नई दिल्ली/ग्राउंड ब्यूरो — देश में इन दिनों मतदाता सूची के विशेष पुनरीक्षण अभियान यानी एसआईआर को लेकर राजनीतिक माहौल काफी गर्म है। झारखंड से लेकर पंजाब और बिहार तक चुनाव आयोग के निर्देश पर वोटर लिस्ट को दुरुस्त करने का काम जोरों पर चल रहा है। इस पूरी प्रक्रिया के बीच अब देश के 42 सेवानिवृत्त न्यायाधीशों ने एक खुला पत्र जारी किया है। इन पूर्व जजों ने विपक्ष की ओर से किए जा रहे विरोध प्रदर्शनों को सीधे तौर पर लोकतंत्र पर हमला करार दिया है। इस बड़े घटनाक्रम के बाद से राजनीतिक गलियारों में आरोप-प्रत्यारोप का दौर और ज्यादा तेज हो गया है।
ताजा आंकड़ों के अनुसार, झारखंड में मतदाता सूची के विशेष पुनरीक्षण के बाद हाल ही में एक नई ड्राफ्ट वोटर लिस्ट जारी की गई है। इस नई सूची के आने के बाद राज्य में करीब 43.61 लाख लोगों के नाम वोटर लिस्ट से बाहर हो चुके हैं। इस भारी संख्या में नाम कटने के बाद विपक्षी दल सरकार और चुनाव आयोग पर गंभीर सवाल उठा रहे हैं। विपक्षी नेताओं का कहना है कि यह जनता के मताधिकार पर सीधा प्रहार है। इसके विरोध में कई जगहों पर धरने और प्रदर्शन भी आयोजित किए जा रहे हैं, जिसे अब जजों ने लोकतंत्र के लिए खतरा बताया है।
विपक्ष के विरोध प्रदर्शनों पर 42 पूर्व जजों का तीखा हमला
विपक्ष के लगातार हो रहे विरोध प्रदर्शनों और हंगामे के बीच देश के 42 सेवानिवृत्त जजों ने एक साझा ओपन लेटर देश के नाम जारी किया है। इन पूर्व जजों का कहना है कि संवैधानिक संस्थाओं के खिलाफ इस तरह का माहौल बनाना और सड़कों पर प्रदर्शन करना स्वस्थ लोकतंत्र की निशानी नहीं है। उनका मानना है कि एसआईआर जैसी प्रशासनिक प्रक्रियाएं पूरी तरह से पारदर्शी और कानूनी दायरे में होती हैं। जजों ने अपने पत्र में लिखा है कि बिना किसी ठोस आधार के चुनावी प्रक्रिया पर सवाल उठाना न्यायपालिका और चुनाव आयोग जैसी निष्पक्ष संस्थाओं का मनोबल गिराता है।
दूसरी तरफ, विपक्षी दलों का तर्क है कि इस तरह के बड़े पैमाने पर नाम हटने से गरीब और मजदूर वर्ग के लोग अपने मतदान के अधिकार से वंचित हो जाएंगे। विपक्ष का आरोप है कि बिना उचित सत्यापन के इतनी बड़ी संख्या में नाम काटा जाना संदेह पैदा करता है। इस तीखी राजनीतिक बहस के बीच आम नागरिक असमंजस की स्थिति में हैं। लोग यह समझ नहीं पा रहे हैं कि प्रशासनिक सुधार की इस प्रक्रिया में उनके खुद के नाम सूची में सुरक्षित हैं या नहीं।
कई राज्यों में घर-घर जाकर वोटर लिस्ट सुधारने का काम शुरू
इस बड़े विवाद के बीच देश के अन्य राज्यों में भी मतदाता सूची को अपडेट करने का अभियान तेजी से आगे बढ़ रहा है। आने वाली पच्चीस जून से पंजाब में भी मतदाता सूची का विशेष पुनरीक्षण अभियान बड़े पैमाने पर शुरू होने जा रहा है। इस अभियान के तहत राज्य भर में चौबीस हजार से ज्यादा बूथ लेवल अधिकारी यानी बीएलओ घर-घर जाकर मतदाताओं का सत्यापन करेंगे। अधिकारियों का कहना है कि इस पूरी कवायद का मकसद सिर्फ और सिर्फ मतदाता सूची को पूरी तरह शुद्ध और त्रुटिहीन बनाना है ताकि चुनाव के समय किसी को परेशानी न हो।
बिहार के युवाओं के लिए भी एक महीने तक चलने वाला विशेष वोटर रजिस्ट्रेशन ड्राइव शुरू किया गया है। इसके तहत बीएलओ युवाओं से फॉर्म छह भरवा रहे हैं ताकि नए मतदाताओं के नाम तुरंत सूची में जोड़े जा सकें। चुनाव आयोग का यह साफ कहना है कि मृत, स्थानांतरित या फर्जी मतदाताओं के नाम हटाने और नए पात्र लोगों को जोड़ने के लिए यह नियमित प्रक्रिया बेहद जरूरी है। बावजूद इसके, राजनीतिक बयानों और जजों के इस नए पत्र ने इस प्रशासनिक काम को एक राष्ट्रीय बहस का मुद्दा बना दिया है।
द फ्रीलान्स की ग्राउंड पड़ताल और आगे की स्थिति
हमारी जमीनी पड़ताल बताती है कि ग्रामीण और अर्ध-शहरी इलाकों में अभी भी आम लोगों को फॉर्म भरने और दस्तावेजों की प्रक्रिया को लेकर पूरी जानकारी नहीं है। बीएलओ के घर-घर पहुंचने से कुछ हद तक स्थिति साफ हो रही है, लेकिन डर और अफवाहों का बाजार भी गर्म है। लोग अपने कटे हुए नामों को दोबारा जुड़वाने के लिए स्थानीय कार्यालयों के चक्कर काट रहे हैं। प्रशासनिक अधिकारियों का दावा है कि किसी भी पात्र नागरिक का नाम नहीं काटा जाएगा और गलती पाए जाने पर उसे तुरंत सुधार लिया जाएगा।
कुल मिलाकर, एसआईआर अभियान और जजों के ओपन लेटर ने देश की राजनीति को दो स्पष्ट ध्रुवों में बांट दिया है। एक तरफ जहां प्रशासनिक सुधार और पारदर्शिता की दुहाई दी जा रही है, वहीं दूसरी तरफ लोकतांत्रिक अधिकारों की रक्षा के नाम पर संघर्ष जारी है। आने वाले दिनों में यह देखना बेहद दिलचस्प होगा कि चुनाव आयोग और राजनीतिक दल इस बड़े विवाद को किस तरह से संभालते हैं। 'द फ्रीलान्स' इस पूरे मामले पर अपनी पैनी नजर बनाए रखेगा और जमीनी सच आप तक लगातार पहुंचाता रहेगा।










