन, पढ़ाई और करियर को लेकर भी काफी चर्चा हो रही है। लोग जानना चाहते हैं कि आखिर कौन हैं ये युवा जो लगातार सामाजिक और मानवाधिकार के मुद्दों पर खुलकर सामने आते हैं। सौरव दास लंबे समय से सामाजिक न्याय और पारदर्शिता के लिए काम कर रहे संगठनों से जुड़े रहे हैं। उनकी शैक्षणिक पृष्ठभूमि और जमीनी सक्रियता ने उन्हें आज मानवाधिकार आंदोलनों का एक जाना-पहचाना चेहरा बना दिया है। उनके साथी आशुतोष रांका भी विभिन्न जनहित के मुद्दों पर लगातार मुखर होकर अपनी बात रखते आए हैं।
जंतर-मंतर की इस ताज़ा घटना ने एक बार फिर यह साबित कर दिया है कि देश की राजधानी में नीतिगत फैसलों और नागरिक अधिकारों के बीच टकराव थमने का नाम नहीं ले रहा है। आम जनता और स्थानीय लोग भी इस बात पर चर्चा कर रहे हैं कि क्या लोकतांत्रिक देश में अपनी बात कहने के लिए इस तरह की पाबंदियां सही हैं। द फ्रीलान्स की टीम इस पूरे मामले पर लगातार नज़र बनाए हुए है और जैसे ही इस प्रकरण से जुड़ा कोई नया कानूनी अपडेट सामने आएगा, हम अपने पाठकों तक सबसे पहले पहुंचाएंगे।






