नई दिल्ली/ग्राउंड ब्यूरो — देश के कॉरपोरेट सेक्टर में इन दिनों एक नया और बड़ा डर लगातार पैर पसार रहा है। यह डर किसी मंदी या भारी नुकसान का नहीं, बल्कि आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस यानी एआई की तेज रफ्तार का है। दफ्तरों में टीमों को संभालने और रिपोर्ट तैयार करने वाले मिडिल मैनेजर्स की नौकरी अब सुरक्षित नहीं मानी जा रही है। शार्क टैंक इंडिया के मशहूर जज और बिजनेसमैन अनुपम मित्तल ने हाल ही में एक बयान दिया था। उनके इस बयान के बाद देश भर के नौकरीपेशा लोगों के बीच हड़कंप मच गया है और यह चर्चा का सबसे बड़ा विषय बन गया है।
अनुपम मित्तल ने अपने बयान में कहा था कि एआई तकनीक अब इंसानों से बेहतर और तेजी से काम करने लगी है। जो काम कभी दो दर्जन मैनेजर्स मिलकर करते थे, उन्हें अब सॉफ्टवेयर कुछ ही सेकंड में पूरा कर देते हैं। इस बात ने उन तमाम लोगों की नींद उड़ा दी है जो दफ्तरों में बीच के स्तर पर यानी मिडिल मैनेजमेंट में नौकरी करते हैं। कंपनियां अब अपने खर्च को कम करने और मुनाफे को बढ़ाने के लिए इंसानी लेबर की जगह सीधे आधुनिक तकनीक का सहारा ले रही हैं। एसबीआई म्यूचुअल फंड और दूसरे बड़े संस्थानों के आईपीओ और बिजनेस प्लान्स में भी अब ऑटोमेशन और तकनीक का मुख्य इस्तेमाल देखा जा रहा है।
कारोबार के पुराने मॉडल पर भारी पड़ रहा एआई
टेक एक्सपर्ट्स का मानना है कि पिछले कुछ सालों में तकनीक ने जितनी तरक्की की है, उसने कंपनियों के पूरे बिजनेस मॉडल को ही बदल दिया है। पहले जिन कामों के लिए बड़ी संख्या में लोगों की जरूरत होती थी, उन्हें अब एक छोटा सा सॉफ्टवेयर चुटकियों में संभाल लेता है। न्यूज18 और नवभारत टाइम्स की रिपोर्ट्स के मुताबिक आने वाले तीन सालों में यह खतरा और भी ज्यादा गहरा सकता है। जिन सेक्टरों ने एआई को पाला-पोसा और आगे बढ़ाया, आज वही तकनीक उनके अपने बिजनेस मॉडल पर हमला बोल रही है। इससे सबसे बड़ा नुकसान उन लोगों को हो रहा है जो उच्च अधिकारियों और ग्राउंड स्टाफ के बीच कड़ी का काम करते हैं।
कंपनियों का मानना है कि मिडिल मैनेजर्स मुख्य रूप से डेटा को इधर से उधर भेजने और मीटिंग्स का रिकॉर्ड रखने का काम करते हैं। जब यही काम एआई टूल्स चंद मिनटों में बिना किसी गलती के कर सकते हैं, तो कंपनियां भारी-भरकम सैलरी देने से बच रही हैं। ज़ी बिजनेस की रिपोर्ट में भी यह बात सामने आई है कि वित्तीय संस्थान अपने खर्चों को कम करने और प्रॉफिटेबिलिटी बढ़ाने के लिए तकनीक का भारी इस्तेमाल कर रहे हैं। इससे कर्मचारियों की संख्या में कटौती करने का दबाव लगातार बढ़ता जा रहा है और लोगों के सामने रोजी-रोटी का संकट खड़ा हो रहा है।
नौकरी बचाने के लिए खुद को बदलना होगा
इस गंभीर स्थिति को देखते हुए देश भर के नौकरीपेशा लोग खासे परेशान नजर आ रहे हैं। सोशल मीडिया से लेकर दफ्तरों की कैंटीन तक हर जगह यही चर्चा है कि आने वाले समय में खुद को कैसे बचाया जाए। जानकारों की सलाह है कि केवल पारंपरिक फाइल वर्क या रिपोर्ट बनाने वाले मैनेजर्स के लिए अब बाजार में टिकना बहुत मुश्किल होगा। यदि इन लोगों को अपनी नौकरी बचानी है, तो उन्हें तुरंत नए जमाने की तकनीकी स्किल्स सीखनी होंगी। केवल वही लोग आगे टिक पाएंगे जो एआई का इस्तेमाल अपने दुश्मन की तरह नहीं, बल्कि अपने एक मददगार साथी की तरह करना सीख जाएंगे।
द फ्रीलान्स की जमीनी पड़ताल बताती है कि कई स्टार्टअप और बड़ी कंपनियां अब ऐसे लोगों की तलाश कर रही हैं जो तकनीक के साथ कदम से कदम मिलाकर चल सकें। सरकार और नीति निर्माताओं के पास भी इस बदलाव से निपटने के लिए कोई ठोस योजना अभी नजर नहीं आ रही है। अगर आने वाले दिनों में कंपनियों ने अपने स्तर पर कोई संतुलन नहीं बनाया, तो बेरोजगारी का यह संकट और विकराल रूप ले सकता है। फिलहाल देश का मिडिल क्लास वर्ग इस तकनीकी क्रांति के साये में अपनी नौकरी बचाने की जद्दोजहद में जुटा हुआ है।











