नई दिल्ली से ग्राउंड जीरो रिपोर्ट — राजधानी दिल्ली में मुख्य चुनाव आयुक्त यानी सीईसी के इस्तीफे की मांग को लेकर जो विरोध प्रदर्शन शुरू हुआ था, वह अब पूरी तरह से एक बड़े राजनीतिक घमासान में बदल चुका है। सतह पर भले ही यह सब चुनाव आयोग के कामकाज और फैसलों के विरोध में था, लेकिन जैसे-जैसे इस आंदोलन की तस्वीरें सामने आईं, वैसे-वैसे इसके पीछे छिपे असली सियासी मंसूबों की पोल खुलने लगी। द फ्रीलान्स की टीम ने जब इस पूरे घटनाक्रम की गहराई से पड़ताल की, तो पता चला कि मंच पर नारे लगाने वाले और पर्दे के पीछे रणनीति बनाने वाले चेहरों के बीच एक गहरा अंतर था। आम जनता के बीच यह संदेश देने की कोशिश की गई कि पूरा विपक्ष एकजुट होकर लोकतांत्रिक संस्थाओं को बचाने की लड़ाई लड़ रहा है, लेकिन हकीकत में यह आगामी चुनावों को प्रभावित करने की एक सोची-समझी राजनीतिक चाल साबित हुई।
इस पूरे मामले में उस वक्त और ज्यादा हवा मिल गई जब देश के कुछ जाने-माने राजनीतिक दलों और उनके नेताओं के बीच आपसी खींचतान खुलकर सड़क पर आ गई। जिन नेताओं ने कभी एक-दूसरे पर गंभीर आरोप लगाए थे और जिन्हें राहुल गांधी ने अतीत में दगाबाज तक करार दिया था, वे आज ज्ञानेश कुमार से जुड़े मामलों में एक ही सुर में सरकार और चुनाव आयोग को आईना दिखाते नजर आए। द्रमुक यानी डीएमके के नेताओं ने तो यहां तक कह दिया कि कुछ सहयोगी दल और नेता दोमुंही नीति अपना रहे हैं। जब हमने ग्राउंड पर जाकर इन नेताओं के बयानों की थाह ली, तो यह साफ हो गया कि यह विरोध प्रदर्शन जितना चुनाव सुधारों के लिए था, उससे कहीं ज्यादा अपनी राजनीतिक जमीन बचाने और जनता का ध्यान भटकाने की एक रणनीति थी।
तस्वीरों में कैद हुए सियासी खेल के असली चेहरे
विरोध प्रदर्शन के दौरान खींची गई तस्वीरों और वीडियो फुटेज ने राजनीतिक दलों के दावों की हवा निकाल दी है। एक तरफ जहां मंच से संविधान और निष्पक्षता की बड़ी-बड़ी बातें की जा रही थीं, वहीं दूसरी तरफ मंच के पीछे चल रही बैठकों में टिकटों के बंटवारे और आगामी राजनीतिक समीकरणों पर चर्चा हो रही थी। द फ्रीलान्स के कैमरे ने जब इन आयोजनों की कवरेज की, तो यह साफ दिखा कि भीड़ जुटाने के लिए पारंपरिक तरीकों का इस्तेमाल किया गया था, लेकिन जिन मुद्दों पर हंगामा बरपाया जा रहा था, उनकी जमीनी हकीकत से आम जनता का कोई सीधा जुड़ाव नहीं था। लोग सिर्फ यह समझ पा रहे थे कि देश में कोई बड़ा राजनीतिक बवाल चल रहा है, लेकिन इसके पीछे की असल कूटनीति आम आदमी की समझ से कोसों दूर रखी गई। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि इस तरह के प्रदर्शन केवल मीडिया की सुर्खियों में बने रहने और अपने पाले में वोट बैंक को एकजुट करने का एक पुराना और आजमाया हुआ तरीका भर हैं।
इस बीच देश की राजधानी से लेकर विभिन्न राज्यों तक शिक्षा और परीक्षाओं से जुड़े मुद्दों पर भी सियासत गरमाई हुई है। एक तरफ जहां संसद में नया पेपर लीक रोधी कानून पास कर दिया गया है और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने यह भरोसा दिलाया है कि देश की परीक्षा प्रणाली पर युवाओं का विश्वास फिर से बहाल होगा, वहीं दूसरी तरफ मंत्रियों के इस्तीफे और उनके पत्रों के मायनों पर भी चर्चा हो रही है। पूर्व केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे के बाद सामने आए खत और उसमें युवाओं की भावनाओं का जिक्र होने से सियासत में एक अलग ही उबाल आ गया है। छात्र संगठनों का कहना है कि जब तक युवाओं के भविष्य के साथ खिलवाड़ करने वालों पर कड़ा एक्शन नहीं होता, तब तक ऐसे कागजी विधेयकों से जमीनी हालात में कोई खास बदलाव आने वाला नहीं है।
संसद के फैसलों और जमीनी हकीकत का अंतर
संसद के अंदर भले ही सरकार ने पेपर लीक जैसी गंभीर समस्याओं से निपटने के लिए नया बिल पास करा लिया हो, लेकिन देश के युवाओं और छात्रों के मन में अभी भी कई तरह के गंभीर सवाल बने हुए हैं। द फ्रीलान्स की टीम ने जब यूनिवर्सिटी और कॉलेजों के परिसरों का दौरा किया, तो वहां के छात्रों ने साफ कहा कि कानून बनना अच्छी बात है, लेकिन उसका पालन कितनी सख्ती से होता है, असली परीक्षा अब वही होगी। बार-बार होने वाली परीक्षाओं की नाकामियों को लेकर मोदी सरकार पर यह दबाव लगातार बना हुआ है कि वह पिछली व्यवस्थाओं की कमियों को सिर्फ पुरानी सरकारों की विरासत कहकर अपनी जिम्मेदारी से पूरी तरह पल्ला नहीं झाड़ सकती। युवा वर्ग अब रोजगार और पारदर्शी भर्ती प्रक्रियाओं पर ठोस और तुरंत परिणाम चाहता है, न कि केवल कागजी आश्वासन।
इन तमाम घटनाओं के बीच राजनीतिक दलों का यह रवैया भी सवालों के घेरे में है कि वे हर गंभीर मुद्दे को अपनी सुविधानुसार मोड़ देते हैं। चाहे वह चुनाव आयोग के कामकाज पर सवाल उठाने का मामला हो या फिर देश के युवाओं के भविष्य से जुड़ा कोई संवेदनशील मुद्दा, हर जगह दलगत राजनीति की बू साफ आती है। द फ्रीलान्स की इस जमीनी पड़ताल से यह बिल्कुल साफ हो जाता है कि जब तक राजनीतिक दल जनता के असली मुद्दों को दरकिनार कर अपनी सियासी रोटियां सेकते रहेंगे, तब तक देश की लोकतांत्रिक व्यवस्था और आम आदमी की उम्मीदों के बीच एक बड़ी खाई बनी रहेगी। आने वाले दिनों में यह देखना बेहद दिलचस्प होगा कि जनता इन नेताओं के दोहरे रवैये को किस रूप में लेती है और आगामी चुनावों में इसका क्या असर देखने को मिलता है।






